श्री मातंगी सहस्रनाम स्तोत्रं
ईश्वर उवाच |
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि सांप्रतं तत्त्वतः परं |
नाम्नां सहस्रं परमं सुमुख्याः सिद्धये हितं || 1 ||
सहस्रनामपाठी यः सर्वत्र विजयी भवेत् |
पराभवो न तस्यास्ति सभायां वा महारणे || 2 ||
यथा तुष्टा भवेद्देवी सुमुखी चास्य पाठतः |
तथा भवति देवेशि साधकः शिव एव सः || 3 ||
अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयस्य कोटयः |
सकृत्पाठेन जायंते प्रसन्ना सुमुखी भवेत् || 4 ||
मतंगोऽस्य ऋषिश्छंदोऽनुष्टुब्देवी समीरिता |
सुमुखी विनियोगः स्यात्सर्वसंपत्तिहेतवे |
एवं ध्यात्वा पठेदेतद्यदीच्छेत्सिद्धिमात्मनः || 5 ||
ध्यानं |
देवीं षोडशवार्षिकीं शवगतां माध्वीरसाघूर्णितां
श्यामांगीमरुणांबरां पृथुकुचां गुंजावलीशोभितां |
हस्ताभ्यां दधतीं कपालममलं तीक्ष्णां तथा कर्त्रिकां
ध्यायेन्मानसपंकजे भगवतीमुच्छिष्टचांडालिनीं || 1 ||
स्तोत्रं |
ॐ सुमुखी शेमुषी सेव्या सुरसा शशिशेखरा |
समानास्या साधनी च समस्तसुरसम्मुखी || 2 ||
सर्वसंपत्तिजननी संपदा सिंधुसेविनी |
शंभुसीमंतिनी सौम्या समाराध्या सुधारसा || 3 ||
सारंगा सवली वेला लावण्यवनमालिनी |
वनजाक्षी वनचरी वनी वनविनोदिनी || 4 ||
वेगिनी वेगदा वेगा बगलस्था बलाधिका |
काली कालप्रिया केली कमला कालकामिनी || 5 ||
कमला कमलस्था च कमलस्था कलावती |
कुलीना कुटिला कांता कोकिला कलभाषिणी || 6 ||
कीरा केलिकरा काली कपालिन्यपि कालिका |
केशिनी च कुशावर्ता कौशांभी केशवप्रिया || 7 ||
काली काशी महाकालसंकाशा केशदायिनी |
कुंडला च कुलस्था च कुंडलांगदमंडिता || 8 ||
कुंडपद्मा कुमुदिनी कुमुदप्रीतिवर्धिनी |
कुंडप्रिया कुंडरुचिः कुरंगनयनाकुला || 9 ||
कुंदबिंबालिनदिनी कुसुंभकुसुमाकरा |
कांची कनकशोभाढ्या क्वणत्किंकिणिकाकटिः || 10 ||
कठोरकरणा काष्ठा कौमुदी कंडवत्यपि |
कपर्दिनी कपटिनी कठिनी कलकंडिनी || 11 ||
कीरहस्ता कुमारी च कुरूढकुसुमप्रिया |
कुंजरस्था कुजरता कुंभी कुंभस्तनी कला || 12 ||
कुंभीकांगा करभोरूः कदलीकुशशायिनी |
कुपिता कोटरस्था च कंकाली कंदलालया || 13 ||
कपालवासिनी केशी कंपमानशिरोरुहा |
कादंबरी कदंबस्था कुंकुमप्रेमधारिणी || 14 ||
कुटुंबिनी कृपायुक्ता क्रतुः क्रतुकरप्रिया |
कात्यायनी कृत्तिका च कार्तिकी कुशवर्तिनी || 15 ||
कामपत्नी कामदात्री कामेशी कामवंदिता |
कामरूपा कामरतिः कामाख्या ज्ञानमोहिनी || 16 ||
खड्गिनी खेचरी खंजा खंजरीटेक्षणा खगा |
खरगा खरनादा च खरस्था खेलनप्रिया || 17 ||
