महाशिवरात्रि उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात मनाई जाती है (अमांत कैलेंडर में यही माघ कृष्ण चतुर्दशी कहलाती है)। इस रात जागकर चार प्रहर में शिव पूजा करने की परंपरा है, और आधी रात का निशीथ काल सबसे पुण्यदायी माना जाता है। 2027 में महाशिवरात्रि 6 मार्च (नई दिल्ली पंचांग) को है; हर साल का समय महाशिवरात्रि पृष्ठ पर देखें।
इस व्रत के पीछे की कथा में एक शिकारी अनजाने में रात भर बेल के पेड़ पर जागता है, उसके हाथ से बेलपत्र और जल नीचे छिपे शिवलिंग पर गिरते रहते हैं, और इसी से उसका उद्धार होता है। पूरी कथा महाशिवरात्रि व्रत कथा में पढ़ें; पूजा के बीच इसे सुनना परंपरा का हिस्सा है।
व्रत का संकल्प
शिवरात्रि की सुबह जल्दी स्नान करें। अगर पास में शिव मंदिर है तो पहले वहाँ जल चढ़ाकर आएँ। फिर घर के मंदिर में हाथ में जल, अक्षत, फूल और एक बेलपत्र लेकर संकल्प करें। सरल शब्दों में कहें: "मैं (अपना नाम), गोत्र (गोत्र), आज महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए व्रत रखूँगा/रखूँगी और रात्रि में चार प्रहर पूजा करूँगा/करूँगी।" जल शिवलिंग या ज़मीन पर छोड़ दें।
संकल्प में यह भी तय कर लें कि व्रत निर्जल रहेगा, फलाहारी या एक समय भोजन वाला। जो चारों प्रहर नहीं जाग सकते, वे कम से कम पहले प्रहर और निशीथ काल की पूजा का संकल्प लें।
सामग्री
- शिवलिंग (घर का हो या मिट्टी से बना पार्थिव शिवलिंग), जलहरी या थाली
- ताँबे या पीतल का लोटा, गंगाजल
- अभिषेक के लिए: कच्चा दूध, दही, घी, शहद, शक्कर (पंचामृत का सामान), गन्ने का रस (इच्छा हो तो)
- बेलपत्र (जितने मिल सकें, कम से कम 11), धतूरा, आक के फूल, शमी पत्र, सफ़ेद फूल
- सफ़ेद चंदन या भस्म, अक्षत, जनेऊ, मौली
- भांग (परंपरा के अनुसार, थोड़ी), बेर, मौसमी फल, मिठाई
- दीपक, घी, धूप, कपूर, माचिस
- रुद्राक्ष की माला (जाप के लिए)
बेलपत्र न मिलें तो पहले से रखे बेलपत्र धोकर दोबारा चढ़ा सकते हैं; बेलपत्र को बासी नहीं माना जाता। धतूरा या आक न मिले तो कोई बात नहीं, जल और बेलपत्र ही शिव पूजा का मूल है। क्या चढ़ाएं और क्या नहीं, इसकी पूरी सूची शिवलिंग पर क्या चढ़ाएं में है।
घर में शिवलिंग न हो तो: साफ़ मिट्टी (किसी तालाब, खेत या गमले की, कंकड़ हटाकर) में थोड़ा गंगाजल मिलाकर अँगूठे से थोड़ा बड़ा पार्थिव शिवलिंग बना लें और एक थाली में रखें। पूजा के बाद अगले दिन इसे किसी पौधे की जड़ में या बहते पानी में विसर्जित कर दें। पार्थिव पूजा को शिव पुराण में बहुत फलदायी बताया गया है, और सावन में भी कई परिवार यही करते हैं।
चार प्रहर की पूजा
सूर्यास्त से अगले सूर्योदय तक की रात को चार बराबर हिस्सों में बाँटा जाता है, हर हिस्सा लगभग तीन घंटे का। हर प्रहर में एक बार पूजा और अभिषेक होता है। उत्तर भारत में प्रचलित क्रम यह है:
| प्रहर | लगभग समय | अभिषेक | जाप |
|---|---|---|---|
| पहला | सूर्यास्त से रात लगभग 9 बजे तक | दूध | ॐ नमः शिवाय |
