म

श्री महाकाळी स्तोत्रं

संपादन: अद्यतन
स्तोत्र
0 व्यूज़

श्री महाकाळी स्तोत्रं

ध्यानं |
शवारूढां महाभीमां घोरदंष्ट्रां वरप्रदां
हास्ययुक्तां त्रिणेत्रांच कपाल कर्त्रिका करां |
मुक्तकेशीं ललज्जिह्वां पिबंतीं रुधिरं मुहुः
चतुर्बाहुयुतां देवीं वराभयकरां स्मरेत् ||

शवारूढां महाभीमां घोरदंष्ट्रां हसन्मुखीं
चतुर्भुजां खड्गमुंडवराभयकरां शिवां |
मुंडमालाधरां देवीं ललज्जिह्वां दिगंबरां
एवं संचिंतयेत्काळीं श्मशनालयवासिनीं ||

अथ स्तोत्रं |
विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीं |
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभां || 1 ||

त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका |
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता || 2 ||

अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः |
त्वमेव संध्या सावित्री त्वं देवी जननी परा || 3 ||

त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतद्सृज्यते जगत् |
त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यंते च सर्वदा || 4 ||

विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने |
तथा संहृतिरूपांते जगतोऽस्य जगन्मये || 5 ||

महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः |
महामोहा च भवती महादेवी महेश्वरी || 6 ||

प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी |
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा || 7 ||

त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा |
लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शांतिः क्षांतिरेव च || 8 ||

खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा |
शंखिनी चापिनी बाणभुशुंडीपरिघायुधा || 9 ||

सौम्या सौम्यतराशेषा सौम्येभ्यस्त्वतिसुंदरी |
परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी || 10 ||

यच्च किंचित् क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके |
तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा || 11 ||

यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत् |
सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः || 12 ||

विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च |
कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत् || 13 ||

सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता |
मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ || 14 ||

प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु |
बोधश्च क्रियतामस्य हंतुमेतौ महासुरौ || 15 ||

इति श्री महाकाळी स्तोत्रं |

अर्थ

श्री महाकाली स्तोत्रम, परम शक्ति स्वरूपा देवी महाकाली की दिव्य महिमा और उनके विभिन्न रूपों का वर्णन करने वाला एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है। यह स्तोत्र भक्तों को माँ काली के भयंकर और सौम्य दोनों रूपों से परिचित कराता है। स्तोत्र के ध्यान मंत्र देवी काली के उग्र स्वरूप का स्पष्ट चित्रण करते हैं। इसमें उन्हें शव पर आसीन, विकट दाँतों वाली, विस्तृत जिह्वा वाली, रक्त का पान करने वाली, खुले केशों वाली, और चार भुजाओं में खड्ग, कपाल, वर तथा अभय मुद्रा धारण किए हुए दर्शाया गया है। श्मशान में निवास करने वाला यह रूप अज्ञान, अहंकार और कर्म बंधनों के विनाश का प्रतीक है, जो भक्तों को निर्भयता और वैराग्य का पाठ सिखाता है।

स्तोत्र के प्रारंभ में, देवी को विश्वेश्वरी (विश्व की अधिष्ठात्री), जगद्धात्री (जगत को धारण करने वाली), स्थिति-संहारकारिणी (सृष्टि-स्थिति-लय की संचालिका), और भगवान विष्णु की निद्रा स्वरूपा परम तेजोमयी शक्ति के रूप में स्तुति किया जाता है। वह समस्त तेजों की प्रभा (प्रकाश) हैं। देवी स्वाहा, स्वधा, वषट्कार (यज्ञों में प्रयुक्त होने वाले पवित्र मंत्र) और सुधा (अमृत) स्वरूपा हैं। वह अक्षर स्वरूपा, नित्य और त्रिधा मात्रात्मिका (ॐकार की तीन मात्राएँ - अ, उ, म) के रूप में स्थित हैं। अर्धमात्रा के रूप में भी वे नित्य विराजमान हैं, जिसका अर्थ है कि वे समस्त वेद मंत्रों और दिव्य शब्दों का मूल स्वरूप हैं। वे ही संध्या, सावित्री और परा जननी हैं, जो सृष्टि-स्थिति-लय के त्रिविध तत्वों को समाहित करने वाली परम शक्ति हैं।

देवी इस समस्त विश्व को धारण करती हैं, इसका सृजन करती हैं, पालन करती हैं और अंततः स्वयं में विलीन कर लेती हैं। वे सृष्टि के समय सृष्टि-रूप में, पालन के समय स्थिति-रूप में, और संहार के समय संहार-रूप में प्रकट होती हैं। काली देवी महाविद्या (परम ज्ञान स्वरूपा), महामाया (विश्व को मोहित करने वाली शक्ति), महामेधा (महान बुद्धि), महास्मृति (महान स्मरण शक्ति), महामोह (महान मोह), और महेश्वरी (महेश्वर की शक्ति) के रूप में समस्त जगत का संचालन करती हैं। वे कालरात्रि (काल की अधिष्ठात्री), महारत्रि (प्रलयकाल की रात्रि) - काल, निद्रा और मोह को नियंत्रित करने वाली शक्ति हैं।

