होलिका दहन पूजा विधि और सामग्री

होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की रात प्रदोष काल में, भद्रा समाप्त होने के बाद किया जाता है। पूजा में जल, रोली, अक्षत, फूल, कच्चा सूत, गोबर के बड़कुले, गुड़ और गेहूँ-जौ की बालियाँ चढ़ाकर 3 या 7 परिक्रमा की जाती है और दहन के बाद नई फ़सल की बालियाँ भूनकर प्रसाद के रूप में ली जाती हैं।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 5 मिनट का पाठ
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होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की रात होता है, होली के रंग वाले दिन से ठीक पहले। दिन में महिलाएँ मोहल्ले या गाँव की होलिका पर जाकर जल, रोली, कच्चा सूत और बड़कुले चढ़ाकर पूजा करती हैं, और रात को शुभ मुहूर्त में अग्नि जलाई जाती है। 2026 में होलिका दहन 3 मार्च को था और 2027 में यह 21 मार्च को होगा। हर साल का मुहूर्त होलिका दहन पृष्ठ पर दिया जाता है।

इस पर्व के पीछे भक्त प्रह्लाद की कथा है: हिरण्यकशिपु की बहन होलिका, जिसे आग से न जलने का वरदान था, प्रह्लाद को गोद में लेकर चिता पर बैठी, पर भगवान की कृपा से प्रह्लाद बच गए और होलिका जल गई। पूरी कथा होलिका दहन की कथा में पढ़ें। दहन से पहले यह कथा परिवार के साथ बैठकर सुनने का चलन है।

होलाष्टक क्या है

फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक के आठ दिन होलाष्टक कहलाते हैं। उत्तर भारत में इन दिनों विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, सगाई और नई ख़रीदारी जैसे शुभ काम नहीं किए जाते। इसी समय होलिका की जगह तय होती है, वहाँ डंडा गाड़ा जाता है और रोज़ थोड़ी-थोड़ी लकड़ी, उपले और सूखी झाड़ियाँ इकट्ठी की जाती हैं। घर पर महिलाएँ इन्हीं दिनों गोबर के बड़कुले बनाकर सुखाती हैं। पंजाब और हरियाणा के कुछ हिस्सों में होलाष्टक का पालन कम होता है, जबकि ब्रज, राजस्थान और मध्य प्रदेश में इसे काफ़ी मानते हैं।

होलिका पूजा की सामग्री

  • जल से भरा लोटा (ताँबे या पीतल का)
  • रोली, हल्दी, अक्षत (साबुत चावल)
  • फूल, फूलमाला
  • कच्चा सूत (सफ़ेद कच्चा धागा) या मौली
  • गोबर के बड़कुले (भरभोलिए) की मालाएँ
  • गुड़, बताशे, साबुत मूँग या चने की दाल
  • गेहूँ और जौ की हरी बालियाँ, हरे चने के पौधे
  • नारियल (पानी वाला या सूखा गोला)
  • गुलाल, साबुत हल्दी की गाँठ
  • धूप, दीपक, माचिस

बड़कुले क्या हैं: गाय के गोबर से बने छोटे-छोटे गोल उपले, जिनके बीच में छेद होता है ताकि उन्हें सूत में पिरोकर माला बनाई जा सके। कई घरों में पाँच या सात मालाएँ बनती हैं, और ढाल, चाँद, सूरज, नारियल जैसी छोटी आकृतियाँ भी गढ़ी जाती हैं। राजस्थान और ब्रज में एक माला पितरों, एक हनुमान जी, एक शीतला माता और एक घर के नाम की रखी जाती है।

कुछ न मिले तो: शहर में गोबर न मिले तो बाज़ार में मिलने वाले सूखे उपले की छोटी माला चढ़ा दें, या केवल कच्चा सूत, जल, गुड़ और अक्षत से पूजा करें। गेहूँ की बालियाँ न मिलें तो मुट्ठी भर साबुत गेहूँ या जौ ले जाएँ। पूजा का भाव ज़रूरी है, हर वस्तु नहीं।

होलिका दहन पूजा विधि

  1. पूजा दिन में या शाम को, दहन से पहले करें। स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें और थाली सजा लें।
  2. होलिका के पास पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके बैठें या खड़े हों।
  3. सबसे पहले गणेश जी का स्मरण करें और मन में संकल्प लें कि परिवार की सुख-शांति और नकारात्मकता के नाश के लिए होलिका पूजन कर रहे हैं।
  4. होलिका पर जल की धार चढ़ाएँ, फिर रोली, हल्दी, अक्षत और फूल चढ़ाएँ।
  5. कच्चे सूत को होलिका के चारों ओर लपेटते हुए 3, 5 या 7 परिक्रमा करें। परिवार की परंपरा के अनुसार संख्या चुनें।
  6. बड़कुले की मालाएँ, गुड़, बताशे, मूँग, नारियल और गेहूँ-जौ की बालियाँ अर्पित करें।
  7. भक्त प्रह्लाद और भगवान नरसिंह का ध्यान करें, और घर के बड़े होलिका कथा सुनाएँ।
  8. रात को भद्रा रहित प्रदोष काल में मोहल्ले के बड़े या पंडित जी अग्नि प्रज्वलित करें। दहन के समय जल का लोटा अग्नि की ओर अर्घ्य की तरह अर्पित करें।
  9. जलती होलिका की परिक्रमा करें और नई फ़सल की बालियाँ अग्नि में भूनें।

