खाटू श्याम जी महाभारत के वीर बर्बरीक हैं, जो भीम के पोते और घटोत्कच के पुत्र थे। युद्ध से पहले उन्होंने श्रीकृष्ण के माँगने पर अपना शीश दान कर दिया, और कृष्ण ने वरदान दिया कि कलियुग में वे उन्हीं के नाम "श्याम" से पूजे जाएँगे। उनका मुख्य मंदिर राजस्थान के सीकर ज़िले के खाटू गाँव में है, और आज राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और पूरे उत्तर भारत में "हारे का सहारा, बाबा श्याम हमारा" का जयकारा घर-घर सुनाई देता है।
बर्बरीक कौन थे: महाभारत की कथा
बर्बरीक की कथा महाभारत की मूल पोथी से ज़्यादा स्कन्द पुराण और राजस्थान की लोक-परंपरा में मिलती है, और अलग-अलग कथाओं में कुछ नाम बदल जाते हैं। उनकी माता का नाम कहीं मौरवी (कामकंटका) मिलता है, तो राजस्थानी कथाओं में अहिलावती। इसीलिए भक्त उन्हें "मोरवीनंदन" भी कहते हैं।
बचपन से ही बर्बरीक बड़े धनुर्धर थे। कथा के अनुसार कठोर तपस्या से उन्हें तीन अमोघ बाण मिले। पहला बाण जिन्हें मारना हो उन्हें चिह्नित कर देता, दूसरा जिन्हें बचाना हो उन्हें, और तीसरा चिह्नित सबको नष्ट करके तरकश में लौट आता। इसीलिए उनका एक नाम "तीन बाणधारी" है।
जब कुरुक्षेत्र का युद्ध तय हुआ, बर्बरीक ने भी युद्ध देखने और उसमें भाग लेने की इच्छा जताई। माँ ने उनसे वचन लिया कि वे हमेशा हारने वाले पक्ष की ओर से लड़ेंगे। बर्बरीक नीले घोड़े पर, तीन बाण लेकर कुरुक्षेत्र की ओर चल पड़े।
शीश दान और 'हारे का सहारा'
रास्ते में श्रीकृष्ण ब्राह्मण का वेश धरकर उनसे मिले और हँसी में पूछा कि सिर्फ़ तीन बाण से युद्ध कैसे लड़ोगे। बर्बरीक ने कहा कि एक ही बाण पूरी सेना के लिए काफ़ी है। परीक्षा के लिए कृष्ण ने एक पीपल के सारे पत्ते भेदने को कहा और चुपके से एक पत्ता अपने पैर के नीचे दबा लिया। बाण ने सारे पत्ते भेद दिए और फिर कृष्ण के पैर के चारों ओर घूमने लगा। बर्बरीक बोले, "पैर हटा लीजिए, नहीं तो बाण आपके पैर को भी भेद देगा।"
कृष्ण समझ गए कि यह योद्धा युद्ध का संतुलन ही बिगाड़ देगा। माँ के वचन के कारण वह हमेशा कमज़ोर पक्ष में जाएगा, जिससे दूसरा पक्ष कमज़ोर होगा, और वह फिर पाला बदलेगा। आख़िर में दोनों ओर कोई नहीं बचेगा। तब ब्राह्मण वेशधारी कृष्ण ने दान माँगा। बर्बरीक ने वचन दिया, और कृष्ण ने उनका शीश माँग लिया। बर्बरीक ने पहचान लिया कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं; कृष्ण ने अपना विराट रूप दिखाया। बर्बरीक ने बिना हिचके शीश दान कर दिया, बस एक इच्छा रखी कि वे पूरा युद्ध देखना चाहते हैं।
कृष्ण ने उनका शीश एक ऊँची पहाड़ी पर रख दिया, जहाँ से पूरा कुरुक्षेत्र दिखता था। युद्ध के बाद जब पांडवों में बहस हुई कि जीत का श्रेय किसे जाए, तो बर्बरीक के शीश ने कहा कि उसे तो रणभूमि में हर ओर बस कृष्ण का सुदर्शन चक्र ही चलता दिखा। प्रसन्न होकर कृष्ण ने वरदान दिया कि कलियुग में तुम मेरे नाम "श्याम" से पूजे जाओगे, और जो हारा हुआ, निराश व्यक्ति तुम्हारी शरण आएगा, उसका सहारा बनोगे। यहीं से "हारे का सहारा" और "शीश के दानी" जैसे नाम पड़े। भक्त उन्हें प्यार से "लखदातार" भी कहते हैं, यानी लाखों देने वाले।
खाटू (सीकर) का मंदिर
