श्री काळी एकाक्षरी (चिंतामणि)
श्रीगणेशाय नमः | श्रीगुरुभ्यो नमः | हरिः ॐ |
शुचिः –
अपवित्रः पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपि वा |
यः स्मरेत् पुंडरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतरः शुचिः ||
पुंडरीकाक्ष पुंडरीकाक्ष पुंडरीकाक्ष ||
आचम्य –
क्रीं | क्रीं | क्रीं | (इति त्रिवारं जलं पिबेत्)
ॐ काळ्यै नमः | (ओष्टौ प्रक्षाळ्य)
ॐ कपालिन्यै नमः | (ओष्टौ)
ॐ कुल्लयै नमः | (हस्तप्रक्षाळनं)
ॐ कुरुकुल्लायै नमः | (मुखं)
ॐ विरोधिन्यै नमः | (दक्षिण नासिका)
ॐ विप्रचित्तायै नमः | (वाम नासिका)
ॐ उग्रायै नमः | (दक्षिण नेत्रं)
ॐ उग्रप्रभायै नमः | (वाम नेत्रं)
ॐ दीप्तायै नमः | (दक्षिण कर्णं)
ॐ नीलायै नमः | (वाम कर्णं)
ॐ घनायै नमः | (नाभिं)
ॐ बलाकायै नमः | (हृदयं)
ॐ मात्रायै नमः | (मस्तकं)
ॐ मुद्रायै नमः | (दक्षिण स्कंधं)
ॐ मितायै नमः | (वाम स्कंधं) ||प्रार्थना||
गुरु प्रार्थना –
अखंडमंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरं |
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ||
ज्ञानशक्तिसमारूढः तत्त्वमालाविभूषितः |
भुक्तिमुक्तिप्रदाता च तस्मै श्रीगुरवे नमः ||
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः |
गुरुस्साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ||
श्रीगणेश प्रार्थना –
विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय
लंबोदराय सकलाय जगद्धिताय |
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय
गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते ||
वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ |
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ||
श्रीदक्षिणामूर्ति प्रार्थना –
भस्मं व्यापांडुरांग शशिशकलधरो ज्ञानमुद्राक्षमाला
वीणापुस्तेर्विराजत्करकमलधरो लोकपट्टाभिरामः |
व्याख्यापीठेनिषण्णा मुनिवरनिकरैः सेव्यमान प्रसन्नः
सव्यालकृत्तिवासाः सततमवतु नो दक्षिणामूर्तिमीशः ||
श्रीमहाकालभैरव प्रार्थना –
महाकालं यज्जेद्देव्या दक्षिणे धूम्रवर्णकं
बिभ्रतं दंडखट्वांगौ दंष्ट्राभीममुखं शिशुं |
त्रिनेत्रमूर्ध्वकेशं च मुंडमालाविभूषितं
जटाभारलसच्चंद्रखंडमुग्रं ज्वलन्निभं ||संकल्पं||
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः | ॐ तत्सत् श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य श्रीब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वंतरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जंबूद्वीपे भरतखंडे भारतवर्षे पुण्यभूप्रदेशे ___ प्रदेशे ___ संवत्सरे ___ अयणे ___ ऋतुः ___ मासे ___ पक्षे ___ तिथौ, ___ वासरे ___ गोत्रोत्पन्न ___ नामधेयाहं श्रीकाळिका देवी प्रीत्यर्थं क्रीमिति एकाक्षरी मंत्रजपं करिष्ये ||प्राणानायम्य||
क्रीं (इति बीजेन त्रिवारं प्राणायामं कुर्यात्) ||अथ काळी कवचं||
श्री दक्षिणकाळिका कवचं पठतु ||अथ काळी हृदयं||
