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श्री भद्रकाळी कवचं (जगन्मंगळं)

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स्तोत्र
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श्री भद्रकाळी कवचं (जगन्मंगळं)

श्रीदेव्युवाच |
भगवन् करुणांभोधे शास्त्रान् भो निधिपारगः |
त्रैलोक्यसारयेत्तत्त्वं जगद्रक्षणकारकः || 1 ||

भद्रकाळ्या महादेव्याः कवचं मंत्रगर्भकं |
जगन्मंगळदं नाम वद शंभो दयानिधे || 2 ||

श्रीभैरव उवाच |
भैं भद्रकाळीकवचं जगन्मंगळनामकं |
गुह्यं सनातनं पुण्यं गोपनीयं विशेषतः || 3 ||

जगन्मंगळनाम्नोऽस्य कवचस्य ऋषिः शिवः |
उष्णिक्छंदः समाख्यातं देवता भद्रकाळिका || 4 ||

भैं बीजं हूं तथा शक्तिः स्वाहा कीलकमुच्यते |
धर्मार्थकाममोक्षार्थे विनियोगः प्रकीर्तितः || 5 ||

अस्य श्रीजगन्मंगळनाम्नो भद्रकाळी कवचस्य शिव ऋषिः उष्णिक् छंदः श्रीभद्रकाळी देवता भैं बीजं हूं शक्तिः स्वाहा कीलकं धर्मार्थकाममोक्षार्थे कवच पाठे विनियोगः |

अथ ध्यानं |
उद्यच्चंद्रकळावतंसित शिखां क्रींकारवर्णोज्ज्वलां
श्यामां श्याममुखीं रवींदुनयनां हूंवर्णरक्ताधरां |
भैं बीजांकित मानसां शवगतां नीलांबरोद्भासितां
स्वाहालंकृत सर्वगात्रलतिकां भैं भद्रकाळीं भजे ||

अथ कवचं |
ॐ | भैं पातु मे शिरो नित्यं देवी भैं भद्रकाळिका |
ललाटं क्रीं सदा पातु महारत्नेश्वरी तथा || 1 ||

क्रीं भ्रुवौ पातु मे नित्यं महाकामेश्वरी तथा |
नेत्रेव्यात् क्रीं च मे नित्यं नित्यानंदमयी शिवा || 2 ||

गंडौ मे पातु भैं नित्यं सर्वलोकमहेश्वरी |
श्रुती ह्रीं पातु मे नित्यं सर्वमंगळमंगळा || 3 ||

नासां ह्रीं पातु मे नित्यं महात्रिभुवनेश्वरी |
अधरे हूं सदाव्यान्मे सर्वमंत्रमयी तथा || 4 ||

जिह्वां क्रीं मे सदा पातु विशुद्धेश्वररूपिणी |
भैं ह्रीं ह्रीं मे दंतान् पातु नित्या क्रीं कुलसुंदरी || 5 || [रदान्]

ह्रीं हूं क्रीं मे गळं पातु ज्वालामंडलमंडना |
ह्रीं हूं क्रीं मे भुजौ पातु भवमोक्षप्रदांबिका || 6 ||

ह्रीं हूं क्रीं मे करौ पातु सर्वानंदमयी तथा |
स्तनौ क्रीं हूं सदा पातु नित्या नीलपताकिनी || 7 ||

क्रीं भैं ह्रीं मम वक्षोव्यात् ब्रह्मविद्यामयी शिवा |
भैं कुक्षिं मे सदा पातु महात्रिपुरसुंदरी || 8 ||

ऐं सौः भैं पातु मे पार्श्वौ विद्या चतुर्दशात्मिका |
ऐं क्लीं भैं पातु मे पृष्ठं सर्वमंत्रविभूषिता || 9 ||

ॐ क्रीं ऐं सौः सदाव्यान्मे नाभिं भैं बैंदवेश्वरी |
ॐ ह्रीं हूं पातु शिश्नं मे देवता भगमालिनी || 10 ||

ह्रीं ह्रीं ह्रीं मे कटिं पातु देवता भगरूपिणी |
हूं हूं भैं भैं सदाव्यान्मे देवी ब्रह्मस्वरूपिणी || 11 ||

ॐ क्रीं हूं पातु मे जानू महात्रिपुरभैरवी |
ॐ क्रीं ऐं सौः पातु जंघे बाला श्रीत्रिपुरेश्वरी || 12 ||

गुल्फौ मे क्रीं सदा पातु शिवशक्तिस्वरूपिणी |
क्रीं ऐं सौः पातु मे पादौ पायात् श्रीकुलसुंदरी || 13 ||

भैं क्रीं हूं श्रीं सदा पातु पादाधः कुलशेखरा |
ॐ क्रीं हूं श्रीं सदाव्यान्मे पादपृष्ठं महेश्वरी || 14 ||

क्रीं हूं श्रीं भैं वपुः पायात् सर्वं मे भद्रकाळिका |
क्रीं ह्रीं ह्रीं पातु मां प्रातर्देवेंद्री वज्रयोगिनी || 15 ||

