जन्माष्टमी पूजा विधि: रात 12 बजे का जन्मोत्सव

जन्माष्टमी भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को मनाई जाती है; दिन भर व्रत रखकर रात 12 बजे लड्डू गोपाल का पंचामृत से अभिषेक, श्रृंगार, पालना झुलाना, भोग और आरती की जाती है। पारण अगली सुबह या परिवार की परंपरा के अनुसार आधी रात की पूजा के बाद होता है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 6 मिनट का पाठ
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जन्माष्टमी की पूजा का केंद्र है आधी रात का वह पल, जब माना जाता है कि मथुरा के कारागार में देवकी के आठवें पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण प्रकट हुए। भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को लोग दिन भर व्रत रखते हैं, शाम को झांकी सजाते हैं और ठीक रात 12 बजे लड्डू गोपाल का अभिषेक, श्रृंगार और आरती करके जन्मोत्सव मनाते हैं। इस साल की तिथि और निशीथ मुहूर्त कृष्ण जन्माष्टमी पृष्ठ पर देखें।

स्मार्त और वैष्णव जन्माष्टमी: दो दिन क्यों पड़ती है

कई बार कैलेंडर में जन्माष्टमी दो दिन लिखी होती है और घर में बहस छिड़ जाती है कि व्रत कब रखें। इसका कारण तिथि गिनने का तरीका है। स्मार्त परंपरा (ज़्यादातर गृहस्थ) उस रात जन्मोत्सव मनाती है जिस रात अष्टमी तिथि आधी रात यानी निशीथ काल में हो। वैष्णव परंपरा, जिसमें मथुरा-वृंदावन के कई मंदिर और इस्कॉन जैसे संप्रदाय आते हैं, अक्सर उस दिन को मानती है जिस दिन सूर्योदय के समय अष्टमी हो, और रोहिणी नक्षत्र को भी महत्व देती है।

सीधा नियम यह है कि आप जिस परंपरा से जुड़े हैं, उसी को मानें। अगर घर में कोई ख़ास परंपरा नहीं है तो अपने इलाके के मंदिर या कुल पुरोहित की बात मान लें। दोनों दिनों में से किसी एक दिन श्रद्धा से की गई पूजा अधूरी नहीं मानी जाती।

जन्माष्टमी पूजा सामग्री

सामान एक दिन पहले जुटा लें, ताकि आधी रात को भागदौड़ न हो।

  • लड्डू गोपाल या बाल कृष्ण की मूर्ति, न हो तो श्रीकृष्ण का चित्र
  • छोटा पालना या झूला, नई पोशाक, मुकुट, बाँसुरी, मोरपंख, छोटी माला
  • अभिषेक के लिए पंचामृत: दूध, दही, घी, शहद और मिश्री
  • गंगाजल या साफ़ पानी, एक बड़ी थाली या परात जिसमें स्नान कराएँ
  • खीरा डंठल वाला (उत्तर भारत में खीरे से जन्म की रस्म के लिए)
  • चंदन, रोली, अक्षत, तुलसी दल, पीले और सफ़ेद फूल
  • भोग: माखन-मिश्री, धनिया पंजीरी, फल, पंचमेवा, घर की बनी मिठाई
  • दीपक, घी, रुई की बत्ती, धूप, कपूर, शंख और घंटी
  • साफ़ लाल या पीला कपड़ा चौकी के लिए

कोई चीज़ न मिले तो परेशान न हों। मोरपंख न हो तो फूलों से मुकुट सजा दें, पालना न हो तो एक छोटी टोकरी में कपड़ा बिछाकर झूले जैसा बना लें। शहद न हो तो पंचामृत बाकी चार चीज़ों से बन जाता है। भगवान को भाव चाहिए, सामान की सूची नहीं।

