षटतिला एकादशी माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है, जिसमें भगवान विष्णु की पूजा के साथ तिल का छह तरह से प्रयोग किया जाता है: तिल मिले जल से स्नान, तिल का उबटन, तिल से हवन, तिल मिले जल से तर्पण, तिल खाना और तिल का दान। "षट्" यानी छह, इसीलिए नाम षटतिला। 2026 में यह एकादशी 14 जनवरी को, यानी मकर संक्रांति के ही दिन, और 2027 में 2 फ़रवरी को है (नई दिल्ली)।
कब: माघ कृष्ण एकादशी
उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग में पौष पूर्णिमा के बाद माघ मास शुरू होता है, और उसके कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि षटतिला एकादशी है। अमांत पंचांग वाले राज्यों (महाराष्ट्र, गुजरात, दक्षिण भारत) में यही तिथि "पौष कृष्ण एकादशी" कहलाती है, पर दिन वही रहता है। अंग्रेज़ी कैलेंडर में यह जनवरी या फ़रवरी की कड़ाके की ठंड में आती है, और शायद यही कारण है कि इस व्रत में तिल जैसी गरम तासीर वाली चीज़ को केंद्र में रखा गया।
पारण का समय और इस साल की तिथि षटतिला एकादशी पृष्ठ पर देखें। साल की बाकी एकादशियाँ एकादशी कैलेंडर में हैं, और हर एकादशी का नाम व फल साल की 24 एकादशी में।
तिल के छह प्रयोग
परंपरा में एक श्लोक प्रचलित है जो इन छह प्रयोगों को गिनाता है:
तिलस्नायी तिलोद्वर्ती तिलहोमी तिलोदकी।
तिलभुक् तिलदाता च षट्तिलाः पापनाशनाः॥
यानी तिल से स्नान करने वाला, तिल का उबटन लगाने वाला, तिल से हवन करने वाला, तिल मिला जल अर्पित करने वाला, तिल खाने वाला और तिल का दान करने वाला, ये छह तिल-कर्म पापों का नाश करते हैं। व्यवहार में इन्हें ऐसे करें:
- तिल स्नान: नहाने के पानी में एक चम्मच काले या सफ़ेद तिल डालें। नदी पर जाएं तो स्नान से पहले थोड़े तिल जल में प्रवाहित करें।
- तिल का उबटन (तिलोद्वर्तन): नहाने से पहले पिसे तिल में थोड़ा बेसन या हल्दी और पानी मिलाकर शरीर पर मलें। सर्दी में यह त्वचा के लिए भी अच्छा घरेलू उबटन है।
- तिल हवन: घी में तिल मिलाकर "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय स्वाहा" बोलते हुए 11, 21 या 108 आहुतियाँ दें। हवन कुंड न हो तो दीपक की लौ में कुछ दाने अर्पित करना भी परंपरा में स्वीकार है।
- तिल तर्पण (तिलोदक): तांबे के लोटे के जल में काले तिल डालकर पितरों के नाम से दक्षिण दिशा की ओर जल दें, और सूर्य को अर्घ्य भी तिल मिले जल से दें।
- तिल भोजन: व्रत में तिल-गुड़ के लड्डू या तिलकुट फलाहार के रूप में लिए जाते हैं। जो कठोर व्रत रखते हैं, वे द्वादशी के पारण में तिल वाली चीज़ खाते हैं।
- तिल दान: तिल, तिल-गुड़ के लड्डू, या तिल से भरा पात्र किसी ज़रूरतमंद या ब्राह्मण को दान करें।
छहों प्रयोग न कर सकें तो कम से कम तिल स्नान, विष्णु जी को तिल अर्पण और तिल दान ज़रूर करें; भाव से किया गया थोड़ा भी पूरा माना जाता है।
पूजा विधि
- दशमी की शाम: सूर्यास्त से पहले सादा सात्विक भोजन करें, चावल, लहसुन-प्याज़ और मसूर से बचें। तुलसी दल भी इसी दिन तोड़कर रख लें, क्योंकि एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती।
- एकादशी की सुबह: तिल का उबटन लगाकर तिल मिले जल से स्नान करें और पीले वस्त्र पहनें।
- संकल्प: हाथ में जल, तिल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें कि आप निर्जल, फलाहार या एक समय फलाहार किस रूप में व्रत रखेंगे।
- विष्णु पूजन: चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर विष्णु जी या लड्डू गोपाल को स्थापित करें। पंचामृत से स्नान, पीला चंदन, पीले फूल, तुलसी दल और तिल अर्पित करें।
- भोग: तिल-गुड़ के लड्डू, तिलकुट, फल और तुलसी दल का भोग लगाएं।
- हवन और जप: तिल की आहुतियाँ दें और "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जप करें। विष्णु सहस्रनाम का पाठ भी किया जाता है।
- कथा और आरती: दोपहर या शाम को षटतिला एकादशी की कथा सुनें, फिर ॐ जय जगदीश हरे गाएं।
- रात्रि जागरण: सामर्थ्य हो तो रात में भजन-कीर्तन करें।
- पारण: द्वादशी को सुबह स्नान करके पहले तिल दान करें, फिर तय पारण समय में व्रत खोलें। हरि वासर में पारण नहीं किया जाता; नियम एकादशी व्रत पारण में देखें।
व्रत में क्या खाएं और क्या नहीं, इसकी पूरी सूची एकादशी में क्या खाएं, क्या नहीं में है। इस एकादशी पर फलाहार में तिल-गुड़, मूँगफली, शकरकंद, सिंघाड़े का आटा और दूध अच्छे विकल्प हैं।
तिल का दान
माघ में तिल दान को बहुत पुण्यकारी माना गया है, और षटतिला एकादशी इसका सबसे खास दिन है।
- क्या दें: काले तिल, तिल-गुड़ के लड्डू, तिल से भरा तांबे या पीतल का पात्र, तिल के तेल की शीशी।
- साथ में: ठंड का मौसम है, इसलिए कंबल, ऊनी कपड़े, गुड़ और अन्न का दान भी जोड़ें।
- किसे: मंदिर के पुजारी, किसी ब्राह्मण परिवार, या सबसे अच्छा, किसी ज़रूरतमंद को जिसे सच में इसकी आवश्यकता हो।
- कब: एकादशी के दिन या द्वादशी को पारण से पहले।
जिस साल यह एकादशी मकर संक्रांति के आसपास पड़ती है, उस साल तिल-गुड़ और खिचड़ी का दान दोनों पर्वों का पुण्य एक साथ देता है। संक्रांति के दान के बारे में मकर संक्रांति पर क्या दान करें पढ़ें।
कथा संक्षेप
पद्म पुराण की परंपरा से जुड़ी इस कथा में एक धर्मपरायण ब्राह्मणी थी, जो खूब व्रत-उपवास करती थी पर कभी अन्न का दान नहीं करती थी। भगवान विष्णु भिक्षु बनकर उसके द्वार आए तो उसने उनके पात्र में मिट्टी का ढेला डाल दिया। मृत्यु के बाद उसे स्वर्ग में सुंदर घर तो मिला, पर वह अन्न और धन से खाली था। तब भगवान के कहने पर उसने देव-स्त्रियों से षटतिला एकादशी का विधान जानकर व्रत किया और तिल का दान किया, और उसका घर अन्न-धन से भर गया।
कथा की सीख सीधी है: व्रत-उपवास के साथ दान भी ज़रूरी है। एकादशी की मूल कथा, यानी एकादशी देवी के जन्म की कहानी, एकादशी व्रत कथा में पढ़ें।

