मार्गशीर्ष, जिसे उत्तर भारत में अगहन कहते हैं, हिंदू कैलेंडर का नौवाँ महीना है जो कार्तिक पूर्णिमा के अगले दिन से शुरू होकर मार्गशीर्ष पूर्णिमा तक चलता है। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूँ, इसीलिए यह महीना कृष्ण भक्ति, यमुना-गंगा स्नान, दान और गीता पाठ के लिए खास माना जाता है। इसी महीने में कालभैरव जयंती, विवाह पंचमी, गीता जयंती और दत्तात्रेय जयंती आती हैं।
'मासानां मार्गशीर्षोऽहम्': गीता में उल्लेख
भगवद्गीता के दसवें अध्याय (विभूति योग) के 35वें श्लोक में भगवान अपनी विभूतियाँ गिनाते हुए कहते हैं:
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः॥
यानी सामवेद के गीतों में मैं बृहत्साम हूँ, छंदों में गायत्री, महीनों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में वसंत। पुराने समय में इस महीने में नई फ़सल घर आती थी, मौसम न ज़्यादा गर्म होता न ज़्यादा ठंडा, और कई परंपराओं में साल की शुरुआत भी इसी महीने से मानी जाती थी। "अग्रहायण" यानी वर्ष का अग्र (पहला) महीना, यही शब्द बिगड़कर "अगहन" बना। मार्गशीर्ष नाम इसलिए है कि इस महीने की पूर्णिमा मृगशिरा नक्षत्र के आसपास पड़ती है।
स्कन्द पुराण के वैष्णव खंड में मार्गशीर्ष माहात्म्य है, जिसमें इस महीने में श्रीकृष्ण की पूजा, शंख से अर्घ्य और भागवत-गीता पाठ की बहुत महिमा बताई गई है।
कब से कब
उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग में मार्गशीर्ष कार्तिक पूर्णिमा के बाद की प्रतिपदा से शुरू होता है और मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर पूरा होता है। अंग्रेज़ी कैलेंडर में यह आम तौर पर नवंबर के आख़िरी हफ़्ते से दिसंबर के तीसरे-चौथे हफ़्ते तक रहता है।
2026 में कार्तिक पूर्णिमा 24 नवंबर को है, इसलिए अगहन 25 नवंबर से शुरू होकर मार्गशीर्ष पूर्णिमा, 23 दिसंबर 2026 तक चलेगा (नई दिल्ली)। महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के अमांत पंचांग में यही महीना अमावस्या के बाद शुरू होता है, इसलिए वहाँ कृष्ण पक्ष के त्योहार "कार्तिक" में गिने जाते हैं। तिथि रोज़ जाँचने के लिए आज का पंचांग देखें।
प्रमुख व्रत-त्योहार
| तिथि | व्रत-त्योहार | 2026 में (नई दिल्ली) |
|---|---|---|
| कृष्ण अष्टमी | कालभैरव जयंती | 1 दिसंबर |
| कृष्ण एकादशी | उत्पन्ना एकादशी | 4 दिसंबर |
| अमावस्या | मार्गशीर्ष अमावस्या (पितृ तर्पण) | पंचांग देखें |
| शुक्ल पंचमी | विवाह पंचमी (राम-सीता विवाह) | 14 दिसंबर |
| सूर्य का धनु राशि में प्रवेश | धनु संक्रांति, खरमास शुरू | 16 दिसंबर |
| शुक्ल एकादशी | मोक्षदा एकादशी और गीता जयंती | 20 दिसंबर |
| पूर्णिमा | दत्तात्रेय जयंती, अन्नपूर्णा जयंती, मार्गशीर्ष पूर्णिमा | 23 दिसंबर |
मोक्षदा एकादशी की कथा, जिसमें राजा वैखानस अपने पिता को नरक से मुक्त कराते हैं, मोक्षदा एकादशी व्रत कथा में पढ़ें। विवाह पंचमी तक शादियों का मौसम ज़ोरों पर रहता है, लेकिन धनु संक्रांति के साथ खरमास शुरू होते ही मकर संक्रांति तक विवाह मुहूर्त बंद हो जाते हैं।
