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श्री दत्त अपराध क्षमापण स्तोत्रं

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स्तोत्र
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श्री दत्त अपराध क्षमापण स्तोत्रं

दत्तात्रेयं त्वां नमामि प्रसीद
त्वं सर्वात्मा सर्वकर्ता न वेद |
कोऽप्यंतं ते सर्वदेवाधिदेव
ज्ञाताज्ञातान्मेऽपराधान् क्षमस्व || 1 ||

त्वदुद्भवत्वात्त्वदधीनधीत्वा-
-त्त्वमेव मे वंद्य उपास्य आत्मन् |
अथापि मौढ्यात् स्मरणं न ते मे
कृतं क्षमस्व प्रियकृन्महात्मन् || 2 ||

भोगापवर्गप्रदमार्तबंधुं
कारुण्यसिंधुं परिहाय बंधुं |
हिताय चान्यं परिमार्गयंति
हा मादृशो नष्टदृशो विमूढाः || 3 ||

न मत्समो यद्यपि पापकर्ता
न त्वत्समोऽथापि हि पापहर्ता |
न मत्समोऽन्यो दयनीय आर्य
न त्वत्समः क्वापि दयालुवर्यः || 4 ||

अनाथनाथोऽसि सुदीनबंधो
श्रीशाऽनुकंपामृतपूर्णसिंधो |
त्वत्पादभक्तिं तव दासदास्यं
त्वदीयमंत्रार्थदृढैकनिष्ठां || 5 ||

गुरुस्मृतिं निर्मलबुद्धिमाधि-
-व्याधिक्षयं मे विजयं च देहि |
इष्टार्थसिद्धिं वरलोकवश्यं
धनान्नवृद्धिं वरगोसमृद्धिं || 6 ||

पुत्रादिलब्धिं म उदारतां च
देहीश मे चास्त्वभय हि सर्वतः |
ब्रह्माग्निभूम्यो नम ओषधीभ्यो
वाचे नमो वाक्पतये च विष्णवे || 7 ||

शांताऽस्तु भूर्नः शिवमंतरिक्षं
द्यौश्चाऽभयं नोऽस्तु दिशः शिवाश्च |
आपश्च विद्युत्परिपांतु देवाः
शं सर्वतो मेऽभयमस्तु शांतिः || 8 ||

इति श्रीमद्वासुदेवानंदसरस्वती विरचितं श्री दत्तापराध क्षमापण स्तोत्रं |

अर्थ

श्री दत्त अपराध क्षमापण स्तोत्रं भगवान दत्तात्रेय की सन्निधि में भक्त के गहन पश्चाताप, शरणागति, क्षमा याचना और दिव्य अनुग्रह के लिए रचा गया एक अत्यंत पवित्र प्रार्थना है। यह स्तोत्र भक्त को अपने अज्ञान, मूढ़ता, पापों, त्रुटियों, विस्मृति और मन की दुर्बलताओं को दत्त प्रभु के समक्ष रखकर, 'मुझे क्षमा करें, मेरी रक्षा करें' का विनम्र निवेदन करने का अवसर प्रदान करता है। यह केवल क्षमा मांगने का साधन नहीं, बल्कि दत्तात्रेय परमात्मा की सर्वव्यापकता, सर्वकर्तृत्व और अनंत करुणा को जानकर, स्वयं को पूर्ण रूप से समर्पित करने का एक मार्ग है।

यह स्तोत्र दत्तात्रेय को 'सर्वांतर्यामी, सर्वकर्ता, सर्वदेवाधिदेव' कहकर नमन करने से आरंभ होता है। भक्त जाने-अनजाने में किए गए सभी अपराधों के लिए क्षमा की प्रार्थना करता है। वह स्वीकार करता है कि उसने मूर्खता से अन्य मार्ग खोजे, जबकि दत्तात्रेय ही सच्चे आश्रय हैं, और अपनी भ्रमित अवस्था को स्वीकार करता है। वह यह भी पहचानता है कि उसके जैसा पापी कोई नहीं है, और दत्तात्रेय जैसा दयालु कोई नहीं है, और इस प्रकार वह दिव्य अनुग्रह की कामना करता है। यह स्तोत्र भक्त की विनम्रता और दत्तात्रेय परमात्मा की महिमा को प्रत्येक श्लोक में उजागर करता है, जिससे भक्त का हृदय शुद्ध होता है।

