सावन मास: व्रत, जलाभिषेक और नियम

उत्तर भारत में सावन आषाढ़ पूर्णिमा के अगले दिन से श्रावण पूर्णिमा तक चलता है और शिव जी को समर्पित है। इसमें सोमवार व्रत, जलाभिषेक, कांवड़ यात्रा, मंगला गौरी व्रत और हरियाली तीज मुख्य हैं।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 5 मिनट का पाठ
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सावन (श्रावण) हिंदू कैलेंडर का पाँचवाँ महीना है और पूरा का पूरा भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। उत्तर भारत में सावन गुरु पूर्णिमा (आषाढ़ पूर्णिमा) के अगले दिन से शुरू होकर रक्षाबंधन वाली श्रावण पूर्णिमा पर ख़त्म होता है। इस महीने सोमवार के व्रत, शिवलिंग पर जलाभिषेक, कांवड़ यात्रा, मंगला गौरी व्रत और हरियाली तीज जैसे त्योहार होते हैं।

सावन कब से शुरू होता है

उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, उत्तराखंड, झारखंड और हिमाचल में पूर्णिमांत कैलेंडर चलता है, यानी महीना पूर्णिमा पर ख़त्म होता है। इसलिए यहाँ सावन का पहला दिन आषाढ़ पूर्णिमा के अगले दिन, कृष्ण प्रतिपदा को होता है।

महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और दक्षिण भारत में अमांत कैलेंडर है, जहाँ श्रावण अमावस्या के अगले दिन से शुरू होता है। इसलिए वहाँ सावन लगभग पंद्रह दिन बाद शुरू होता है और सावन सोमवार की गिनती भी अलग आती है। अगर आपके रिश्तेदार दूसरे राज्य में हैं और उनका "पहला सावन सोमवार" अलग दिन है, तो इसकी वजह यही है। इस साल की तारीख़ें त्योहार कैलेंडर में देखें।

सावन सोमवार और मंगला गौरी

सावन के हर सोमवार को शिव जी का व्रत रखा जाता है। कुछ लोग पूरे महीने के सभी सोमवार रखते हैं, कुछ सोलह सोमवार का संकल्प सावन के पहले सोमवार से शुरू करते हैं। व्रत में सुबह शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और अक्षत चढ़ाकर दिन में फलाहार किया जाता है और शाम को पूजा के बाद एक बार सात्विक भोजन। सोमवार व्रत की पूरी कहानी, जिसमें साहूकार को शिव कृपा से पुत्र मिलता है, सोमवार व्रत कथा में पढ़ें।

सावन के हर मंगलवार को मंगला गौरी व्रत होता है, जो खासकर नवविवाहित महिलाएँ शादी के बाद पहले पाँच साल तक रखती हैं। इसमें माँ पार्वती के मंगला गौरी रूप की सोलह श्रृंगार की चीज़ों से पूजा होती है और सोलह की गिनती में दीपक, लड्डू, फल चढ़ाए जाते हैं। इसकी कथा मंगला गौरी व्रत कथा में है।

जलाभिषेक और कांवड़

सावन में शिवलिंग पर जल चढ़ाने का विशेष महत्व है। कथा है कि समुद्र मंथन से निकला हलाहल विष शिव जी ने इसी महीने में पिया था और देवताओं ने उनकी जलन शांत करने के लिए उन पर जल चढ़ाया। घर पर या मंदिर में जलाभिषेक ऐसे करें:

  1. तांबे या पीतल के लोटे में शुद्ध जल लें, उसमें थोड़ा गंगाजल मिलाएँ।
  2. "ॐ नमः शिवाय" बोलते हुए पतली धार में जल चढ़ाएँ, जल्दबाज़ी में एक बार में न उड़ेलें।
  3. फिर कच्चा दूध, दही, शहद, बेलपत्र (तीन पत्तियों वाला, चिकनी तरफ़ नीचे), धतूरा, आक का फूल और भस्म चढ़ा सकते हैं।
  4. शिवलिंग की आधी परिक्रमा करें; जलाधारी (जल निकलने की नाली) को लाँघा नहीं जाता।
  5. अंत में ॐ जय शिव ओंकारा आरती करें।

शिवलिंग पर क्या चढ़ता है और क्या नहीं (जैसे तुलसी, हल्दी, सिंदूर नहीं चढ़ाए जाते), यह शिवलिंग पर क्या चढ़ाएँ में विस्तार से है।

कांवड़ यात्रा

सावन में लाखों शिवभक्त कांवड़ लेकर पैदल चलते हैं। पश्चिमी यूपी, दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान के कांवड़िए ज़्यादातर हरिद्वार, गौमुख या गंगोत्री से गंगाजल लाकर अपने इलाके के शिवालय में सावन शिवरात्रि (सावन कृष्ण चतुर्दशी) के दिन चढ़ाते हैं। बिहार और झारखंड में सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर लगभग सौ किलोमीटर पैदल चलकर देवघर के बाबा वैद्यनाथ पर चढ़ाने की परंपरा है, जो पूरे महीने चलती है। कांवड़ को रास्ते में ज़मीन पर नहीं रखा जाता और कांवड़िए "बोल बम" का जयकारा लगाते चलते हैं। यात्रा के रास्ते, ट्रैफ़िक और प्रशासन के नियम हर साल बदलते हैं, इसलिए स्थानीय प्रशासन की सूचना देखकर ही निकलें।