अगहन के गुरुवार और लक्ष्मी पूजा
मार्गशीर्ष के हर गुरुवार को लक्ष्मी जी की पूजा की परंपरा कई राज्यों में है। महाराष्ट्र में इसे मार्गशीर्ष गुरुवार महालक्ष्मी व्रत कहते हैं, ओडिशा में "माणबसा गुरुवार", और छत्तीसगढ़ में भी अगहन के बृहस्पतिवार को महिलाएँ लक्ष्मी पूजा करती हैं। उत्तर प्रदेश-बिहार में यह उतना व्यापक नहीं, पर गुरुवार को विष्णु-लक्ष्मी की पूजा यहाँ भी होती है।
- बुधवार की रात या गुरुवार सुबह घर की अच्छी सफ़ाई करें, द्वार पर चावल के आटे से अल्पना या रंगोली बनाएं, जिसमें लक्ष्मी जी के पैर बनाए जाते हैं।
- चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर कलश रखें, उस पर आम के पत्ते और नारियल रखें। ओडिशा में धान से भरा "माण" (नापने का पात्र) लक्ष्मी का प्रतीक बनता है।
- लक्ष्मी जी को हल्दी, रोली, कमल या लाल फूल, और खीर या मीठे पकवान का भोग लगाएं।
- व्रत रखने वाली महिलाएँ दिन में एक बार सात्विक भोजन करती हैं और शाम को कथा सुनकर लक्ष्मी जी की आरती करती हैं।
- महीने के आख़िरी गुरुवार को उद्यापन होता है, जिसमें सुहागिन महिलाओं को हल्दी-कुमकुम और प्रसाद दिया जाता है।
स्नान और दान
कार्तिक की तरह अगहन में भी सूर्योदय से पहले स्नान की परंपरा है। मथुरा-वृंदावन में यमुना स्नान, और प्रयागराज, काशी, हरिद्वार में गंगा स्नान का विशेष महत्व माना जाता है। घर पर स्नान करें तो पानी में थोड़ा गंगाजल और तुलसी दल मिला लें।
- शंख पूजा: स्कन्द पुराण के अनुसार इस महीने शंख में जल भरकर श्रीकृष्ण को अर्घ्य देना बहुत शुभ है। शंख को पंचामृत से स्नान कराकर पूजा घर में रखें।
- दान: ठंड शुरू होती है, इसलिए कंबल, ऊनी कपड़े, गुड़, तिल और अन्न का दान सबसे उपयोगी है। पूर्णिमा पर अन्नपूर्णा जयंती होती है, इस दिन भोजन दान का विशेष चलन है।
- पितृ तर्पण: मार्गशीर्ष अमावस्या पर पितरों के लिए तर्पण और ब्राह्मण भोजन कराया जाता है।
- पाठ: रोज़ गीता का एक अध्याय, विष्णु सहस्रनाम या "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जप।
क्या खाएं
अगहन नई फ़सल का महीना है। धान कटकर आता है, इसलिए बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में "नवान्न" की परंपरा है: नए चावल का भात, दही, गुड़ और चूड़ा पहले कुलदेवता और पितरों को चढ़ाकर फिर घर में खाया जाता है।
- खाने में शामिल करें: नया चावल, गुड़, तिल, मूँगफली, हरी सब्ज़ियाँ (मटर, पालक, बथुआ), गाजर, आँवला और घी।
- लोक कहावत: घाघ की प्रसिद्ध कहावत में "अगहन जीरा, पूसे धना" आता है, यानी अगहन में जीरा और पूस में धनिया कम खाने की सलाह। कई घरों में इस महीने जीरे का छौंक कम लगाया जाता है।
- व्रत के दिनों में: एकादशी पर चावल नहीं खाया जाता; फलाहार में कुट्टू, सिंघाड़ा, साबूदाना, फल और दूध लें।
- बचें: गुरुवार को लक्ष्मी व्रत रखने वाले घरों में उस दिन लहसुन-प्याज़ और मांसाहार नहीं बनता।
अगहन का सबसे सुंदर पर्व विवाह पंचमी है। इसे घर पर कैसे मनाएं, यह विवाह पंचमी: राम-सीता विवाह उत्सव में पढ़ें।

