कालभैरव जयंती
कालभैरव जयंती मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को भगवान शिव के कालभैरव रूप के प्रकट होने के दिन के रूप में मनाई जाती है। इसे भैरव अष्टमी भी कहते हैं। काशी के कालभैरव मंदिर में इस दिन विशेष श्रृंगार और रात भर पूजा होती है।
क्या है और क्यों मनाते हैं
शिव पुराण की कथा है कि एक बार ब्रह्मा जी को अपने पाँचवें मुख से अहंकार हो गया और उन्होंने शिव का अपमान किया। तब शिव के क्रोध से कालभैरव प्रकट हुए और उन्होंने ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर काट दिया। ब्रह्महत्या का पाप लगने से भैरव कपाल हाथ में लिए भटकते रहे और काशी पहुँचकर ही मुक्त हुए। वह स्थान कपालमोचन कहलाता है, और तभी से भैरव काशी के कोतवाल हैं।
किस तिथि को
पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी; अमांत पंचांग में यही कार्तिक कृष्ण अष्टमी कहलाती है। भैरव की पूजा रात में होती है, इसलिए वह दिन लिया जाता है जिसमें निशीथ काल में अष्टमी हो। हर महीने की मासिक कालाष्टमी इसी पर्व का छोटा रूप है।
कैसे मनाते हैं
- दिन भर व्रत और रात में भैरव मंदिर में पूजा, जागरण और भजन।
- सरसों के तेल का चौमुखा दीया, काले तिल, उड़द, नीले या काले फूल।
- भोग में इमरती, जलेबी, उड़द के बड़े और नारियल।
- काले कुत्ते को भोजन, और ज़रूरतमंदों को कंबल या अन्न का दान, क्योंकि यह ठंड का समय होता है।
- कालभैरवाष्टक और शिव चालीसा का पाठ।
विधि और सामग्री कालभैरव जयंती पूजा विधि में है।
क्षेत्रीय परंपराएँ
वाराणसी के कालभैरव मंदिर के अलावा उज्जैन के कालभैरव मंदिर में मदिरा का भोग लगाने की पुरानी परंपरा है, जो वहाँ की तांत्रिक पद्धति का हिस्सा है; घर की पूजा में यह नहीं किया जाता। दिल्ली के पुराने किले के पास भैरव मंदिर में भी मेला लगता है। अगहन मास के अन्य पर्व मार्गशीर्ष मास का महत्व में देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कालभैरव जयंती कब होती है?
कालभैरव कौन हैं?
कालभैरव जयंती की पूजा कब करें?
कालभैरव को क्या चढ़ाएं?
भैरव अष्टमी और कालाष्टमी में क्या अंतर है?
टिप्पणियाँ
टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...