भक्त अपने जीवन में गुरुस्मृति, निर्मल बुद्धि, ज्ञान, विजय, शांति, निर्भयता, धन-धान्य की वृद्धि, पुत्र आदि की प्राप्ति और सद्गति के लिए प्रार्थना करता है। दत्तात्रेय तीनों देवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) के स्वरूप हैं, इसलिए उनकी कृपा से भौतिक और आध्यात्मिक दोनों क्षेत्रों में पूर्ण सफलता और सुख प्राप्त होता है। दत्तात्रेय के चरण कमलों में पूर्ण शरणागति से, भक्त अपने सभी दुखों से मुक्ति पाकर शाश्वत आनंद और मोक्ष की ओर अग्रसर हो सकता है।

स्तोत्र का समापन लोकशांति, दिक्पालों की कृपा और सहज सुरक्षा के लिए दिव्य शांति मंत्रों के रूप में होता है। यह केवल व्यक्तिगत क्षमा और उद्धार के लिए नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के कल्याण के लिए प्रार्थना करने वाले भक्त के विशाल हृदय को दर्शाता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से मन में विनम्रता आती है और दत्तात्रेय परमात्मा की कृपा को पूर्ण रूप से ग्रहण करने का एक अनमोल मार्ग खुलता है। यह हमारी आत्मा को शुद्ध करता है और आध्यात्मिक प्रगति की नींव रखता है।

लाभ (Benefits):

  • पापों का शमन: जाने-अनजाने में किए गए सभी पाप और अपराध क्षमा हो जाते हैं, जिससे मन को शांति मिलती है।
  • विनम्रता और शरणागति: हृदय में विनम्रता, भक्ति और दत्तात्रेय प्रभु के प्रति पूर्ण शरणागति का भाव उत्पन्न होता है।
  • गुरु कृपा और ज्ञान प्राप्ति: दत्तात्रेय आदिगुरु हैं, उनकी कृपा से ज्ञान और आंतरिक शुद्धि प्राप्त होती है।
  • बाधाओं का निवारण: जीवन में आने वाली बाधाएं, भय, मानसिक दुख और रोग दूर होते हैं।
  • पारिवारिक कल्याण और समृद्धि: परिवार में सुख, समृद्धि, धन लाभ और संतान की प्राप्ति होती है।
  • आत्मशांति और विजय: मानसिक शांति, जीवन में विजय और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा प्राप्त होती है।
  • कर्म बंधनों से मुक्ति: दत्तात्रेय के अनुग्रह से कर्म बंधन शिथिल होते हैं, जिससे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री दत्त अपराध क्षमापण स्तोत्रं क्या है?
यह भगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र स्तोत्र है, जिसमें भक्त अपने जाने-अनजाने में किए गए पापों और गलतियों के लिए क्षमा मांगते हैं और दिव्य अनुग्रह प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं। यह आंतरिक शुद्धि और शरणागति का एक माध्यम है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन, विशेषकर दत्तात्रेय को समर्पित गुरुवार को या किसी भी शुभ दिन पर किया जा सकता है। स्नान करके, शुद्ध मन से, दत्तात्रेय की प्रतिमा या चित्र के सामने बैठकर पाठ करना उत्तम माना जाता है।
श्री दत्त अपराध क्षमापण स्तोत्र का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
इसके पाठ से पाप और अपराध क्षमा होते हैं, मन को शांति मिलती है, गुरु कृपा प्राप्त होती है, बाधाएं दूर होती हैं, परिवार में समृद्धि आती है और आध्यात्मिक प्रगति होती है।
यह स्तोत्र किसे पढ़ना चाहिए?
दत्तात्रेय के भक्त, अपने पापों का पश्चाताप करने वाले, जीवन में बाधाओं का सामना करने वाले, आध्यात्मिक उन्नति की इच्छा रखने वाले और मानसिक शांति की तलाश करने वाले लोग इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
सामान्यतः, इसका पाठ कम से कम 11, 21, 51, या 108 बार करना शुभ माना जाता है। नियमित रूप से एक बार पाठ करने से भी अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं।
इस स्तोत्र का मूल या स्रोत क्या है?
श्री दत्त अपराध क्षमापण स्तोत्र का सटीक मूल स्पष्ट नहीं है, लेकिन यह प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों में उल्लिखित दत्तात्रेय परंपरा का हिस्सा है। भक्त दत्तात्रेय की कृपा प्राप्त करने के लिए इसे सदियों से पढ़ते आ रहे हैं।

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