श्री दक्षिणकाळी हृदयं पठतु ||मंत्र विनियोगः||
अस्य श्री काळी एकाक्षरी मंत्रस्य भैरव ऋषिः उष्णिक् छंदः श्री दक्षिणकालिका देवता कं बीजं ईं शक्तिः रं कीलकं सर्वाभीष्टसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः |
ऋष्यादि न्यासः –
ॐ भैरव ऋषये नमः शिरसि |
उष्णिक् छंदसे नमः मुखे |
दक्षिणकाळिका देवतायै नमः हृदि |
कं बीजाय नमः गुह्ये |
ईं शक्तये नमः पादयोः |
रं कीलकाय नमः नाभौ |
विनियोगाय नमः सर्वांगे |
करन्यासः –
ॐ क्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः |
ॐ क्रीं तर्जनीभ्यां नमः |
ॐ क्रूं मध्यमाभ्यां नमः |
ॐ क्रैं अनामिकाभ्यां नमः |
ॐ क्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः |
ॐ क्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः |
हृदयादिन्यासः –
ॐ क्रां हृदयाय नमः |
ॐ क्रीं शिरसे स्वाहा |
ॐ क्रूं शिखायै वषट् |
ॐ क्रैं कवचाय हुं |
ॐ क्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् |
ॐ क्रः अस्त्राय फट् |
ॐ भूर्भुवस्सुवः इति दिग्बंधः |
व्यापक न्यासः- क्रीं (इति मंत्रेण त्रिवारं व्यापकं कुर्यात्)
ध्यानं |
कराळवदनां घोरां मुक्तकेशीं चतुर्भुजां |
काळिकां दक्षिणां दिव्यां मुंडमालाविभूषितां || 1 ||
सद्यश्छिन्नशिरः खड्गवामाधोर्ध्वकरांबुजां |
अभयं वरदं चैव दक्षिणोर्ध्वाधपाणिकां || 2 ||
महामेघप्रभां श्यामां तथा चैव दिगंबरीं |
कंठावसक्तमुंडाली गलद्रुधिरचर्चितां || 3 ||
कर्णावतंसतानीत शवयुग्मभयानकां |
घोरदंष्ट्रां कराळास्यां पीनोन्नतपयोधरीं || 4 ||
शवानां करसंघातैः कृतकांची हसन्मुखीं |
सृक्कद्वयगलद्रक्तधारा विस्फुरिताननां || 5 ||
घोररावां महारौद्रीं श्मशानालयवासिनीं |
बालार्कमंडलाकार लोचनत्रितयान्वितां || 6 ||
दंतुरां दक्षिणव्यापि मुक्तालंबिक चोच्चयां |
शवरूपमहादेवहृदयोपरिसंस्थितां || 7 ||
शिवाभिर्घोररावाभिश्चतुर्दिक्षुसमन्वितां |
महाकालेन च समं विपरीत रतातुरां || 8 ||
सुखप्रसन्नवदनां स्मेराननसरोरुहां |
एवं संचिंतयेत् काळीं सर्वकामसमृद्धिदां || 9 ||
लमित्यादि पंचपूजा –
ॐ क्रीं काळिकायै नमः लं पृथ्वीतत्त्वात्मकं गंधं काळिका देवी प्रीतये समर्पयामि |
ॐ क्रीं काळिकायै नमः हं आकाशतत्वात्मकं पुष्पं काळिका देवी प्रीतये समर्पयामि |
ॐ क्रीं काळिकायै नमः यं वायुतत्त्वात्मकं धूपं काळिका देवी प्रीतये आघ्रापयामि |
ॐ क्रीं काळिकायै नमः रं वह्नितत्वात्मकं दीपं काळिका देवी प्रीतये दर्शयामि |
ॐ क्रीं काळिकायै नमः वं जलतत्त्वात्मकं नैवेद्यं काळिका देवी प्रीतये निवेदयामि |
ॐ क्रीं काळिकायै नमः सं सर्वतत्त्वात्मकं सर्वोपचाराणि मनसा परिकल्प्य काळिका देवी प्रीतये समर्पयामि |
कुल्लुकादि मंत्राः –
1। कुल्लुका – क्रीं हूं स्त्रीं ह्रीं फट् (शिखा स्थाने द्वादशवारं जपेत्)
2। सेतुः – ॐ (इति हृदये स्थाने द्वादशवारं जपेत्)
3। महासेतुः – क्रीं (इति कंठस्थाने द्वादशवारं जपेत्)
4। मुखशोधन – क्रीं क्रीं क्रीं ॐ ओं ॐ क्रीं क्रीं क्रीं(इति सप्तवारं जपेत्)