खरांशुः खेलिनी खट्वा खरा खट्वांगधारिणी |
खरखंडिन्यपि ख्यातिः खंडिता खंडनप्रिया || 18 ||
खंडप्रिया खंडखाद्या खंडसिंधुश्च खंडिनी |
गंगा गोदावरी गौरी गौतम्यपि च गोमती || 19 ||
गंगा गया गगनगा गारुडी गरुडध्वजा |
गीता गीतप्रिया गेया गुणप्रीतिर्गुरुर्गिरी || 20 ||
गौर्गौरी गंडसदना गोकुला गोप्रतारिणी |
गोप्ता गोविंदिनी गूढा गूढविग्रस्तगुंजिनी || 21 ||
गजगा गोपिनी गोपी गोक्षा जयप्रिया गणा |
गिरिभूपालदुहिता गोगा गोकुलवासिनी || 22 ||
घनस्तनी घनरुचिर्घनोरुर्घननिःस्वना |
घुंकारिणी घुक्षकरी घूघूकपरिवारिता || 23 ||
घंटानादप्रिया घंटा घोटा घोटकवाहिनी |
घोररूपा च घोरा च घृतप्रीतिर्घृतांजनी || 24 ||
घृताची घृतवृष्टिश्च घंटाघटघटावृता |
घटस्था घटना घातकरी घातनिवारिणी || 25 ||
चंचरीकी चकोरी च चामुंडा चीरधारिणी |
चातुरी चपला चंचुश्चिता चिंतामणिस्थिता || 26 ||
चातुर्वर्ण्यमयी चंचुश्चोराचार्या चमत्कृतिः |
चक्रवर्तिवधूश्चित्रा चक्रांगी चक्रमोदिनी || 27 ||
चेतश्चरी चित्तवृत्तिश्चेतना चेतनप्रिया |
चापिनी चंपकप्रीतिश्चंडा चंडालवासिनी || 28 ||
चिरंजीविनी तच्चित्ता चिंचामूलनिवासिनी |
छुरिका छत्रमध्यस्था छिंदा छिंदकरी छिदा || 29 ||
छुच्छुंदरी छलप्रीतिश्छुच्छुंदरिनिभस्वना |
छलिनी छत्रदा छिन्ना छिंटिच्छेदकरी छटा || 30 ||
छद्मिनी छांदसी छाया छरुच्छंदकरीत्यपि |
जयदाजयदा जाती जायिनी जामला जतुः || 31 ||
जंबूप्रिया जीवनस्था जंगमा जंगमप्रिया |
जपापुष्पप्रिया जप्या जगज्जीवा जगज्जनिः || 32 ||
जगज्जंतुप्रधाना च जगज्जीवपरा जवा |
जातिप्रिया जीवनस्था जीमूतसदृशीरुचिः || 33 ||
जन्या जनहिता जाया जन्मभूर्जंभसी जभूः |
जयदा जगदावासा जायिनी ज्वरकृच्छ्रजित् || 34 ||
जपा च जपती जप्या जपार्हा जायिनी जना |
जालंधरमयी जानुर्जालौका जाप्यभूषणा || 35 ||
जगज्जीवमयी जीवा जरत्कारुर्जनप्रिया |
जगतीजननिरता जगच्छोभाकरी जवा || 36 ||
जगतीत्राणकृज्जंघा जातीफलविनोदिनी |
जातीपुष्पप्रिया ज्वाला जातिहा जातिरूपिणी || 37 ||
जीमूतवाहनरुचिर्जीमूता जीर्णवस्त्रकृत् |
जीर्णवस्त्रधरा जीर्णा ज्वलती जालनाशिनी || 38 ||
जगत्क्षोभकरी जातिर्जगत्क्षोभविनाशिनी |
जनापवादा जीवा च जननीगृहवासिनी || 39 ||
जनानुरागा जानुस्था जलवासा जलार्तिकृत् |
जलजा जलवेला च जलचक्रनिवासिनी || 40 ||
जलमुक्ता जलारोहा जलसा जलजेक्षणा |
जलप्रिया जलौका च जलशोभावती तथा || 41 ||
जलविस्फूर्जितवपुर्ज्वलत्पावकशोभिनी |
झिंझा झिल्लमयी झिंझाझणत्कारकरी जया || 42 ||
झंझी झंपकरी झंपा झंपत्रासनिवारिणी |
