पद्मिनी एकादशी
पद्मिनी एकादशी क्या है
पद्मिनी एकादशी हर साल नहीं आती। यह अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, इसलिए केवल उन्हीं वर्षों में पड़ती है जिनमें अधिक मास जुड़ता है, यानी लगभग तीन साल में एक बार। इसे कमला एकादशी और पुरुषोत्तमी एकादशी भी कहते हैं। पुरुषोत्तम मास स्वयं भगवान विष्णु को समर्पित है, इसलिए इस एकादशी का व्रत बहुत पुण्यदायी माना गया है।
किस तिथि को आती है
जिस साल अधिक मास हो, उसके शुक्ल पक्ष की एकादशी पद्मिनी एकादशी होती है। अधिक मास किस महीने के साथ जुड़ेगा, यह हर बार बदलता है, इसलिए इसका महीना तय नहीं है। अधिक मास क्यों और कैसे आता है, यह अधिक मास क्या है में समझाया गया है।
कथा संक्षेप में
त्रेता युग में महिष्मती के राजा कृतवीर्य की कई रानियाँ थीं, पर किसी से पुत्र नहीं हुआ। राजा अपनी प्रिय रानी पद्मिनी के साथ, जो राजा हरिश्चंद्र की पुत्री थीं, गंधमादन पर्वत पर तप करने गए। वर्षों के तप के बाद भी फल नहीं मिला, तब माता अनसूया ने रानी को अधिक मास की शुक्ल एकादशी का व्रत बताया। रानी ने निर्जल रहकर, रात भर जागकर व्रत किया। भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और उन्हें पुत्र हुआ, जो आगे चलकर पराक्रमी कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रबाहु) कहलाया।
कैसे मनाते हैं
पुरुषोत्तम मास में बहुत से लोग पूरे महीने कथा, दीपदान और विष्णु पूजा करते हैं; यह एकादशी उस साधना का शिखर है। सुबह स्नान के बाद विष्णु जी को कमल या पीले फूल, तुलसी, धूप-दीप और फल चढ़ाएँ, कथा सुनें और रात में भजन-कीर्तन करें। दूसरे दिन द्वादशी में पारण करें, नियम एकादशी पारण में देखें। सामान्य कथा एकादशी व्रत कथा में और इसी मास की दूसरी एकादशी परम एकादशी पर पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पद्मिनी एकादशी कब आती है?
पद्मिनी एकादशी के दूसरे नाम क्या हैं?
इसकी कथा किससे जुड़ी है?
इस व्रत का फल क्या माना गया है?
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