| दूसरा | लगभग 9 से 12 बजे तक | दही | ॐ नमः शिवाय / शिव पंचाक्षर |
| तीसरा | लगभग 12 से 3 बजे तक | घी | महामृत्युंजय मंत्र |
| चौथा | लगभग 3 बजे से सूर्योदय तक | शहद | ॐ नमः शिवाय, शिव स्तुति |
निशीथ काल आधी रात के आसपास, दूसरे और तीसरे प्रहर के बीच पड़ता है; उस समय एक अलग छोटी पूजा और जाप अवश्य करें। ये सभी समय मोटे अनुमान हैं; सही प्रहर और निशीथ काल हर साल और हर शहर में अलग होते हैं, जो त्योहार पृष्ठ पर दिए रहते हैं। कुछ परिवार पहले प्रहर में जल, फिर दूध, दही और घी-शहद का क्रम भी रखते हैं; अपनी परंपरा चलने दें।
हर प्रहर की पूजा का क्रम:
- हाथ-पैर धोकर बैठें, दीपक जलाएँ।
- शिवलिंग पर पहले शुद्ध जल चढ़ाएँ, फिर उस प्रहर का द्रव्य (दूध, दही, घी या शहद), और आख़िर में फिर जल से स्नान कराएँ।
- चंदन या भस्म का त्रिपुंड लगाएँ, अक्षत और जनेऊ चढ़ाएँ।
- बेलपत्र (चिकनी सतह नीचे की ओर), धतूरा, आक और फूल चढ़ाएँ।
- धूप-दीप दिखाएँ, फल-मिठाई का भोग लगाएँ।
- मंत्र का कम से कम एक माला जाप करें।
- ॐ जय शिव ओंकारा आरती गाएँ।
प्रहरों के बीच में कथा सुनें, शिव भजन गाएँ या शिव चालीसा पढ़ें। यही रात्रि जागरण है।
जलाभिषेक और रुद्राभिषेक
दिन में मंदिर जाकर जलाभिषेक करना उत्तर भारत में सबसे आम है; कुछ श्रद्धालु सावन की तरह फाल्गुन में भी गंगाजल की कांवड़ लाकर शिवरात्रि पर अपने गाँव-शहर के शिवालय में चढ़ाते हैं। भीड़ वाले मंदिरों में लंबी लाइन होती है, इसलिए बुज़ुर्ग घर पर ही अभिषेक कर लें; फल वही है।
जो परिवार बड़ा अनुष्ठान चाहते हैं, वे इस रात पुरोहित से रुद्राभिषेक करवाते हैं, जिसमें रुद्राष्टाध्यायी के मंत्रों के साथ अभिषेक होता है। शिवरात्रि पर रुद्राभिषेक के लिए शिववास देखने की ज़रूरत नहीं मानी जाती। विधि और प्रकार रुद्राभिषेक विधि में हैं।
व्रत में क्या खाएं
व्रत तीन तरह से रखा जाता है: निर्जल (बिना पानी), फलाहारी, या दिन में एक बार सात्विक फलाहार। सेहत ठीक न हो, गर्भावस्था हो या दवा चल रही हो तो फलाहारी व्रत ही रखें।
- खा सकते हैं: फल, दूध, दही, मखाना, मूंगफली, साबूदाना खिचड़ी या खीर, कुट्टू या सिंघाड़े के आटे की पूरी-पकौड़ी, आलू, शकरकंद, सेंधा नमक, ठंडाई (बिना भांग के भी)।
- नहीं खाते: अनाज (गेहूँ, चावल, दालें), साधारण नमक, प्याज़-लहसुन, मांस-अंडा, शराब।
- बहुत तला-भुना खाने से रात में जागना मुश्किल होता है; हल्का फलाहार रखें और पानी पीते रहें (अगर निर्जल नहीं है)।
पारण
व्रत अगले दिन सुबह खोला जाता है। स्नान करके शिवलिंग पर जल चढ़ाएँ, प्रसाद लें और फिर भोजन करें। शास्त्रीय नियम यह है कि पारण सूर्योदय के बाद और चतुर्दशी तिथि खत्म होने से पहले करना अच्छा है; पारण का सही समय आज के पंचांग और त्योहार पृष्ठ पर दिया रहता है। पारण में पहले थोड़ा प्रसाद या खीर लें, फिर सादा भोजन। किसी ज़रूरतमंद को भोजन या दान देकर व्रत पूरा करना अच्छी परंपरा है।

