षटतिला एकादशी
षटतिला एकादशी क्या है
षटतिला एकादशी पर तिल का छह तरह से प्रयोग किया जाता है, इसी से इसका नाम पड़ा: षट यानी छह, तिला यानी तिल। माघ की ठंड में आने वाली इस एकादशी पर तिल का दान और अन्न-दान सबसे बड़ा पुण्य माना गया है।
किस तिथि को आती है
उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग में यह माघ कृष्ण पक्ष की एकादशी है, जो मकर संक्रांति के आसपास पड़ती है। अमांत पंचांग में यही पौष कृष्ण एकादशी लिखी जाती है। व्रत सूर्योदय के समय वाली एकादशी पर रखा जाता है।
तिल के छह प्रयोग
- तिल मिले उबटन से शरीर मलना
- तिल डले जल से स्नान
- तिल से हवन
- तिल मिले जल से तर्पण
- तिल से बनी चीज़ खाना (व्रत के नियम के अनुसार)
- तिल का दान
इन पर विस्तार से षटतिला एकादशी: तिल के छह प्रयोग में लिखा है।
कथा संक्षेप में
एक ब्राह्मणी बहुत व्रत-उपवास करती थी, पर उसने कभी किसी को अन्न नहीं दिया। भगवान विष्णु एक बार भिक्षुक बनकर उसके द्वार आए तो उसने भिक्षा में मिट्टी का एक ढेला दे दिया। देह छोड़ने पर उसे स्वर्ग में सुंदर पर खाली घर मिला। देव-कन्याओं के कहने पर उसने षटतिला एकादशी का व्रत और तिल-अन्न का दान किया, तब उसका घर अन्न-धन से भर गया।
पूजा कैसे करें
विष्णु जी को तिल, तिल के लड्डू, तुलसी और पीले फूल चढ़ाएँ, घी का दीपक जलाएँ। ज़रूरतमंदों को तिल, गुड़, कंबल या अनाज दें। पारण अगले दिन द्वादशी में करें। संक्रांति के दान की परंपरा मकर संक्रांति पर दान में भी देखें, और सामान्य कथा एकादशी व्रत कथा में।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
षटतिला एकादशी कब है?
तिल के छह प्रयोग कौन से हैं?
क्या एकादशी पर तिल खा सकते हैं?
इस दिन क्या दान करें?
षटतिला एकादशी की कथा का संदेश क्या है?
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