2026

सिद्धिदात्री पूजा 2026

मंगलवार, अक्टूबर 20, 2026

मुख्य विवरण

दिल्ली के लिए

सिद्धिदात्री पूजा

माँ सिद्धिदात्री कौन हैं

नवरात्रि के नौवें और आख़िरी दिन, आश्विन शुक्ल नवमी को, माँ सिद्धिदात्री की पूजा होती है। इसे महानवमी कहते हैं। नाम का अर्थ है — सिद्धियाँ देने वाली। अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व, ये आठ सिद्धियाँ माँ की कृपा से ही मिलती हैं।

देवी पुराण से जुड़ी मान्यता है कि भगवान शिव ने भी इन्हीं की उपासना से सिद्धियाँ पाईं, और इन्हीं की कृपा से उनका आधा शरीर देवी का हुआ — वे अर्धनारीश्वर कहलाए। माँ कमल पर विराजती हैं, वाहन सिंह है, और चार भुजाओं में चक्र, गदा, शंख और कमल हैं। देवता, ऋषि, गंधर्व और असुर, सभी उनकी पूजा करते हैं।

ध्यान मंत्र

सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥

पूजा, हवन और भोग

नवमी की सुबह की पूजा का समय पंचांग के अनुसार नवमी तिथि में ही रखा जाता है। माँ को तिल का भोग लगाने की परंपरा है, और कई घरों में हलवा-पूरी-चना ही प्रसाद होता है। आज दुर्गा सप्तशती के मंत्रों से हवन करके नौ दिन की साधना पूरी की जाती है — सामग्री और क्रम हवन विधि में है। जिन परिवारों ने अष्टमी को कन्या नहीं पूजीं, वे आज कन्या पूजन करते हैं।

उत्तर भारत में महानवमी

बिहार में नवमी की रात पंडालों में सबसे ज़्यादा भीड़ होती है और मेलों का आख़िरी दिन होता है। बंगाल में इसे महानवमी के भोग और आरती के लिए जाना जाता है। उत्तर प्रदेश में कई जगह रामलीला में आज कुंभकर्ण-मेघनाद वध का मंचन होता है और अगले दिन रावण दहन। दक्षिण भारत में इसी दिन आयुध पूजा होती है। अगले दिन नवरात्रि पारण और विजयादशमी है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नवरात्रि की नवमी को किसकी पूजा होती है?
आश्विन शुक्ल नवमी यानी महानवमी को माँ सिद्धिदात्री की पूजा होती है।
माँ सिद्धिदात्री को क्या भोग लगाएं?
तिल का भोग लगाने की परंपरा है। कई घरों में हलवा, पूरी और चना ही भोग और प्रसाद होता है।
नवमी को हवन कैसे करें?
सुबह की पूजा के बाद दुर्गा सप्तशती या नवार्ण मंत्र से आहुतियाँ दी जाती हैं और पूर्णाहुति के साथ नौ दिन की पूजा पूरी होती है।
सिद्धिदात्री कौन सी सिद्धियाँ देती हैं?
अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व, ये आठ सिद्धियाँ।
क्या नवमी को व्रत खोल सकते हैं?
कई परिवार नवमी को हवन और कन्या पूजन के बाद व्रत खोलते हैं, जबकि बहुत से लोग दशमी की सुबह पारण करते हैं। अपनी पारिवारिक परंपरा मानें।

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