5। निर्वाण – ॐ अं क्रीं ऐं | अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं लुं* लूं* एं ऐं ॐ औं अं अः कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं क्षं ॐ (इति नाभिं स्पृशेत्)
6। प्राणयोग – ह्रीं क्रीं ह्रीं (इति हृदये सप्तवारं जपेत्)
7। दीपनी – ॐ क्रीं ॐ (इति हृदये सप्तवारं जपेत्)
8। निद्राभंगः – ईं क्रीं ईं (इति हृदये स्थाने दशवारं जपेत्)
9। अशौचभंगः – ॐ क्रीं ॐ (इति हृदये सप्तवारं जपेत्)
10। गायत्री – ॐ काळिकायै च विद्महे श्मशानवासिन्यै धीमहि तन्नोऽघोरा प्रचोदयात् | (इति हृदये त्रिवारं जपेत्)
एकाक्षरी मंत्रः – क्रीं |
उत्तरन्यासः –
ॐ क्रां हृदयाय नमः |
ॐ क्रीं शिरसे स्वाहा |
ॐ क्रूं शिखायै वषट् |
ॐ क्रैं कवचाय हुं |
ॐ क्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् |
ॐ क्रः अस्त्राय फट् |
भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्विमोकः |
जपसमर्पणं –
गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपं |
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान्महेश्वरि ||
सर्वं श्रीमहाकाळ्यर्पणमस्तु |
क्षमायाचना –
अपराधसहस्राणि क्रियंतेऽहर्निशं मया |
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि || 1 ||
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनं |
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि || 2 ||
मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि |
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे || 3 ||
बलि मंत्रः – क्रीं काळीं नारिकेळ/जंबीर बलिं समर्पयामि नमः |
होम मंत्रः – क्रीं स्वाहा |
तर्पण मंत्रः – क्रीं नमः काळिकां तर्पयामि स्वाहा |
मार्जन मंत्रः – क्रीं काळिका देवीं अभिषिंचामि नमः |
अर्थ
श्री काली एकाक्षरी (चिंतामणि) स्तोत्र 'क्रीं' नामक एकाक्षरी बीज मंत्र पर केंद्रित एक संक्षिप्त किंतु पूर्ण तांत्रिक-भक्ति साधना पद्धति है। यह पूर्व तैयारी के शुद्धिकरण (बाह्य/आंतरिक), गुरु, गणपति और दक्षिणामूर्ति के आह्वान, पूर्ण न्यास सेट (करन्यास, हृदयादि, उत्तर-न्यास), बीज और महाविद्या उपयोग, ध्यान (भयंकर दक्षिणा काली का विज़ुअलाइज़ेशन), पंचोपचार पूजा विधि, और विशेष सहायक मंत्रों (कुल्लुका श्रृंखला, प्राणायाम, मार्जन, तर्पण, होम सूत्र) का एक संग्रह है। व्यावहारिक रूप से, यह शरीर और मन को काली के मंदिर के रूप में पवित्र करने की एक प्रणाली है।
इस पद्धति के माध्यम से, अनुष्ठानिक शुद्धिकरण, बीज-प्रेरित प्राणायाम, अंगों और चक्रों पर बीज अक्षरों का सटीक स्थापन, और निरंतर जप/ध्यान द्वारा, साधक देवी की सुरक्षात्मक और परिवर्तनकारी ऊर्जा को आंतरिक रूप से आत्मसात करता है। स्तोत्र के प्रारंभ में शुद्धिकरण के साथ संकल्प लिया जाता है, जिसमें पुंडरीकाक्ष के स्मरण से बाह्य और आंतरिक शुद्धि का संकेत दिया गया है। आचमन (क्रीं) और अन्य आचार-विधियों के माध्यम से शरीर और प्राणों को देवी के समीप लाने की विधि बताई गई है। गुरु प्रार्थना, गणेश, दक्षिणामूर्ति और महाकाल भैरव के आह्वान से साधक को आध्यात्मिक बल प्राप्त होता है।
