सफला एकादशी
सफला एकादशी क्या है
सफला एकादशी का नाम ही बताता है कि यह कामों को सफल करने वाली एकादशी है। सर्दियों की इस एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा मौसमी फलों से की जाती है और रात में दीपदान व जागरण का विशेष महत्व है। मान्यता है कि सच्चे मन से किया यह व्रत भटके हुए जीवन को भी सही राह पर ले आता है।
किस तिथि को आती है
पूर्णिमांत पंचांग में यह पौष कृष्ण पक्ष की एकादशी है। अमांत पंचांग में इसे मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी लिखा जाता है, दिन वही रहता है। व्रत सूर्योदय-व्यापिनी एकादशी पर रखते हैं।
कथा संक्षेप में
चंपावती के राजा महिष्मान का बड़ा बेटा लुंभक बुरे कामों में डूबा रहता था, इसलिए राजा ने उसे राज्य से निकाल दिया। वह जंगल में एक पुराने पीपल के नीचे रहने लगा। पौष कृष्ण दशमी की रात कड़ाके की ठंड से वह बेहोश-सा पड़ा रहा, अगले दिन कुछ खा नहीं पाया, और शाम को बीने हुए फल पीपल की जड़ में रखकर भगवान से क्षमा माँगी। ठंड के कारण रात भर जागता रहा। अनजाने में हुए इस व्रत से उसका मन बदल गया, उसे राज्य वापस मिला और आगे चलकर वह धर्मात्मा राजा बना।
पूजा कैसे करें
सुबह विष्णु जी को नारियल, अनार, आँवला, बेर, केला जैसे मौसमी फल, तुलसी दल और धूप-दीप चढ़ाएँ। शाम को घर और मंदिर में दीपक जलाएँ, हो सके तो रात में भजन-कीर्तन करें। इस दिन पीपल की पूजा भी कई घरों में होती है। व्रत में क्या खाएँ, इसके लिए एकादशी में क्या खाएँ देखें, और सामान्य कथा एकादशी व्रत कथा में पढ़ें। अगली एकादशी पौष पुत्रदा एकादशी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सफला एकादशी किस महीने में आती है?
सफला एकादशी पर भगवान को क्या चढ़ाएँ?
इस व्रत का फल क्या है?
क्या रात में जागरण ज़रूरी है?
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