मध्यरात्रि पूजा विधि

सुबह स्नान करके हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर व्रत का संकल्प लें: "मैं आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत रख रहा/रही हूँ, भगवान इसे स्वीकार करें।" दिन में फलाहार या निर्जल, जैसा आपकी सेहत और परंपरा अनुमति दे। शाम को घर साफ़ करके झांकी तैयार करें। फिर रात की पूजा इस क्रम से करें:

  1. रात 11:30 के आसपास पूजा स्थान पर बैठ जाएँ। दीपक जलाएँ और पहले गणेश जी का स्मरण करें।
  2. लड्डू गोपाल को थाली में रखें। खीरे के बीच में उन्हें रखने की रस्म हो तो खीरा तैयार रखें।
  3. ठीक 12 बजे शंख बजाएँ, घंटी बजाएँ। जिन घरों में खीरा काटने की रीत है, वहाँ इसी पल खीरे का डंठल काटकर अलग किया जाता है, जैसे नाल काटी जाती है।
  4. पहले गंगाजल से, फिर पंचामृत से, फिर दोबारा शुद्ध जल से अभिषेक करें। अभिषेक का पंचामृत अलग बर्तन में इकट्ठा कर लें, यही प्रसाद बनेगा।
  5. मुलायम कपड़े से पोंछकर नई पोशाक पहनाएँ, मुकुट, बाँसुरी और माला लगाएँ। चंदन का तिलक करें।
  6. तुलसी दल के साथ माखन-मिश्री, पंजीरी और बाकी भोग अर्पित करें। तुलसी के बिना कृष्ण भोग अधूरा माना जाता है।
  7. लड्डू गोपाल को पालने में बिठाकर हल्के से झुलाएँ। घर के सभी लोग बारी-बारी से झूला झुलाते हैं।
  8. धूप-दीप से आरती कुंजबिहारी की गाएँ, फिर "नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की" के जयकारे लगाएँ।
  9. प्रसाद में पंचामृत और पंजीरी सबको बाँटें।

पूजा से पहले या बाद में जन्म की कथा सुनने का भी रिवाज है। पूरी कथा जन्माष्टमी व्रत कथा पर पढ़ें: कंस का अत्याचार, कारागार में जन्म और वसुदेव का यमुना पार कर बालक को गोकुल पहुँचाना।

झांकी और पालना कैसे सजाएं

झांकी जन्माष्टमी का सबसे प्यारा हिस्सा है, ख़ासकर बच्चों के लिए। घर में बड़ी जगह न हो तो एक कोने में भी सुंदर झांकी बन जाती है।

आसान झांकी के विचार

  • कारागार का दृश्य: गत्ते से दीवारें और सलाखें, अंदर देवकी-वसुदेव के छोटे खिलौने।
  • यमुना पार: नीले कपड़े या पन्नी से नदी, टोकरी में बाल कृष्ण, ऊपर शेषनाग की छाया।
  • गोकुल: मिट्टी के खिलौना-गाय, मटकियाँ, हरी घास के लिए सरसों या गेहूँ के अंकुर (जो एक हफ़्ता पहले बो दिए जाएँ)।

पालने को फूलों और गोटे से सजाएँ, अंदर मुलायम गद्दी रखें। रात को झांकी में दीये या छोटी लाइट लगाएँ, पर कपड़े और कागज़ से दूर रखें।

धनिया पंजीरी और पंचामृत

उत्तर भारत में जन्माष्टमी का ख़ास प्रसाद धनिया पंजीरी है, क्योंकि व्रत में अनाज नहीं लिया जाता और धनिया फलाहार में चल जाता है। साबुत धनिया को पीसकर पाउडर बना लें, थोड़े घी में धीमी आँच पर सुनहरा होने तक भूनें, ठंडा होने पर पिसी चीनी या बूरा, कटे मखाने, कद्दूकस नारियल, कटे मेवे और चाहें तो चिरौंजी मिला दें। यह पंजीरी हफ़्ते भर ख़राब नहीं होती।

