अपरा एकादशी
अपरा एकादशी क्या है
अपरा एकादशी ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की एकादशी है, जिसे अचला एकादशी भी कहते हैं। "अपरा" यानी अपार — मान्यता है कि यह व्रत अपार पुण्य देता है और यश बढ़ाता है। पंजाब, हरियाणा और जम्मू की ओर इसी दिन भद्रकाली एकादशी भी मनाई जाती है।
किस तिथि को
पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार यह ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी है; अमांत पंचांग में यही दिन वैशाख कृष्ण एकादशी कहलाता है। यह बुद्ध पूर्णिमा के ग्यारह दिन बाद आती है। व्रत सूर्योदय के समय की एकादशी से तय होता है।
अपरा एकादशी की कथा
पद्म पुराण में श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को बताते हैं कि धर्मात्मा राजा महीध्वज को उसके छोटे भाई वज्रध्वज ने मारकर पीपल के पेड़ के नीचे गाड़ दिया। अकाल मृत्यु के कारण राजा प्रेत बनकर उसी पेड़ पर रहने लगा और राहगीरों को सताने लगा। धौम्य ऋषि ने उसकी कहानी जानी, स्वयं अपरा एकादशी का व्रत किया और उसका पुण्य राजा को दे दिया — राजा प्रेत योनि से मुक्त हो गया।
फल और विशेष बातें
कथा में कहा गया है कि यह व्रत झूठी गवाही, निंदा, छल और गुरु-निंदा जैसे पापों का असर मिटाता है। इस दिन भगवान त्रिविक्रम (वामन) रूप की पूजा, तुलसी और पीले फूल अर्पण, और ज्येष्ठ की तपिश में जल व छाते का दान खास माना जाता है। ओडिशा में इसे जलक्रीड़ा एकादशी कहते हैं।
फलाहार के लिए एकादशी में क्या खाएं, क्या नहीं, पारण के लिए एकादशी पारण नियम और मूल कथा के लिए एकादशी व्रत कथा देखें। सालभर की एकादशी एकादशी कैलेंडर पर हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अपरा एकादशी कब आती है?
अपरा एकादशी को और किस नाम से जानते हैं?
अपरा एकादशी की कथा क्या है?
इस दिन किसकी पूजा करें?
एकादशी व्रत में क्या खाएं?
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