ध्यान भाग में, दक्षिणा काली के भयंकर रूप का, शवासन पर विराजमान और मुंडमालाओं से अलंकृत रूप का ध्यान करने का निर्देश है। उनके पादाभिषेक, दांतों और कर्णों के विन्यास जैसे स्वरूप चित्रों के माध्यम से भक्ति-दर्शन संभव बताया गया है। इसके बाद, पंचोपचार पूजा में गंध, पुष्प, दीप, नैवेद्य और समग्र उपचारों को अर्पित करने की विधि दी गई है, जो शक्ति-आस्थान के निर्माण का संदेश देती है। स्तोत्र में विभिन्न कुल्लुकादि मंत्र, विशिष्ट न्यास, प्राणायाम, दीपनीय, निद्राभंग, अशौचभंग जैसे आचार सूत्र भी शामिल हैं, जो साधक को अचल शक्ति, मन की शांति और मंत्र सिद्धि प्रदान करते हैं।
यह साधना भयंकर (उग्र) कल्पना को उपचारात्मक निर्देशों (शुद्धि मंत्र, पुनर्स्थापना अनुष्ठान) के साथ संतुलित करती है, ताकि साधक को सुरक्षा और आंतरिक शुद्धि दोनों प्राप्त हो सकें। इस मैनुअल में क्रमिक अभ्यास (साप्ताहिक मंत्र, अवधि दिशानिर्देश) दिए गए हैं और गोपनीयता और पवित्रता के बारे में चेतावनियाँ भी हैं: प्रभावशीलता केवल अनुशासन, शास्त्र-अनुपालन और गुरु-कृपा से ही उत्पन्न होती है। यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अनर्ह व्यक्तियों के लिए यह खतरनाक हो सकता है। कर्मों में यह कोई लघु मार्ग नहीं है; जो लोग इस पद्धति को पूजा के रूप में, गुरु के मार्गदर्शन में और शुद्धि नियमों के साथ अपनाते हैं, उन्हें ही दीर्घकालिक और स्थिर परिणाम प्राप्त होते हैं।
लाभ (Benefits):
- अचल शक्ति और आंतरिक सुरक्षा: मंत्र शक्ति का तीव्र प्रवर्धन होता है और आंतरिक सुरक्षा बढ़ती है, जिससे साधक को किसी भी प्रकार की बाधा से मुक्ति मिलती है।
- बाधाओं का निवारण और शत्रुनाश: जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करता है और शत्रुओं के प्रभाव को निष्क्रिय करता है, भय का निवारण कर साहस प्रदान करता है।
- वाक् सिद्धि और रचनात्मक प्रेरणा: वाक् सिद्धि प्रदान करता है, जिससे वाणी प्रभावशाली बनती है। साथ ही रचनात्मक प्रेरणा और ज्ञान में वृद्धि होती है।
- आर्थिक और पारिवारिक समृद्धि: धन, संतान और अन्य भौतिक तथा पारिवारिक आशीर्वाद प्राप्त होते हैं, जिससे जीवन में समृद्धि आती है।
- आध्यात्मिक प्रगति और मोक्ष: आध्यात्मिक मार्ग पर तीव्र प्रगति में सहायता करता है, अंततः मोक्ष या मुक्ति प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री काळी एकाक्षरी (चिंतामणि) स्तोत्र क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री काळी एकाक्षरी स्तोत्र का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस मंत्र का कितनी बार जप करना चाहिए?
श्री काळी एकाक्षरी (चिंतामणि) स्तोत्र का उद्गम क्या है?
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