माघ अमावस्या
माघ अमावस्या क्या है
माघ अमावस्या माघ महीने के कृष्ण पक्ष की अमावस्या है, और उत्तर भारत में इसे लगभग हर जगह मौनी अमावस्या के नाम से जाना जाता है। पद्म पुराण के माघ माहात्म्य में पूरे माघ मास के स्नान को बड़ा पुण्य बताया गया है, और यह अमावस्या उस स्नान-पर्व का सबसे बड़ा दिन है। प्रयागराज के माघ मेले में सबसे अधिक श्रद्धालु इसी दिन संगम पर डुबकी लगाते हैं।
किस तिथि को
पूर्णिमांत पंचांग में यह माघ कृष्ण अमावस्या है, जो आमतौर पर जनवरी के उत्तरार्ध या फ़रवरी की शुरुआत में आती है। अमांत पंचांग में इसे पौष अमावस्या कहते हैं, इसलिए गुजरात-महाराष्ट्र के कैलेंडर में नाम बदला हुआ मिलेगा। स्नान-दान सूर्योदय वाली अमावस्या पर होता है।
माघ मास और कल्पवास
प्रयागराज में बहुत से गृहस्थ पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा तक संगम तट पर तंबुओं में रहकर कल्पवास करते हैं: दिन में एक बार सात्विक भोजन, भूमि पर शयन, तीन बार गंगा स्नान और कथा-सत्संग। माघ अमावस्या इस कल्पवास का केंद्र बिंदु है। हरिद्वार, काशी और गढ़मुक्तेश्वर के घाटों पर भी इस दिन भारी भीड़ रहती है।
इस दिन क्या करते हैं
- सूर्योदय से पहले नदी या घर पर गंगाजल मिलाकर स्नान।
- स्नान से पहले तक मौन रहना; कई लोग पूरा दिन मौन व्रत रखते हैं। इसकी विधि मौनी अमावस्या पृष्ठ पर है।
- तिल, गुड़, कंबल, घी और अन्न का दान, और पितरों का तर्पण।
आगे-पीछे के पर्व
इसी कृष्ण पक्ष में षटतिला एकादशी आती है, जिसमें तिल के छह प्रयोग होते हैं। अमावस्या के अगले दिन से माघ गुप्त नवरात्रि शुरू होती है और पाँचवें दिन वसंत पंचमी आती है। स्नान-दान की पूरी जानकारी मौनी अमावस्या स्नान और दान में पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
माघ अमावस्या और मौनी अमावस्या एक ही हैं?
कुछ कैलेंडर में इसे पौष अमावस्या क्यों लिखा होता है?
कल्पवास क्या है?
माघ अमावस्या पर क्या दान करें?
माघ अमावस्या के बाद कौन से पर्व आते हैं?
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