विश्वकर्मा पूजा
विश्वकर्मा पूजा देवताओं के शिल्पी और वास्तुकार भगवान विश्वकर्मा की पूजा का दिन है। यह सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश, यानी कन्या संक्रांति को मनाई जाती है, इसलिए अंग्रेज़ी कैलेंडर में इसकी तारीख लगभग हर साल सितंबर के मध्य में ही रहती है। कारखानों, वर्कशॉप, दुकानों और दफ़्तरों में इस दिन औज़ारों और मशीनों की पूजा होती है।
क्या है और क्यों मनाते हैं
पुराणों में विश्वकर्मा जी को सृष्टि का दिव्य इंजीनियर कहा गया है। मान्यता है कि उन्होंने इंद्रपुरी, द्वारका, लंका, हस्तिनापुर और इंद्रप्रस्थ जैसे नगर, पुष्पक विमान और देवताओं के अस्त्र-शस्त्र बनाए। इसलिए बढ़ई, लोहार, राजमिस्त्री, कारीगर, इंजीनियर और मशीनों पर काम करने वाले उन्हें अपना आराध्य मानते हैं।
किस तिथि को
यह पूजा चंद्र तिथि से नहीं, सूर्य की गति से तय होती है। जिस दिन सूर्य सिंह से कन्या राशि में जाता है, वही विश्वकर्मा पूजा का दिन है। अगर संक्रांति रात में हो तो पूजा अगले दिन होती है। संक्रांति का नियम संक्रांति पृष्ठ पर समझाया गया है।
कैसे मनाते हैं
- सुबह मशीनें, औज़ार और गाड़ियाँ साफ़ करके उन पर रोली, हल्दी और फूल चढ़ाए जाते हैं, और उस दिन उनसे काम नहीं लिया जाता।
- विश्वकर्मा जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर पूजा, हवन और प्रसाद वितरण होता है। हवन की विधि घर पर हवन लेख में है।
- बिहार, झारखंड, बंगाल, ओडिशा और असम में यह बहुत बड़ा उत्सव है; कई जगह पंडाल लगते हैं और पतंगें उड़ाई जाती हैं।
क्षेत्रीय परंपराएँ
पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में दिवाली के अगले दिन, गोवर्धन पूजा के साथ, विश्वकर्मा दिवस मनाया जाता है और उस दिन भी औज़ारों की पूजा होती है। अपने यहाँ की परंपरा के अनुसार दिन चुनें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
विश्वकर्मा पूजा कब होती है?
विश्वकर्मा पूजा तिथि से क्यों तय नहीं होती?
विश्वकर्मा पूजा के दिन मशीनें क्यों नहीं चलाते?
दिवाली के बाद विश्वकर्मा दिवस क्यों मनाते हैं?
विश्वकर्मा जी ने क्या-क्या बनाया था?
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