लोक-कथा के अनुसार बर्बरीक का शीश खाटू गाँव की धरती में समा गया था। सदियों बाद वहाँ एक गाय रोज़ एक ही जगह अपने आप दूध गिराने लगी। खुदाई में शीश मिला, और स्थानीय राजा को सपने में मंदिर बनाने का आदेश हुआ। आज जो मंदिर है, वह बाद के जीर्णोद्धार का है, सफ़ेद संगमरमर का, और गर्भगृह में बाबा श्याम का शीश-रूप विग्रह फूलों और श्रृंगार से सजा रहता है।
- श्याम कुंड: मंदिर के पास का पवित्र कुंड, जहाँ शीश मिलने की मान्यता है। बहुत से भक्त यहाँ स्नान करके दर्शन करते हैं।
- दर्शन का समय, आरती, श्रृंगार और भीड़ की व्यवस्था: ये मौसम, त्योहार और मेले के हिसाब से बदलते रहते हैं। जाने से पहले श्री श्याम मंदिर कमेटी की आधिकारिक सूचना देख लें।
- खाटू जयपुर से उत्तर की ओर, सीकर ज़िले में है; पास का रेलवे स्टेशन रींगस है। सड़क और रेल के रूट व किराए बदलते रहते हैं, इसलिए यात्रा से पहले पुष्टि करें।
फाल्गुन मेला और निशान यात्रा
खाटू का सबसे बड़ा उत्सव फाल्गुन का लक्खी मेला है, जो फाल्गुन शुक्ल पक्ष में कई दिन चलता है। इसका मुख्य दिन फाल्गुन शुक्ल एकादशी है, और लोक-मान्यता में अगले दिन द्वादशी को बाबा ने शीश दान किया था। मेला होली से कुछ दिन पहले होता है, इसलिए श्याम भक्त फाल्गुन पूर्णिमा और होली तक भजन-कीर्तन में डूबे रहते हैं।
इस मेले की पहचान है निशान यात्रा। निशान एक केसरिया, लाल या पीला ध्वज होता है, जिस पर बाबा श्याम की छवि और "जय श्री श्याम" लिखा रहता है, और ऊपर मोरपंख। भक्त रींगस से खाटू तक, करीब 17-18 किलोमीटर, नंगे पैर या पैदल यह निशान उठाकर चलते हैं और मंदिर में अर्पित करते हैं। रास्ते भर भंडारे, शरबत और सेवा शिविर लगते हैं। बहुत से लोग अपनी मन्नत पूरी होने पर निशान चढ़ाने आते हैं।
मेले में बहुत भीड़ होती है। बुज़ुर्ग और बच्चों के साथ हों तो प्रशासन के बताए रास्ते और नियम मानें, और हो सके तो मेले के बाद के दिनों में दर्शन की योजना बनाएँ।
एकादशी और श्याम बाबा
श्याम भक्तों के लिए हर महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी ख़ास है। उस दिन खाटू में भारी भीड़ रहती है और घरों में ज्योत जलाई जाती है। देवउठनी एकादशी (कार्तिक शुक्ल एकादशी) को बाबा श्याम का जन्मोत्सव मनाया जाता है, जब मंदिर में विशेष श्रृंगार और रात भर जागरण होता है। कई भक्त हर एकादशी को खाटू जाने का नियम रखते हैं, जिसे "ग्यारस की जात" भी कहा जाता है।
घर पर श्याम बाबा की पूजा
- घर के मंदिर में बाबा श्याम की तस्वीर रखें; शीश रूप वाली तस्वीर सबसे प्रचलित है। पास में मोरपंख रखें।
- एकादशी या किसी भी दिन शाम को घी की ज्योत जलाएँ। श्याम भक्ति में "ज्योत लेना" यानी अखंड या शाम की ज्योत का बड़ा महत्व है।
- गुलाब के फूल या माला, इत्र (गुलाब या मोगरे का) अर्पित करें; बाबा को इत्र बहुत प्रिय माना जाता है।
- भोग में खीर-चूरमा, पेड़ा, मिश्री, या घर की कोई मिठाई रखें; उस पर तुलसी पत्र रखें।
- "जय श्री श्याम" या "ॐ श्री श्याम देवाय नमः" का जाप करें, और श्याम भजन गाएँ।
- आख़िर में आरती करें। बाबा श्याम कृष्ण का ही रूप माने जाते हैं, इसलिए बहुत से घरों में आरती कुंजबिहारी की भी गाई जाती है।
श्याम बाबा की भक्ति का मूल भाव समर्पण है: जैसे बर्बरीक ने बिना सोचे अपना सबसे कीमती दान कर दिया, वैसे ही भक्त अपनी हार और चिंता बाबा के चरणों में रख देता है। कृष्ण के बाल और प्रेम रूप की भक्ति का दूसरा बड़ा केंद्र वृंदावन है; वहाँ जाएँ तो बांके बिहारी मंदिर के दर्शन अवश्य करें।

