श्री मातंगिनी कवचं (त्रैलोक्यमंगळ कवचं)
श्रीदेव्युवाच |
साधु साधु महादेव कथयस्व सुरेश्वर |
मातंगीकवचं दिव्यं सर्वसिद्धिकरं नृणां || 1 ||
श्री ईश्वर उवाच |
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि मातंगीकवचं शुभं |
गोपनीयं महादेवि मौनी जापं समाचरेत् || 2 ||
अस्य श्रीमातंगीकवचस्य दक्षिणामूर्तिरृषिः विराट् छंदः मातंगी देवता चतुर्वर्गसिद्ध्यर्थे विनियोगः ||
ॐ शिरो मातंगिनी पातु भुवनेशी तु चक्षुषी |
तोडला कर्णयुगळं त्रिपुरा वदनं मम || 3 ||
पातु कंठे महामाया हृदि माहेश्वरी तथा |
त्रिपुष्पा पार्श्वयोः पातु गुदे कामेश्वरी मम || 4 ||
ऊरुद्वये तथा चंडी जंघयोश्च हरप्रिया |
महामाया पादयुग्मे सर्वांगेषु कुलेश्वरी || 5 ||
अंगं प्रत्यंगकं चैव सदा रक्षतु वैष्णवी |
ब्रह्मरंध्रे सदा रक्षेन्मातंगी नाम संस्थिता || 6 ||
रक्षेन्नित्यं ललाटे सा महापिशाचिनीति च |
नेत्रायोः सुमुखी रक्षेद्देवी रक्षतु नासिकां || 7 ||
महापिशाचिनी पायान्मुखे रक्षतु सर्वदा |
लज्जा रक्षतु मां दंतान् चोष्ठौ सम्मार्जनीकरी || 8 ||
चिबुके कंठदेशे तु ठकारत्रितयं पुनः |
सविसर्गं महादेवि हृदयं पातु सर्वदा || 9 ||
नाभिं रक्षतु मां लोला कालिकावतु लोचने |
उदरे पातु चामुंडा लिंगे कात्यायनी तथा || 10 ||
उग्रतारा गुदे पातु पादौ रक्षतु चांबिका |
भुजौ रक्षतु शर्वाणी हृदयं चंडभूषणा || 11 ||
जिह्वायां मातृका रक्षेत्पूर्वे रक्षतु पुष्टिका |
विजया दक्षिणे पातु मेधा रक्षतु वारुणे || 12 ||
नैरृत्यां सुदया रक्षेद्वायव्यां पातु लक्ष्मणा |
ऐशान्यां रक्षेन्मां देवी मातंगी शुभकारिणी || 13 ||
रक्षेत्सुरेशी चाग्नेय्यां बगला पातु चोत्तरे |
ऊर्ध्वं पातु महादेवी देवानां हितकारिणी || 14 ||
पाताले पातु मा नित्यं वशिनी विश्वरूपिणी |
प्रणवं च तमोमाया कामबीजं च कूर्चकं || 15 ||
मातंगिनी ङेयुतास्त्रं वह्निजायावधिर्मनुः |
सार्धैकादशवर्णा सा सर्वत्र पातु मां सदा || 16 ||
इति ते कथितं देवि गुह्याद्गुह्यतरं परं |
त्रैलोक्यमंगळं नाम कवचं देवदुर्लभं || 17 ||
य इदं प्रपठेन्नित्यं जायते संपदालयं |
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्नुयान्नात्र संशयः || 18 ||
गुरुमभ्यर्च्य विधिवत्कवचं प्रपठेद्यदि |
ऐश्वर्यं सुकवित्वं च वाक्सिद्धिं लभते ध्रुवं || 19 ||
नित्यं तस्य तु मातंगी महिला मंगलं चरेत् |
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च ये देवाः सुरसत्तमाः || 20 ||
ब्रह्मराक्षसवेताला ग्रहाद्या भूतजातयः |
तं दृष्ट्वा साधकं देवि लज्जायुक्ता भवंति ते || 21 ||
कवचं धारयेद्यस्तु सर्वसिद्धिं लभेद्ध्रुवं |
राजानोऽपि च दासाः स्युः षट्कर्माणि च साधयेत् || 22 ||
सिद्धो भवति सर्वत्र किमन्यैर्बहुभाषितैः |
इदं कवचमज्ञात्वा मातंगीं यो भजेन्नरः || 23 ||
अल्पायुर्निर्धनो मूर्खो भवत्येव न संशयः |
गुरौ भक्तिः सदा कार्या कवचे च दृढा मतिः || 24 ||
तस्मै मातंगिनी देवी सर्वसिद्धिं प्रयच्छति || 25 ||
इति नंद्यावर्ते उत्तरखंडे मातंगिनी कवचं ||
अर्थ
श्री मातंगिनी कवचम, जिसे 'त्रैलोक्यमंगल कवचम' के नाम से भी जाना जाता है, श्री मातंगिनी देवी को समर्पित एक अत्यंत पवित्र और रहस्यमय रक्षा कवच है। यह मनुष्यों को सर्वसिद्धि, ऐश्वर्य और संपूर्ण सुरक्षा प्रदान करने वाला एक दिव्य कवच है। इसकी उत्पत्ति तब हुई जब देवी के पूछने पर, महादेव ने इस कवच का विस्तार से वर्णन किया। मातंगिनी देवी त्रिपुरासुंदरी का करुणामयी रूप हैं, जो वाक्प्रदाता, कुलेश्वरी और समस्त लोकों की रक्षक हैं। इस कवच का नियमित पाठ भक्तों को दैवीय शक्ति का सुरक्षात्मक आवरण प्रदान करता है।