क्या खाएँ, क्या न खाएँ

उत्तर भारत में एक पुरानी कहावत है: "सावन साग न भादों दही"। इसी के अनुसार ज़्यादातर घरों में सावन के नियम ये हैं:

  • न खाएँ: हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ (साग, पालक, मेथी), बैंगन, मांस, मछली, अंडा और मदिरा। कई परिवार इस महीने प्याज़-लहसुन भी छोड़ देते हैं।
  • कम करें या टालें: कढ़ी और बहुत तला-भुना भोजन।
  • व्रत के दिन खाएँ: फल, दूध, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, आलू, मखाना और सेंधा नमक।
  • पूरे महीने: सादा, ताज़ा, घर का बना सात्विक भोजन। कई पुरुष, खासकर कांवड़ ले जाने वाले, पूरे सावन दाढ़ी और बाल भी नहीं कटवाते।

ये नियम परंपरा से चले आ रहे हैं। जिन्हें डायबिटीज़ या कोई और बीमारी है, वे व्रत का तरीका अपने डॉक्टर से पूछकर तय करें।

सावन के प्रमुख त्योहार

तिथि (पूर्णिमांत सावन)त्योहारक्या करते हैं
हर सोमवारसावन सोमवारशिव व्रत और जलाभिषेक
हर मंगलवारमंगला गौरी व्रतनवविवाहिताओं का पार्वती पूजन
कृष्ण एकादशीकामिका एकादशीविष्णु पूजा, तुलसी दल अर्पण
कृष्ण चतुर्दशीसावन शिवरात्रिकांवड़ जल चढ़ाना, रात्रि पूजा
अमावस्याहरियाली अमावस्यापौधे लगाना, पितरों का तर्पण, मेले
शुक्ल तृतीयाहरियाली तीजझूले, मेहंदी, सिंधारा, निर्जला व्रत
शुक्ल पंचमीनाग पंचमीनाग देवता की पूजा, दूध चढ़ाना
शुक्ल एकादशीश्रावण पुत्रदा एकादशीसंतान की कामना से विष्णु व्रत
पूर्णिमारक्षाबंधन, श्रावणी उपाकर्मराखी, जनेऊ बदलना

हरियाली और झूले

सावन सिर्फ़ व्रत का नहीं, हरियाली और उत्सव का महीना भी है। बेटियाँ मायके आती हैं, आँगन या पेड़ पर झूले डाले जाते हैं और महिलाएँ हरे कपड़े, हरी चूड़ियाँ और मेहंदी लगाती हैं। हरियाली तीज पर मायके से बेटी के लिए सिंधारा आता है, जिसमें घेवर, मेहंदी, चूड़ियाँ और कपड़े होते हैं। राजस्थान में घेवर के बिना सावन अधूरा माना जाता है, तो पूर्वांचल और बिहार में कजरी गीतों के बिना। ब्रज में ठाकुर जी हिंडोले में झूलते हैं।

हरियाली अमावस्या पर पीपल, बरगद, नीम, आँवला या तुलसी लगाने की परंपरा है। अगर इस सावन घर पर कुछ नया करना हो तो एक पौधा ज़रूर लगाएँ; यह सावन का सबसे सरल और सबसे टिकाऊ पुण्य है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सावन कब से शुरू होता है?

उत्तर भारत के पूर्णिमांत कैलेंडर में सावन आषाढ़ (गुरु) पूर्णिमा के अगले दिन से शुरू होकर श्रावण पूर्णिमा (रक्षाबंधन) पर ख़त्म होता है। अमांत कैलेंडर वाले राज्यों में यह लगभग पंद्रह दिन बाद शुरू होता है।

सावन में क्या नहीं खाना चाहिए?

परंपरा में हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ, बैंगन, मांस, मछली, अंडा और मदिरा नहीं खाए जाते, और कई परिवार प्याज़-लहसुन भी छोड़ते हैं।

सावन सोमवार का व्रत कैसे रखें?

सुबह स्नान करके शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र चढ़ाएँ, दिन में फलाहार करें और शाम की पूजा के बाद एक बार सात्विक भोजन लें।

कांवड़ का जल कब चढ़ाया जाता है?

पश्चिमी यूपी, दिल्ली और हरियाणा के कांवड़िए आमतौर पर सावन शिवरात्रि को जल चढ़ाते हैं, जबकि देवघर में पूरे सावन जल चढ़ता है।

मंगला गौरी व्रत कौन रखता है?

सावन के मंगलवार को मंगला गौरी व्रत मुख्य रूप से नवविवाहित महिलाएँ शादी के बाद पहले पाँच साल तक रखती हैं।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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