काली पूजा
काली पूजा दीपावली की रात, कार्तिक अमावस्या को, माँ काली की आराधना का पर्व है। यह मुख्य रूप से बंगाल, ओडिशा, असम, त्रिपुरा और बिहार के मिथिला क्षेत्र में मनाया जाता है, जहाँ इस रात लक्ष्मी पूजा की जगह या उसके साथ श्यामा माँ की पूजा होती है।
क्या है और क्यों मनाते हैं
दुर्गा सप्तशती और कालिका पुराण की परंपरा में काली देवी का वह रूप हैं जो अंधकार और अहंकार का नाश करती हैं। रक्तबीज असुर की कथा प्रसिद्ध है, जिसके रक्त की हर बूंद से नया असुर पैदा होता था; माँ काली ने उसका रक्त धरती पर गिरने से पहले ही पी लिया। उत्तर भारत के पाठकों के लिए समझें तो यह दीपावली का शाक्त रूप है, जिसे श्यामा पूजा भी कहते हैं।
किस तिथि को
पूर्णिमांत पंचांग में कार्तिक अमावस्या; अमांत में यही आश्विन अमावस्या है। काली पूजा आधी रात (निशीथ काल) में होती है, इसलिए वह दिन लिया जाता है जिसकी मध्यरात्रि में अमावस्या हो। अधिकतर साल यह दीपावली और लक्ष्मी पूजा वाली रात ही होती है, पर कभी-कभी एक दिन का अंतर आ सकता है।
कैसे मनाते हैं
- पंडालों और घरों में माँ काली की मिट्टी की प्रतिमा की स्थापना।
- रात भर पूजा, लाल गुड़हल (जवा) के फूलों की माला, दीये और मोमबत्तियाँ।
- भोग में खिचड़ी, खीर, मिठाई और फल; कई परिवार मसूर दाल और मछली भी चढ़ाते हैं, जो बंगाल की परंपरा है।
- अगले दिन या कुछ दिनों बाद प्रतिमा का नदी या तालाब में विसर्जन।
क्षेत्रीय परंपराएँ
कोलकाता के कालीघाट और दक्षिणेश्वर मंदिर में इस रात बहुत भीड़ होती है। असम के कामाख्या मंदिर में भी विशेष पूजा होती है। मिथिला में दीपावली की रात उक्का-पाती के साथ काली पूजा भी होती है। घर पर देवी की पूजा के बाद जय अम्बे गौरी आरती गा सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
काली पूजा कब होती है?
काली पूजा कहाँ मनाई जाती है?
काली पूजा और दिवाली की लक्ष्मी पूजा में क्या अंतर है?
माँ काली को कौन सा फूल चढ़ाएं?
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