पंचामृत कैसे और किस अनुपात में बनाएँ, और यह चरणामृत से कैसे अलग है, यह विस्तार से पंचामृत कैसे बनाएं लेख में दिया है।

जन्माष्टमी व्रत में क्या खाएं

जो लोग निर्जल नहीं रहते वे दिन में फल, दूध, दही, मखाने, साबूदाना, सिंघाड़े या कुट्टू के आटे की चीज़ें, सेंधा नमक वाली आलू की सब्ज़ी ले सकते हैं। गेहूँ, चावल, दाल, प्याज़-लहसुन और साधारण नमक से परहेज़ किया जाता है। बुज़ुर्ग, गर्भवती महिलाएँ और दवा लेने वाले लोग अपनी सेहत के हिसाब से ही व्रत रखें।

पारण और नंदोत्सव

पारण यानी व्रत खोलने को लेकर घरों में अलग-अलग रीत है। बहुत से परिवार आधी रात की पूजा के बाद पंचामृत और पंजीरी का प्रसाद लेकर व्रत खोल लेते हैं। कुछ परिवार, ख़ासकर वैष्णव परंपरा वाले, अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण करते हैं, जब अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र दोनों बीत चुके हों। अगले दिन का समय जानने के लिए आज का पंचांग देख लें।

अगला दिन नंदोत्सव का होता है। गोकुल में नंद बाबा ने बेटे के जन्म की ख़ुशी में जो उत्सव मनाया था, उसी की याद में मंदिरों में दही-हल्दी की होली खेली जाती है, बधाई गीत गाए जाते हैं और खिलौने-मिठाई बाँटी जाती है। घर पर आप बच्चों को माखन-मिश्री बाँटकर, गरीबों को भोजन कराकर या गाय को चारा देकर यह दिन मना सकते हैं।

जन्माष्टमी के बाद भी जो लोग घर में लड्डू गोपाल को रखते हैं, उनके लिए रोज़ की सेवा के नियम लड्डू गोपाल की सेवा वाले लेख में हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जन्माष्टमी की पूजा किस समय करनी चाहिए?

मुख्य पूजा निशीथ काल में यानी रात लगभग 12 बजे के आसपास की जाती है, क्योंकि मान्यता है कि श्रीकृष्ण का जन्म आधी रात को हुआ था। सटीक मुहूर्त हर साल पंचांग में दिया जाता है।

जन्माष्टमी पर खीरा क्यों काटा जाता है?

उत्तर भारत के कई घरों में डंठल वाले खीरे में लड्डू गोपाल को रखकर आधी रात को डंठल काटा जाता है। इसे जन्म के समय नाल काटने का प्रतीक माना जाता है। यह लोक परंपरा है, हर घर में नहीं होती।

जन्माष्टमी का व्रत कब खोलें?

कई परिवार आधी रात की पूजा के बाद प्रसाद लेकर व्रत खोलते हैं, जबकि कुछ अगले दिन सूर्योदय के बाद अष्टमी और रोहिणी समाप्त होने पर पारण करते हैं। अपने परिवार की परंपरा के अनुसार करें।

स्मार्त और वैष्णव जन्माष्टमी में क्या अंतर है?

स्मार्त परंपरा उस रात उत्सव मनाती है जब आधी रात को अष्टमी हो, जबकि वैष्णव परंपरा सूर्योदय वाली अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र को महत्व देती है। इसलिए कभी-कभी दोनों एक दिन के अंतर पर पड़ते हैं।

जन्माष्टमी पर धनिया पंजीरी ही क्यों बनाते हैं?

व्रत में अनाज नहीं खाया जाता और धनिया फलाहार में मान्य है, इसलिए भुने धनिये, मखाने, मेवे और चीनी से बनी पंजीरी प्रसाद के रूप में चढ़ाई जाती है। यह उत्तर भारत की पुरानी रीत है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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