टंकारस्था टंककरी टंकारकरणांहसा || 43 ||
टंकारोट्टकृतष्ठीवा डिंडीरवसनावृता |
डाकिनी डामरी चैव डिंडिमध्वनिनादिनी || 44 ||
डकारनिःस्वनरुचिस्तपिनी तापिनी तथा |
तरुणी तुंदिला तुंदा तामसी च तमःप्रिया || 45 ||
ताम्रा ताम्रवती तंतुस्तुंदिला तुलसंभवा |
तुलाकोटिसुवेगा च तुल्यकामा तुलाश्रया || 46 ||
तुदनी तुननी तुंबी तुलाकाला तुलाश्रवा |
तुमुला तुलजा तुल्या तुलादानकरी तथा || 47 ||
तुल्यवेगा तुल्यगतिस्तुलाकोटिनिनादिनी |
ताम्रोष्ठा ताम्रपर्णी च तमःसंक्षोभकारिणी || 48 ||
त्वरिता ज्वरहा तीरा तारकेशी तमालिनी |
तमोदानवती ताम्रतालस्थानवती तमी || 49 ||
तामसी च तमिस्रा च तीव्रा तीव्रपराक्रमा |
तटस्था तिलतैलाक्ता तरुणी तपनद्युतिः || 50 ||
तिलोत्तमा च तिलकृत्तारकाधीशशेखरा |
तिलपुष्पप्रिया तारा तारकेशी कुटुंबिनी || 51 ||
स्थाणुपत्नी स्थिरकरी स्थूलसंपद्विवर्धिनी |
स्थितिः स्थैर्यस्थविष्ठा च स्थपतिः स्थूलविग्रहा || 52 ||
स्थूलस्थलवती स्थाली स्थलसंगविवर्धिनी |
दंडिनी दंतिनी दामा दरिद्रा दीनवत्सला || 53 ||
देवी देववधूर्दित्या दामिनी देवभूषणा |
दया दमवती दीनवत्सला दाडिमस्तनी || 54 ||
देवमूर्तिकरा दैत्या दारिणी देवतानता |
दोलाक्रीडा दयालुश्च दंपती देवतामयी || 55 ||
दशादीपस्थिता दोषा दोषहा दोषकारिणी |
दुर्गा दुर्गार्तिशमनी दुर्गम्या दुर्गवासिनी || 56 ||
दुर्गंधनाशिनी दुःस्था दुःखप्रशमकारिणी |
दुर्गंधा दुंदुभिध्वांता दूरस्था दूरवासिनी || 57 ||
दरदा दरदात्री च दुर्व्याधदयिता दमी |
धुरंधरा धुरीणा च धौरेयी धनदायिनी || 58 ||
धीरारवा धरित्री च धर्मदा धीरमानसा |
धनुर्धरा च धमनी धमनीधूर्तविग्रहा || 59 ||
धूम्रवर्णा धूम्रपाना धूमला धूममोदिनी |
नंदिनीनंदिनी नंदा नंदिनी नंदबालिका || 60 ||
नवीना नर्मदा नर्मनमिर्नियमनिःस्वना |
निर्मला निगमाधारा निम्नगा नग्नकामिनी || 61 ||
नीला निरत्ना निर्वाणा निर्लोभा निर्गुणा नतिः |
नीलग्रीवा निरीहा च निरंजनजनानवा || 62 ||
निर्गुंडिका च निर्गुंडा निर्नासा नासिकाभिधा |
पताकिनी पताका च पत्रप्रीतिः पयस्विनी || 63 ||
पीना पीनस्तनी पत्नी पवनाशा निशामयी |
परा परपरा काली पारकृत्यभुजप्रिया || 64 ||
पवनस्था च पवना पवनप्रीतिवर्धिनी |
पशुवृद्धिकरी पुष्पपोषिका पुष्टिवर्धिनी || 65 ||
पुष्पिणी पुस्तककरा पूर्णिमाऽतलवासिनी |
पेशी पाशकरी पाशा पांशुहा पांशुला पशुः || 66 ||
पटुः पराशा परशुधारिणी पाशिनी तथा |
पापघ्नी पतिपत्नी च पतिता पतितापनी || 67 ||
पिशाची च पिशाचघ्नी पिशिताशनतोषिणी |
पानदा पानपात्री च पानदानकरोद्यता || 68 ||
