फाल्गुन पूर्णिमा (होलिका दहन)
फाल्गुन पूर्णिमा क्या है
फाल्गुन महीने की पूर्णिमा हिंदू वर्ष की आखिरी पूर्णिमा है, और उत्तर भारत में यह होलिका दहन की रात है। इस शाम होली जलाकर भक्त प्रह्लाद की रक्षा और होलिका के अंत को याद किया जाता है, और अगली सुबह रंगों वाली होली खेली जाती है।
किस तिथि को
फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा। स्नान-दान उदया तिथि में होता है, पर होलिका दहन का नियम अलग है: दहन उस शाम होता है जब प्रदोष काल में पूर्णिमा हो, और भद्रा का मुख वाला समय टाला जाता है। अगर भद्रा आधी रात तक रहे तो शास्त्र भद्रा की पूँछ में या भद्रा के बाद दहन की अनुमति देते हैं। सही मुहूर्त पंचांग पर देखें। पूर्णिमांत पंचांग में अगले दिन से चैत्र कृष्ण पक्ष लगता है, इसलिए धुलेंडी चैत्र की प्रतिपदा को होती है।
कैसे मनाते हैं
- सुबह स्नान, विष्णु पूजा और पूर्णिमा व्रत।
- दिन में महिलाएँ होलिका के डंडे के पास जाकर रोली, अक्षत, कच्चा सूत, गुड़, हल्दी, गोबर के बड़कुल्ले और नारियल से पूजा करती हैं और सूत लपेटते हुए परिक्रमा करती हैं।
- मुहूर्त में होली जलाई जाती है; नई फसल की गेहूँ-जौ की बालियाँ आग में भूनकर प्रसाद के रूप में बाँटी जाती हैं।
- प्रह्लाद की होलिका दहन की कथा सुनी जाती है।
पूजा की पूरी सामग्री के लिए होलिका दहन पूजा विधि और सामग्री देखें।
और क्या होता है इस दिन
बंगाल और ओडिशा में यह दिन डोल पूर्णिमा है, जब राधा-कृष्ण को झूले में बिठाकर अबीर चढ़ाया जाता है, और वैष्णव इसे चैतन्य महाप्रभु की जयंती के रूप में गौर पूर्णिमा कहते हैं। कुछ परंपराओं में इस दिन लक्ष्मी जयंती भी मानी जाती है। ब्रज में होली का उत्सव कई दिन पहले से चल रहा होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
फाल्गुन पूर्णिमा पर कौन-सा त्योहार होता है?
होलिका दहन किस समय करना चाहिए?
होलिका पूजा में क्या चढ़ाते हैं?
होली चैत्र में क्यों गिनी जाती है?
क्या फाल्गुन पूर्णिमा पर व्रत रखा जाता है?
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