यह कवच बताता है कि कैसे देवी के विभिन्न शक्ति रूप शरीर के प्रत्येक भाग की रक्षा करते हैं। इसमें वर्णित है कि मातंगिनी देवी सिर की, भुवनेशी देवी आँखों की, माहेश्वरी देवी हृदय की, महामाया देवी पैरों की और कुलेश्वरी देवी समस्त अंगों की रक्षा करती हैं। देवी न केवल आंतरिक और बाहरी शरीर की रक्षा करती हैं, बल्कि त्रिपुरा, कामेश्वरी, चंडी, तारा, बगला, वशिनी, कात्यायनी, काली जैसे अपने विभिन्न रूपों में सभी दिशाओं से भी सुरक्षा प्रदान करती हैं। कहा जाता है कि इस कवच का पाठ करने वाला साधक सभी दिक्पालों पर आधिपत्य प्राप्त करने की क्षमता रखता है, जो दैवीय सुरक्षा के गहरे दायरे को दर्शाता है।
श्री मातंगिनी कवच का महत्व केवल भौतिक सुरक्षा तक सीमित नहीं है। यह वाक्शुद्धि, ज्ञान और रचनात्मकता को भी प्रेरित करता है। चूंकि मातंगिनी देवी ज्ञान और कला की अधिष्ठात्री देवी हैं, इस कवच का पाठ भक्तों को उत्तम वाक्पटुता, काव्य प्रतिभा और ज्ञान प्राप्ति में सफलता प्रदान करता है। यह शत्रुओं पर विजय, समृद्धि और जीवन के सभी क्षेत्रों में सार्वभौम सिद्धि प्रदान करता है। ऐसी मान्यता है कि देवता और भूत-प्रेत भी इस कवच का पाठ करने वाले साधक का सम्मान करते हैं, जो कवच की असाधारण शक्ति को उजागर करता है।
यह कवच अत्यंत गोपनीय और पवित्र है। शास्त्रों में कहा गया है कि इसे देवी की कृपा के बिना नहीं पढ़ना चाहिए, और इसे गुरु के आदेश से, मौन रहकर जपना चाहिए। गुरु भक्ति और देवी के प्रति श्रद्धा के साथ इस कवच का नियमित पाठ करने वालों को मातंगिनी देवी सभी मंगल प्रदान करती हैं। कवियों, साधकों और ज्ञान के उपासकों के लिए यह एक अमूल्य दैवीय रक्षा कवच है। यह मातंगतनया वाग्देवी की शक्ति और सुरक्षा का मंत्रस्वरूप है, जो सर्वांग रक्षा, सर्वसिद्धि, वाक्प्रतिभा और ऐश्वर्य प्रदान करता है।
लाभ (Benefits):
- सर्वांग रक्षा: देवी के विभिन्न रूप शरीर के प्रत्येक भाग की रक्षा करते हैं, जिससे भौतिक और आध्यात्मिक सुरक्षा मिलती है।
- वाक् सिद्धि और काव्य प्रतिभा: मातंगिनी देवी वाणी और ज्ञान की देवी होने के कारण, इस कवच का पाठ करने वालों को उत्तम वाक्पटुता और काव्य रचना की क्षमता प्राप्त होती है।
- ऐश्वर्य और समृद्धि: इस कवच का नियमित पाठ भक्तों को धन, समृद्धि और ऐश्वर्य प्रदान करता है।
- सर्वसिद्धि और विजय: जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता, शत्रुओं पर विजय और सार्वभौम सिद्धियाँ इस कवच के पाठ से प्राप्त होती हैं।
- भूतबाधा निवारण: कवच का पाठ करने वाले का देवता और भूत-प्रेत भी सम्मान करते हैं, जो नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा का संकेत है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री मातंगिनी कवचम् क्या है?
श्री मातंगिनी कवचम् का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस कवच का पाठ करने के प्रमुख लाभ क्या हैं?
श्री मातंगिनी कवचम् का पाठ कौन कर सकता है?
श्री मातंगिनी कवचम् का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री मातंगिनी कवचम् का उद्गम क्या है?
टिप्पणियाँ
टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...