पेया प्रसिद्धा पीयूषा पूर्णा पूर्णमनोरथा |
पतंगाभा पतंगा च पौनःपुन्यमिवापरा || 69 ||
पंकिला पंकमग्ना च पानीया पंजरस्थिता |
पंचमी पंचयज्ञा च पंचता पंचमप्रिया || 70 ||
पिचुमंदा पुंडरीका पिकी पिंगललोचना |
प्रियंगुमंजरी पिंडी पंडिता पांडुरप्रभा || 71 ||
प्रेतासना प्रियालस्था पांडुघ्नी पीनसापहा |
फलिनी फलदात्री च फलश्रीः फलभूषणा || 72 ||
फूत्कारकारिणी स्फारी फुल्ला फुल्लांबुजानना |
स्फुलिंगहा स्फीतमतिः स्फीतकीर्तिकरी तथा || 73 ||
बलमाया बलारातिर्बलिनी बलवर्धिनी |
वेणुवाद्या वनचरी विरंचिजनयित्र्यपि || 74 ||
विद्याप्रदा महाविद्या बोधिनी बोधदायिनी |
बुद्धमाता च बुद्धा च वनमालावती वरा || 75 ||
वरदा वारुणी वीणा वीणावादनतत्परा |
विनोदिनी विनोदस्था वैष्णवी विष्णुवल्लभा || 76 ||
वैद्या वैद्यचिकित्सा च विवशा विश्वविश्रुता |
विद्यौघविह्वला वेला वित्तदा विगतज्वरा || 77 ||
विरावा विवरीकारा बिंबोष्ठी बिंबवत्सला |
विंध्यस्था वरवंद्या च वीरस्थानवरा च वित् || 78 ||
वेदांतवेद्या विजया विजया विजयप्रदा |
विरोगीवंदिनी वंध्या वंद्यबंधनिवारिणी || 79 ||
भगिनी भगमाला च भवानी भवनाशिनी |
भीमा भीमाननाभीमा भंगुरा भीमदर्शना || 80 ||
भिल्ली भिल्लधरा भीरुर्भरुंडा भीर्भयावहा |
भगसर्पिण्यपि भगा भगरूपा भगालया || 81 ||
भगासना भगाभोगा भेरीझंकाररंजिता |
भीषणा भीषणारावा भगवत्यहिभूषणा || 82 ||
भारद्वाजा भोगदात्री भूतिघ्नी भूतिभूषणा |
भूमिदा भूमिदात्री च भूपतिर्भरदायिनी || 83 ||
भ्रमरी भ्रामरी भाला भूपालकुलसंस्थिता |
माता मनोहरा माया मानिनी मोहिनी मही || 84 ||
महालक्ष्मीर्मदक्षीबा मदिरा मदिरालया |
मदोद्धता मतंगस्था माधवी मधुमर्दिनी || 85 ||
मोदा मोदकरी मेधा मेध्या मध्याधिपस्थिता |
मद्यपा मांसलोमस्था मोदिनी मैथुनोद्यता || 86 ||
मूर्धावती महामाया मायामहिममंदिरा |
महामाला महाविद्या महामारी महेश्वरी || 87 ||
महादेववधूर्मान्या मथुरा मेरुमंडिता |
मेदस्विनी मिलिंदाक्षी महिषासुरमर्दिनी || 88 ||
मंडलस्था भगस्था च मदिरारागगर्विता |
मोक्षदा मुंडमाला च माला मालाविलासिनी || 89 ||
मातंगिनी च मातंगी मातंगतनयापि च |
मधुस्रवा मधुरसा बंधूककुसुमप्रिया || 90 ||
यामिनी यामिनीनाथभूषा यावकरंजिता |
यवांकुरप्रिया यामा यवनी यवनार्दिनी || 91 ||
यमघ्नी यमकल्पा च यजमानस्वरूपिणी |
यज्ञा यज्ञयजुर्यक्षी यशोनिष्कंपकारिणी || 92 ||
यक्षिणी यक्षजननी यशोदायासधारिणी |
यशःसूत्रपदा यामा यज्ञकर्मकरीत्यपि || 93 ||
यशस्विनी यकारस्था यूपस्तंभनिवासिनी |