हूं भैं मां पातु मध्याह्ने नित्यमेकादशाक्षरी |
ॐ ऐं सौः पातु मां सायं देवता परमेश्वरी || 16 ||

निशादौ क्रीं च मां पातु देवी श्रीषोडशाक्षरी |
अर्धरात्रे च मां पातु क्रीं हूं भैं छिन्नमस्तका || 17 ||

निशावसानसमये पातु मां क्रीं च पंचमी |
पूर्वे मां पातु श्रीं ह्रीं क्लीं राज्ञी राज्यप्रदायिनी || 18 ||

ॐ ह्रीं हूं मां पश्चिमेव्यात्सर्वदा तत्त्वरूपिणी |
ऐं सौः मां दक्षिणे पातु देवी दक्षिणकाळिका || 19 ||

ऐं क्लीं मामुत्तरे पातु राजराजेश्वरी तथा |
व्रजंतं पातु मां श्रीं हूं तिष्ठंतं क्रीं सदावतु || 20 ||

प्रबुधं हूं सदा पातु सुप्तं मां पातु सर्वदा |
आग्नेये क्रीं सदा पातु नैरृत्ये हूं तथावतु || 21 ||

वायव्ये क्रीं सदा पायादैशान्यां भैं सदावतु |
उर्ध्वं क्रीं मां सदा पातु ह्यधस्तात् ह्रीं तथैव तु || 22 ||

चौरतोयाग्निभीतिभ्यः पायान्मां श्रीं शिवेश्वरी |
यक्षभूतपिशाचादि राक्षसेभ्योवतात्सदा || 23 ||

ऐं क्लीं सौः हूं च मातंगी चोच्छिष्ठपदरूपिणी |
दैत्यभूचरभीतिभ्योऽवताद्द्वाविंशदक्षरी || 24 ||

विस्मरितं तु यत् स्थानं यत् स्थानं नामवर्जितं |
तत्सर्वं पातु मे नित्यं देवी भैं भद्रकाळिका || 25 ||

इतीदं कवचं देवि सर्वमंत्रमयं परं |
जगन्मंगळनामेदं रहस्यं सर्वकामिकं || 26 ||

रहस्याति रहस्यं च गोप्यं गुप्ततरं कलौ |
मंत्रगर्भं च सर्वस्वं भद्रकाळ्या मयास्मृतं || 27 ||

अद्रष्टव्यमवक्तव्यं अदातव्यमवाचिकं |
दातव्यमभक्तेभ्यो भक्तेभ्यो दीयते सदा || 28 ||

अश्रोतव्यमिदं वर्म दीक्षाहीनाय पार्वति |
अभक्तेभ्योपिपुत्रेभ्यो दत्वा नरकमाप्नुयात् || 29 ||

महादारिद्र्यशमनं महामंगळवर्धनं |
भूर्जत्वचि लिखेद्देवि रोचना चंदनेन च || 30 ||

श्वेतसूत्रेण संवेष्ट्य धारयेन्मूर्ध्नि वा भुजे |
मूर्ध्नि धृत्वा च कवचं त्रैलोक्यविजयं भवेत् || 31 ||

भुजे धृत्वा रिपून् राजा जित्वा जयमवाप्नुयात् |
इतीदं कवचं देवि मूलमंत्रैकसाधनं |
गुह्यं गोप्यं परं पुण्यं गोपनीयं स्वयोनिवत् || 32 ||

इति श्रीभैरवीतंत्रे श्री भद्रकाळी कवचं |

अर्थ

श्री भद्रकाली जगन्मंगल कवचम अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली देवी रक्षा स्तोत्र है। स्वयं भगवती पार्वती ने लोक कल्याण हेतु इस ज्ञान को महादेव से प्राप्त किया था, जिससे इसकी महिमा अनंत हो जाती है। भैरव बताते हैं कि यह कवच तीनों लोकों में दुर्लभ, अत्यंत गोपनीय और केवल योग्य साधकों के लिए ही सुलभ है। यह सभी मंत्रों का सार धारण करता है, जो 'भैं' बीज मंत्र की उग्र शक्ति में निहित है, भद्रकाली की प्रचंड ऊर्जा का प्रतीक है।

इस कवच के ऋषि शिव हैं, छंद उष्णिक् है, और देवता श्री भद्रकाली हैं। इसमें 'भैं' बीज, 'हूं' शक्ति और 'स्वाहा' कीलक का प्रयोग किया गया है। इसका विनियोग धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति के लिए किया गया है, जो साधक को सभी प्रकार की सुरक्षा और अभीष्ट फल प्रदान करता है। ध्यान में, भद्रकाली को उदय होते चंद्रकला से सुशोभित जटाओं वाली, 'क्रीं' बीज वर्ण से उज्ज्वल, श्मशान भूमि में शव पर विराजमान, नीले वस्त्रों से सुसज्जित और 'भैं' बीज से मन में अंकित रूप में देखा जाता है। यह स्वरूप अहंकार के विलय और मोक्ष का प्रतीक है, जो भक्तों को परम सुरक्षा और आध्यात्मिक जागरण प्रदान करता है।