इसके अतिरिक्त, देवी क्षांति (क्षमा), तुष्टि (संतोष), पुष्टि (पोषण), लज्जा (विनम्रता), शांति (शांति), श्रद्धा (आस्था), कांति (तेज), लक्ष्मी (धन), वृत्ति (वृत्ति), स्मृति (स्मरण), दया (करुणा), माता (मातृत्व), बुद्धि (बुद्धि) जैसे सूक्ष्म शक्तियों की भी मूल स्रोत हैं। वे त्रिशूल, खड्ग, चक्र, गदा, शूल, धनुष-बाण, परिघ जैसे समस्त दिव्य आयुधों को धारण करने वाली हैं, जो सभी बाधाओं को दूर करने की शक्ति का प्रतीक हैं। उनके रूप सौम्य और घोर दोनों हैं, जो द्वंद्वों से परे परम शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह स्वीकार किया जाता है कि भगवान विष्णु और शिव भी उनकी शक्ति से ही कार्य करते हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि वे ही आदिशक्ति हैं।

स्तोत्र के अंत में, भक्त देवी से प्रार्थना करते हैं कि वे मधु और कैटभ नामक असुरों को मोहित करें और निद्रा में लीन भगवान विष्णु को जागृत करें ताकि वे उनका संहार कर सकें। यह देवी के सृष्टि-लय के अधिकार और देवताओं के लिए भी आधारभूत शक्ति होने को दर्शाता है। इस स्तोत्र का पाठ भक्तों को समस्त दुःखों से मुक्ति, निर्भयता और परम शांति प्रदान करता है।

लाभ (Benefits):

  • दुःख और भय से मुक्ति: इस स्तोत्र का नियमित पाठ जीवन के दुःखों, रोगों, भयों और नकारात्मक प्रभावों से रक्षा करता है, जिससे मानसिक शांति प्राप्त होती है।
  • आध्यात्मिक शक्ति और ज्ञान में वृद्धि: माँ काली की आराधना से आध्यात्मिक शक्ति, साहस, बुद्धि और ज्ञान में वृद्धि होती है, जिससे आत्मविश्वास बढ़ता है।
  • शत्रु नाश और बाधा निवारण: यह स्तोत्र शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने और जीवन की सभी बाधाओं तथा विघ्नों को दूर करने में अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है।
  • मानसिक शांति और आंतरिक बल: आंतरिक संघर्षों को शांत कर मानसिक शांति प्रदान करता है और ध्यान में सिद्धि प्राप्त करने में सहायता करता है।
  • परिवार और स्वास्थ्य की रक्षा: परिवार के सदस्यों की सुरक्षा, घर में सुख-शांति और उत्तम स्वास्थ्य के लिए माँ काली का आशीर्वाद प्राप्त करने में सहायक है।
  • घोर-सौम्य अनुग्रह: माँ काली के घोर और सौम्य दोनों रूपों का अनुग्रह प्राप्त होता है, जिससे जीवन में संतुलन और समृद्धि आती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री महाकाली स्तोत्रं क्या है?
श्री महाकाली स्तोत्रं देवी महाकाली की शक्ति, महिमा और विभिन्न रूपों का वर्णन करने वाला एक पवित्र स्तोत्र है। यह देवी के सृष्टि, स्थिति, संहार के अधिकार और उनके उग्र तथा सौम्य रूपों को विस्तार से बताता है।
श्री महाकाली स्तोत्रं का पाठ कब करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन मंगलवार, शुक्रवार या अमावस्या के दिनों में इसका पाठ अधिक फलदायी माना जाता है। प्रातःकाल या संध्याकाल में देवी के ध्यान के साथ पाठ करना उत्तम होता है।
श्री महाकाली स्तोत्रं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र के पाठ से दुःख, भय, रोग और शत्रुओं का नाश होता है। यह आध्यात्मिक शक्ति, साहस, बुद्धि और मानसिक शांति प्राप्त करने में भी सहायता करता है।
श्री महाकाली स्तोत्रं का पाठ कौन कर सकता है?
जो भी व्यक्ति माँ काली में श्रद्धा और भक्ति रखता है, वह इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। विशेष रूप से जीवन में चुनौतियों का सामना करने वाले, सुरक्षा चाहने वाले या आध्यात्मिक प्रगति की इच्छा रखने वाले लोग इसका पाठ कर सकते हैं।
श्री महाकाली स्तोत्रं का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन एक या तीन बार किया जा सकता है। विशेष फलों की प्राप्ति के लिए 11, 21, या 108 बार संकल्प के साथ पाठ करना उचित माना जाता है। आप अपनी सुविधा के अनुसार पाठ की संख्या निर्धारित कर सकते हैं।
श्री महाकाली स्तोत्रं का मूल या उद्गम क्या है?
श्री महाकाली स्तोत्रं को सामान्यतः मार्कण्डेय पुराण के देवी महात्म्य का एक अंश माना जाता है, जहाँ देवी की महिमा का विस्तृत वर्णन किया गया है। यह प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों का एक महत्वपूर्ण भाग है।

टिप्पणियाँ

टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...