रंजिता राजपत्नी च रमा रेखा रवीरणा || 94 ||
रजोवती रजश्चित्रा रंजनी रजनीपतिः |
रोगिणी रजनी राज्ञो राज्यदा राज्यवर्धिनी || 95 ||
राजन्वती राजनीतिस्तथा रजतवासिनी |
रमणी रमणीया च रामा रामावती रतिः || 96 ||
रेतोरती रतोत्साहा रोगघ्नी रोगकारिणी |
रंगा रंगवती रागा रागज्ञा रागकृद्दया || 97 ||
रामिका रजकी रेवा रजनी रंगलोचना |
रक्तचर्मधरा रंगी रंगस्था रंगवाहिनी || 98 ||
रमा रंभाफलप्रीती रंभोरू राघवप्रिया |
रंगा रंगांगमधुरा रोदसी च महारवा || 99 ||
रोगकृद्रोगहंत्री च रोगभृद्रोगस्राविणी |
वंदी वंदिस्तुता बंधुर्बंधूककुसुमाधरा || 100 ||
वंदिता वंद्यमाना च वैद्रावी वेदविद्विधा |
विकोपा विकपाला च विकस्था विंकवत्सला || 101 ||
वेदिर्विलग्नलग्ना च विधिविंककरी विधा |
शंखिनी शंखवलया शंखमालावती शमी || 102 ||
शंखपात्राशिनी शंखस्वना शंखगला शशी |
शबरी शांबरी शंभुः शंभुकेशा शरासिनी || 103 ||
शवा श्येनवती श्यामा श्यामांगी श्यामलोचना |
श्मशानस्था श्मशाना च श्मशानस्थानभूषणा || 104 ||
शमदा शमहंत्री च शंखिनी शंखरोषणा |
शांतिः शांतिप्रदा शेषा शेषाख्या शेषशायिनी || 105 ||
शेमुषी शोषिणी शेषा शौर्या शौर्यशरा शरी |
शापदा शापहा शापा शापपंथाः सदाशिवा || 106 ||
शृंगिणी शृंगिपलभुक् शंकरी शांकरी शिवा |
शवस्था शवभुक् शांता शवकर्णा शवोदरी || 107 ||
शाविनी शवशिंशाश्रीः शवा च शवशायिनी |
शवकुंडलिनी शैवा शीकरा शिशिराशना || 108 ||
शवकांची शवश्रीका शवमाला शवाकृतिः |
स्रवंती संकुचा शक्तिः शंतनुः शवदायिनी || 109 ||
सिंधुः सरस्वती सिंधुः सुंदरी सुंदरानना |
साधुः सिद्धिप्रदात्री च सिद्धा सिद्धसरस्वती || 110 ||
संततिः संपदा संविच्छंकिसंपत्तिदायिनी |
सपत्नी सरसा सारा सारस्वतकरी सुधा || 111 ||
सुरा समांसाशना च समाराध्या समस्तदा |
समधीः सामदा सीमा सम्मोहा समदर्शना || 112 ||
सामतिः सामदा सीमा सावित्री सविधा सती |
सवना सवनासारा सवरा सावरा समी || 113 ||
सिमरा सतता साध्वी सध्रीची ससहायिनी |
हंसी हंसगतिर्हंसी हंसोज्ज्वलनिचोलयुक् || 114 ||
हलिनी हालिनी हाला हलश्रीर्हरवल्लभा |
हला हलवती ह्येषा हेला हर्षविवर्धिनी || 115 ||
हंतिर्हंता हया हाहाहताऽहंतातिकारिणी |
हंकारी हंकृतिर्हंका हीहीहाहाहिता हिता || 116 ||
हीतिर्हेमप्रदा हाराराविणी हरिसम्मता |
होरा होत्री होलिका च होमा होमहविर्हविः || 117 ||
हरिणी हरिणीनेत्रा हिमाचलनिवासिनी |
लंबोदरी लंबकर्णा लंबिका लंबविग्रहा || 118 ||
लीला लीलावती लोला ललना ललिता लता |
