भद्रा कोई अलग ग्रह या नक्षत्र नहीं है, बल्कि पंचांग के पाँच अंगों में से एक, करण, का नाम है। ग्यारह करणों में सातवाँ चर करण विष्टि कहलाता है और लोक में इसी को भद्रा कहते हैं। जिस समय विष्टि करण चल रहा हो, उस समय शुभ और मांगलिक काम शुरू न करने की परंपरा है। यही कारण है कि रक्षाबंधन और होलिका दहन से पहले हर घर में एक ही सवाल पूछा जाता है: "भद्रा कब तक है?"
भद्रा कौन हैं: पौराणिक परिचय
पौराणिक मान्यता के अनुसार भद्रा सूर्यदेव और छाया की पुत्री और शनिदेव की बहन हैं। कथा में उनका स्वभाव उग्र बताया गया है। जन्म लेते ही वे यज्ञ और मंगल कार्यों में बाधा डालने लगीं, तब ब्रह्मा जी ने उन्हें करणों में सातवाँ स्थान दिया और कहा कि जो व्यक्ति तुम्हारे समय में शुभ काम करे, उसी के काम में तुम विघ्न डालो; बाकी समय में लोग निश्चिंत होकर मंगल कार्य करें। इसीलिए भद्रा का समय पहचानकर उससे बचना एक व्यावहारिक नियम बन गया।
ध्यान रहे कि भद्रा केवल "अशुभ" नहीं है। मुहूर्त ग्रंथों में कहा गया है कि शत्रु पर विजय, मुकदमा, शस्त्र से जुड़े काम, ऑपरेशन या आग से जुड़े कठोर कामों के लिए भद्रा का समय भी लिया जा सकता है। रोक मुख्य रूप से विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नई खरीदारी और त्योहार के मांगलिक संस्कारों पर है।
विष्टि करण और भद्रा की गणना
एक तिथि के दो करण होते हैं, यानी हर करण आधी तिथि का होता है। चंद्र मास में 30 तिथियाँ और 60 करण होते हैं। इनमें चार करण स्थिर हैं (शकुनि, चतुष्पद, नाग, किंस्तुघ्न) और सात चर करण (बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि) क्रम से आठ बार दोहराए जाते हैं। इसलिए विष्टि यानी भद्रा हर महीने आठ बार आती है, और हमेशा इन्हीं तिथियों में:
| पक्ष | तिथि | भद्रा किस आधे में |
|---|---|---|
| शुक्ल पक्ष | चतुर्थी | उत्तरार्ध (दूसरा आधा) |
| शुक्ल पक्ष | अष्टमी | पूर्वार्ध (पहला आधा) |
| शुक्ल पक्ष | एकादशी | उत्तरार्ध |
| शुक्ल पक्ष | पूर्णिमा | पूर्वार्ध |
| कृष्ण पक्ष | तृतीया | उत्तरार्ध |
| कृष्ण पक्ष | सप्तमी | पूर्वार्ध |
| कृष्ण पक्ष | दशमी | उत्तरार्ध |
| कृष्ण पक्ष | चतुर्दशी | पूर्वार्ध |
तिथि की लंबाई रोज़ बदलती है (लगभग 19 से 26 घंटे), इसलिए भद्रा की अवधि भी कभी 10 घंटे के आसपास तो कभी 13 घंटे तक होती है। घड़ी का सही समय दिल्ली या आपके शहर के सूर्योदय और चंद्रमा की गति से निकलता है, जो आज के पंचांग में "करण" वाली पंक्ति में लिखा रहता है। पंचांग के पाँचों अंग पढ़ना सीखना हो तो पंचांग कैसे पढ़ें वाला लेख देखें।
स्वर्ग, पाताल और पृथ्वी पर भद्रा का वास
हर भद्रा एक जैसी नहीं मानी जाती। भद्रा उस समय किस लोक में है, यह चंद्रमा की राशि से तय होता है। मुहूर्त ग्रंथों का सूत्र है कि भद्रा जिस लोक में रहती है, वहीं उसका फल देती है:
- पृथ्वी (मृत्युलोक): चंद्रमा कर्क, सिंह, कुंभ या मीन राशि में हो। यह भद्रा सबसे ज़्यादा टाली जाती है, क्योंकि इसका असर धरती के कामों पर माना गया है।
- स्वर्ग लोक: चंद्रमा मेष, वृषभ, मिथुन या वृश्चिक राशि में हो।
- पाताल लोक: चंद्रमा कन्या, तुला, धनु या मकर राशि में हो।