परिक्रमा और अग्नि में क्या डालें

दहन के बाद लोग जलती होलिका की कम से कम तीन परिक्रमा करते हैं। आग के बहुत पास न जाएँ, बच्चों का हाथ पकड़े रखें और सिंथेटिक दुपट्टा या ढीला आँचल सँभालकर रखें।

  • गेहूँ-जौ की बालियाँ और हरे चने: इन्हें डंडी पर बाँधकर आग में भूना जाता है। भुने दानों को पूर्वांचल और बिहार में "होरहा" कहते हैं और प्रसाद के रूप में बाँटते हैं। यह नई रबी फ़सल को अग्नि देव को अर्पित करने की रीत है।
  • उबटन: यूपी और बिहार के कई घरों में होली से पहले के दिनों में सबको सरसों-हल्दी का उबटन लगाया जाता है और उतरा हुआ उबटन होलिका में डाला जाता है। बिहार में होलिका दहन को "सम्मत जलाना" भी कहते हैं।
  • नारियल, गुड़, बताशे, कपूर: ये भी अग्नि में अर्पित किए जाते हैं।
  • क्या न डालें: प्लास्टिक, टायर, कचरा या हरे पेड़ की लकड़ी। पूजा की अग्नि में केवल सूखी लकड़ी, उपले और पूजा सामग्री डालें।

भद्रा और मुहूर्त

शास्त्रीय नियम तीन बातें माँगता है: पूर्णिमा तिथि हो, प्रदोष काल हो (सूर्यास्त के बाद का लगभग ढाई घंटे का समय), और भद्रा न हो। चूँकि शुक्ल पूर्णिमा का पहला आधा हिस्सा हमेशा भद्रा होता है, इसलिए कई साल भद्रा रात तक खिंच जाती है। तब पंडित जी भद्रा पुच्छ में या भद्रा उतरने के बाद दहन करवाते हैं; भद्रा मुख में दहन कभी नहीं होता। इसका पूरा हिसाब भद्रा क्या है लेख में समझाया गया है। अपने शहर का समय आज के पंचांग में देखें।

अगले दिन की राख

होली की सुबह, रंग खेलने से पहले, कई परिवार होलिका की ठंडी राख लेने जाते हैं। इस राख का तिलक माथे पर लगाया जाता है और थोड़ी राख घर लाकर पूजा स्थान या घर के कोने में रखी जाती है। ब्रज और राजस्थान के गाँवों में होलिका की आग से अंगारा लाकर घर का चूल्हा जलाने की पुरानी परंपरा है। कुछ घरों में राख को पानी में मिलाकर नहाते हैं। इसके बाद धुलेंडी शुरू होती है; रंगों वाले दिन की जानकारी होली पृष्ठ पर है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

होलिका दहन की पूजा कब करें?

पूजा दिन में या शाम को दहन से पहले की जाती है, और दहन फाल्गुन पूर्णिमा की रात प्रदोष काल में भद्रा समाप्त होने के बाद होता है।

होलिका पूजा में कितनी परिक्रमा करनी चाहिए?

ज़्यादातर घरों में कच्चा सूत लपेटते हुए 3 या 7 परिक्रमा की जाती है। कुछ परिवार 5 या 11 परिक्रमा करते हैं, अपनी परंपरा मानें।

होलिका दहन में गेहूँ की बालियाँ क्यों भूनते हैं?

होली के समय रबी की नई फ़सल पकती है। उसकी बालियाँ अग्नि में भूनकर पहले देवता को अर्पित की जाती हैं और फिर प्रसाद के रूप में खाई जाती हैं।

होलाष्टक में क्या नहीं करना चाहिए?

होलाष्टक के आठ दिनों में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, सगाई और नई ख़रीदारी जैसे मांगलिक काम नहीं किए जाते। रोज़ की पूजा और दान किए जा सकते हैं।

होलिका की राख का क्या करें?

अगली सुबह ठंडी राख का तिलक लगाया जाता है और थोड़ी राख घर के पूजा स्थान में रखी जाती है। कुछ परिवार इसे पानी में मिलाकर स्नान करते हैं।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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