ललामलोचना लोभ्या लोलाक्षी सत्कुलालया || 119 ||
लपत्नी लपती लम्या लोपामुद्रा ललंतिका |
लतिका लंघिनी लंघा लालिमा लघुमध्यमा || 120 ||
लघीयसी लघूदर्या लूता लूताविनाशिनी |
लोमशा लोमलंबी च ललंती च लुलुंपती || 121 ||
लुलायस्था च लहरी लंकापुरपुरंदरा |
लक्ष्मीर्लक्ष्मीप्रदा लभ्या लाक्षाक्षी लुलितप्रभा || 122 ||
क्षणा क्षणक्षुः क्षुत्क्षिणी क्षमा क्षांतिः क्षमावती |
क्षामा क्षामोदरी क्षेम्या क्षौमभृत्क्षत्रियांगना || 123 ||
क्षया क्षयाकरी क्षीरा क्षीरदा क्षीरसागरा |
क्षेमंकरी क्षयकरी क्षयकृत्क्षयदा क्षतिः || 124 ||
क्षुद्रिकाऽक्षुद्रिका क्षुद्रा क्षुत्क्षमा क्षीणपातका |
मातुः सहस्रनामेदं सुमुख्याः सिद्धिदायकं || 125 ||
यः पठेत्प्रयतो नित्यं स एव स्यान्महेश्वरः |
अनाचारात्पठेन्नित्यं दरिद्रो धनवान्भवेत् || 126 ||
मूकः स्याद्वाक्पतिर्देवि रोगी नीरोगतां व्रजेत् |
पुत्रार्थी पुत्रमाप्नोति त्रिषु लोकेषु विश्रुतं || 127 ||
वंध्यापि सूते सत्पुत्रं विदुषः सदृशं गुरोः |
सत्यं च बहुधा भूयाद्गावश्च बहुदुग्धदाः || 128 ||
राजानः पादनम्राः स्युस्तस्य हासा इव स्फुटाः |
अरयः संक्षयं यांति मानसा संस्मृता अपि || 129 ||
दर्शनादेव जायंते नरा नार्योऽपि तद्वशाः |
कर्ता हर्ता स्वयं वीरो जायते नात्र संशयः || 130 ||
यं यं कामयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितं |
दुरितं न च तस्यास्ति नास्ति शोकः कथंचन || 131 ||
चतुष्पथेऽर्धरात्रे च यः पठेत्साधकोत्तमः |
एकाकी निर्भयो वीरो दशवारं स्तवोत्तमं || 132 ||
मनसा चिंतितं कार्यं तस्य सिद्ध्येन्न संशयः |
विना सहस्रनाम्नां यो जपेन्मंत्रं कदाचन || 133 ||
न सिद्धिर्जायते तस्य कल्पकोटिशतैरपि |
कुजवारे श्मशाने वा मध्याह्ने यो जपेत्सदा || 134 ||
कृतकृत्यः स जायेत कर्ता हर्ता नृणामिह |
रोगार्तोऽर्धनिशायां यः पठेदासनसंस्थितः || 135 ||
सद्यो नीरोगतामेति यदि स्यान्निर्भयस्तदा |
अर्धरात्रे श्मशाने वा शनिवारे जपेन्मनुं || 136 ||
अष्टोत्तरसहस्रं तु दशवारं जपेत्ततः |
सहस्रनाम चैतद्धि तदा याति स्वयं शिवा || 137 ||
महापवनरूपेण घोरगोमायुनादिनी |
ततो यदि न भीतिः स्यात्तदा देहीति वाग्भवेत् || 138 ||
तदा पशुबलिं दद्यात्स्वयं गृह्णाति चंडिका |
यथेष्टं च वरं दत्त्वा प्रयाति सुमुखी शिवा || 139 ||
रोचनागुरुकस्तूरीकर्पूरैश्च सचंदनैः |
कुंकुमेन दिने श्रेष्ठे लिखित्वा भूर्जपत्रके || 140 ||
शुभनक्षत्रयोगे च कृतमारुतसत्क्रियः |
कृत्वा संपातनविधिं धारयेद्दक्षिणे करे || 141 ||