कई पंचांगकार स्वर्ग और पाताल की भद्रा को पृथ्वी के लिए कम हानिकारक या शुभ भी मानते हैं, इसलिए ऐसे समय में ज़रूरी काम कर लिए जाते हैं। फिर भी विवाह और गृह प्रवेश जैसे बड़े संस्कारों में ज़्यादातर पंडित किसी भी भद्रा को टालना ही ठीक समझते हैं। अपने कुल-पुरोहित की परंपरा मानें।
भद्रा में कौन-से काम वर्जित हैं
- विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन, जनेऊ और नामकरण जैसे संस्कार
- राखी बाँधना और होलिका दहन
- नया व्यापार, दुकान का उद्घाटन, नया वाहन या मकान खरीदना
- यात्रा की शुरुआत, ख़ासकर तीर्थ यात्रा के लिए घर से निकलना
- नए कपड़े या गहने पहली बार पहनना, खेत में बुवाई की शुरुआत
भद्रा के दौरान रोज़ की पूजा, जप, पाठ, दान और व्रत पर कोई रोक नहीं है। आप दीया जलाएँ, हनुमान चालीसा पढ़ें या शिव जी को जल चढ़ाएँ, यह सब बिना संकोच करें। रोक केवल किसी नए शुभ कार्य के आरंभ पर है।
रक्षाबंधन और होलिका दहन में भद्रा
भद्रा की सबसे ज़्यादा चर्चा इन्हीं दो त्योहारों पर होती है, और इसका कारण गणित में छिपा है। दोनों त्योहार पूर्णिमा पर पड़ते हैं, और ऊपर की तालिका देखें तो शुक्ल पूर्णिमा का पहला आधा हिस्सा हमेशा विष्टि करण होता है। यानी पूर्णिमा लगते ही भद्रा शुरू हो जाती है।
राखी पर भद्रा
श्रावण पूर्णिमा पर बहनें भद्रा उतरने के बाद ही राखी बाँधती हैं। लोक में यह कहानी कही जाती है कि शूर्पणखा ने रावण को भद्रा में राखी बाँधी थी और उसी साल रावण का अंत हुआ। धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु जैसे ग्रंथ भी श्रावणी कर्म और रक्षा-बंधन भद्रा रहित अपराह्न में करने को कहते हैं। सही समय हर साल रक्षाबंधन पृष्ठ पर दिया जाता है।
होलिका दहन पर भद्रा
फाल्गुन पूर्णिमा की रात होलिका जलाने का नियम है कि दहन प्रदोष काल में हो, पूर्णिमा हो और भद्रा न हो। अगर भद्रा आधी रात के बाद तक चल रही हो, तो भद्रा पुच्छ में दहन किया जाता है, और अगर पुच्छ भी न मिले तो भद्रा उतरने के बाद। भद्रा मुख में होलिका दहन कभी नहीं किया जाता। इस साल का समय होलिका दहन पृष्ठ पर देखें।
भद्रा मुख और भद्रा पुच्छ
पूरी भद्रा को बराबर नहीं माना जाता। शास्त्रों में भद्रा के शरीर की कल्पना की गई है। उसकी शुरुआती पाँच घड़ी (लगभग दो घंटे) भद्रा मुख कहलाती हैं, जो सबसे कठोर मानी जाती हैं। आख़िरी तीन घड़ी (लगभग सवा घंटा) भद्रा पुच्छ हैं, जिनमें मजबूरी में ज़रूरी शुभ काम किया जा सकता है। मुख और पुच्छ का ठीक-ठीक स्थान तिथि के अनुसार बदलता है, इसलिए इनका समय अनुमान से न निकालें। अच्छे पंचांग में भद्रा के साथ "मुख" और "पुच्छ" का समय अलग से लिखा मिलता है।
भद्रा देखते समय कुछ व्यावहारिक बातें
- भद्रा, राहुकाल और पंचक तीनों अलग चीज़ें हैं। राहुकाल रोज़ आता है, भद्रा महीने में आठ बार, और पंचक हर महीने लगभग पाँच दिन।
- भद्रा का समय शहर बदलने से कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है, क्योंकि करण का अंत तो एक ही क्षण होता है पर सूर्योदय अलग होता है।
- अगर किसी ज़रूरी काम का समय टल नहीं सकता, तो भद्रा पुच्छ या स्वर्ग-पाताल वाली भद्रा देखकर पंडित जी से सलाह लें। डर कर काम छोड़ देने की ज़रूरत नहीं।