यह कवच भक्त के शरीर के प्रत्येक अंग को दिव्य शक्ति से सुरक्षित करता है। ललाट को महारत्नेश्वरी, नेत्रों को नित्यानंदमयी, कपोलों को सर्वलोकमहेश्वरी, कर्णों को सर्वमंगलमंगला, नासिका को महात्रिभुवनेश्वरी, जिह्वा को विशुद्धेश्वररूपिणी जैसी महाशक्तियाँ रक्षा करती हैं। इसी प्रकार कंठ, भुजाएँ, हृदय, नाभि, कुक्षि, पीठ, जंघाएँ, घुटने और पैर भी देवी के विभिन्न रूपों और बीजाक्षर शक्तियों से आच्छादित होते हैं, जिससे कोई भी नकारात्मक शक्ति प्रवेश नहीं कर पाती और एक अभेद्य आध्यात्मिक कवच का निर्माण होता है।

यह कवच आठ दिशाओं को देवी के आठ भिन्न रूपों से सुरक्षित रखता है – महाकाली, रक्तदंतिका, चामुंडा, श्यामा, चंडिका, साट्टहासिनी आदि रूप भक्त के चारों ओर प्रहरी की तरह खड़े रहते हैं। प्रातःकाल में वज्रयोगिनी, मध्याह्न में एकादशाक्षरी, सायंकाल में परमेश्वरी, रात्रि में षोडशाक्षरी और अर्धरात्रि में छिन्नमस्तका रक्षा करती हैं। चलते हुए, सोते हुए, जागते हुए, विश्राम करते हुए – किसी भी अवस्था में भक्त देवी की सुरक्षा से वंचित नहीं रहता। शरीर के सभी भागों में देवी की शक्ति कवच की तरह व्याप्त होकर भूत-प्रेत, पिशाच, राक्षस, अभिचार, ग्रह दोष और सभी प्रकार के आकस्मिक खतरों से पूर्ण सुरक्षा प्रदान करती है।

लाभ (Benefits):

  • शत्रु नाश: इस कवच को धारण करने वाला या पाठ करने वाला शत्रुओं पर सहज विजय प्राप्त करता है।
  • समग्र सुरक्षा: भूत, प्रेत, पिशाच, राक्षस, अभिचार, ग्रह दोष और सभी प्रकार के शारीरिक तथा मानसिक खतरों से पूर्ण सुरक्षा मिलती है।
  • राजत्व प्राप्ति: इसे भोजपत्र पर लिखकर, चंदन से लेपकर, श्वेत सूत से बाँधकर धारण करने वाला राजाधिराज बनता है, अर्थात उसे सत्ता और सम्मान प्राप्त होता है।
  • त्रिलोक विजय: सिर पर धारण करने वाला त्रिलोक विजय प्राप्त करता है, अर्थात सभी क्षेत्रों में सफलता और प्रभुत्व प्राप्त करता है।
  • चतुर्विध पुरुषार्थ सिद्धि: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – इन चारों पुरुषार्थों की सिद्धि होती है, जिससे जीवन में समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति आती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री भद्रकाळी कवचम् (जगन्मंगलं) क्या है?
यह भद्रकाली देवी का एक अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली सुरक्षा स्तोत्र है, जो भक्तों को पूर्ण सुरक्षा और मनोकामना सिद्धि प्रदान करता है। इसे स्वयं महादेव ने देवी पार्वती को लोक कल्याण के लिए बताया था।
इस कवच का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस कवच का पाठ किसी भी समय किया जा सकता है, विशेष रूप से प्रतिदिन प्रातः स्नान के बाद देवी के ध्यान के साथ पाठ करना शुभ होता है। इसे शुद्ध मन और भक्ति के साथ पढ़ना चाहिए।
श्री भद्रकाळी कवचम् के पाठ से क्या प्रमुख लाभ होते हैं?
इस कवच के पाठ से शत्रुओं से रक्षा, भूत-प्रेत आदि बाधाओं से मुक्ति, ग्रह दोष निवारण, धन और सत्ता की प्राप्ति, तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की सिद्धि होती है।
इस कवच का पाठ कौन कर सकता है?
कोई भी भक्त, विशेष रूप से भय, शत्रु बाधा या जीवन में बाधाओं का सामना करने वाले लोग इस कवच का पाठ कर सकते हैं। देवी की कृपा चाहने वाले भक्तिपूर्वक इसका पाठ कर सकते हैं।
श्री भद्रकाळी कवचम् का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
सामान्यतः प्रतिदिन एक बार पाठ करना उत्तम माना जाता है। विशेष फल प्राप्त करने के लिए 11, 21, या 108 बार पाठ किया जा सकता है। निष्ठा और श्रद्धा से पाठ करना महत्वपूर्ण है।
इस कवच की उत्पत्ति या स्रोत के बारे में क्या जानकारी है?
यह कवच स्वयं भगवान शिव द्वारा देवी पार्वती को प्रदान किया गया था। इसके ऋषि शिव हैं, देवता भद्रकाली हैं, और यह समस्त लोकों के कल्याण के लिए रचा गया है।

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