सहस्रनाम स्वर्णस्थं कंठे वा विजितेंद्रियः |
तदा यं प्रणमेन्मंत्री क्रुद्धः स म्रियते नरः || 142 ||
दुष्टश्वापदजंतूनां न भीः कुत्रापि जायते |
बालकानामियं रक्षा गर्भिणीनामपि प्रिये || 143 ||
मोहनस्तंभनाकर्षमारणोच्चाटनानि च |
यंत्रधारणतो नूनं जायंते साधकस्य तु || 144 ||
नीलवस्त्रे विलिख्यैतत्तद्ध्वजे स्थापयेद्यदि |
तदा नष्टा भवत्येव प्रचंडाप्यरिवाहिनी || 145 ||
एतज्जप्तं महाभस्म ललाटे यदि धारयेत् |
तद्विलोकन एव स्युः प्राणिनस्तस्य किंकराः || 146 ||
राजपत्न्योऽपि विवशाः किमन्याः पुरयोषितः |
एतज्जप्तं पिबेत्तोयं मासेन स्यान्महाकविः || 147 ||
पंडितश्च महावादी जायते नात्र संशयः |
अयुतं च पठेत् स्तोत्रं पुरश्चरणसिद्धये || 148 ||
दशांशं कमलैर्हुत्वा त्रिमध्वक्तैर्विधानतः |
स्वयमायाति कमला वाण्या सह तदालये || 149 ||
मंत्रो निष्कीलतामात सुमुखी सुमुखी भवेत् |
अनंतं च भवेत्पुण्यमपुण्यं च क्षयं व्रजेत् || 150 ||
पुष्करादिषु तीर्थेषु स्नानतो यत्फलं भवेत् |
तत्फलं लभते जंतुः सुमुख्याः स्तोत्रपाठतः || 151 ||
एतदुक्तं रहस्यं ते स्वसर्वस्वं वरानने |
न प्रकाश्यं त्वया देवि यदि सिद्धिं त्वमिच्छसि || 152 ||
प्रकाशनादसिद्धिः स्यात्कुपिता सुमुखी भवेत् |
नातः परतरं लोके सिद्धिदं प्राणिनामिह || 153 ||
वंदे श्रीसुमुखीं प्रसन्नवदनां पूर्णेंदुबिंबाननां
सिंदूरांकितमस्तकां मधुमदोल्लोलां च मुक्तावलीं |
श्यामां कज्जलिकाकरां करगतं चाध्यापयंतीं शुकं
गुंजापुंजविभूषणां सकरुणामामुक्तवेणीलतां || 154 ||
इति श्रीनंद्यावर्ततंत्रे उत्तरखंडे मातंगी सहस्रनाम स्तोत्रं ||
अर्थ
श्री मातंगी सहस्रनाम स्तोत्रम भगवान शिव द्वारा देवी पार्वती को उपदेशित एक अत्यंत रहस्यमय और शक्तिशाली स्तोत्र है। इसमें देवी सुमुखी (मातंगी) के एक हजार दिव्य नामों का वर्णन किया गया है। ये नाम मातंगी देवी के विभिन्न रूपों, शक्तियों और गुणों का महिमामंडन करते हैं। इसे वाक्पटुता, विद्या, मंत्र सिद्धि, ऐश्वर्य, भक्ति और अंततः मोक्ष की प्राप्ति कराने वाली शक्ति के रूप में सराहा गया है।
भगवान शिव देवी पार्वती से कहते हैं, "हे देवी! मैं तुम्हें अब मातंगी सुमुखी देवी के सहस्रनाम स्तोत्र का वर्णन करता हूँ। इसका पाठ करने वाला सभा में या युद्ध में कभी पराजित नहीं होता। यदि देवी प्रसन्न हो जाती हैं, तो भक्त स्वयं शिव स्वरूप हो जाता है।" इस सहस्रनाम का एक बार पाठ करने का फल करोड़ों वाजपेय यज्ञों के समान बताया गया है। यह भक्त को असाधारण आध्यात्मिक और लौकिक लाभ प्रदान करता है।
स्तोत्र के आरंभ में देवी के ध्यान का विस्तृत वर्णन किया गया है। देवी को सोलह वर्ष की आयु वाली, शव पर आसीन, रक्त वस्त्र धारण किए हुए, मधुरस से मदमस्त, कपाल और तीक्ष्ण कटार धारण किए हुए, श्याम वर्ण की, गुंजा माला से सुशोभित और करुणा से परिपूर्ण ध्यान करना चाहिए। यह ध्यान देवी के उग्र और सौम्य दोनों रूपों को समाहित करता है, जो भक्तों के लिए आंतरिक परिवर्तन और द्वंद्वों से परे दिव्य अनुभव का मार्ग प्रशस्त करता है।
स्तोत्र के मुख्य भाग में, मातंगी देवी को सुमुखी, शशिशेखर वधू (भगवान शिव की पत्नी), शंभु सीमंतिनी, सर्वसंपत्ति जननी (सभी संपदाओं की जननी) और भक्तों के भवदुःखनाशिनी (सांसारिक दुःखों का नाश करने वाली) के रूप में वर्णित किया गया है। वह वाक्पटुता का मूल, मंत्र शक्ति का आधार, संगीत स्वरूपा और करुणा की मूर्ति हैं। सहस्रनाम उनके विभिन्न रूपों, तत्वों, मातृका मंत्र बीजों और योगिक स्थितियों का उल्लेख करता है। प्रत्येक नाम देवी की अनंत महिमा को प्रकट करता है, भक्तों में आंतरिक शक्ति और ज्ञान को प्रेरित करता है।
लाभ (Benefits):
- सभा और युद्ध में विजय: इस स्तोत्र का पाठ करने वाले किसी भी वाद-विवाद, प्रतियोगिता या चुनौती में अजेय रहते हैं और विजय प्राप्त करते हैं।
- वाक् सिद्धि: भक्तों को धाराप्रवाह, प्रभावशाली और सत्य बोलने की क्षमता प्राप्त होती है, जिससे वे सभी को आकर्षित करते हैं और समाज में सम्मान पाते हैं।
- मंत्र सिद्धि: मंत्रों का जाप करते समय सिद्धि (पूर्णता) प्राप्त होती है, जिससे मंत्रों की शक्ति पूरी तरह से प्रकट होती है और वांछित फल मिलते हैं।
- सर्वसंपत्ति और भोग मोक्ष की प्राप्ति: लौकिक धन, सुख-भोग और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है, अर्थात् जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिलती है। यह भौतिक और आध्यात्मिक दोनों आयामों में समृद्धि लाता है।
- शिव के समान स्थिति: भक्त देवी की कृपा से भगवान शिव के समान उच्च आध्यात्मिक स्थिति को प्राप्त करता है, जो अंतिम आध्यात्मिक लक्ष्य है और दिव्यता के साथ एकाकार होने का अनुभव प्रदान करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री मातंगी सहस्रनाम स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री मातंगी सहस्रनाम स्तोत्र के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री मातंगी सहस्रनाम स्तोत्र का उद्गम क्या है?
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