मत्स्य द्वादशी
मत्स्य द्वादशी मार्गशीर्ष शुक्ल द्वादशी को भगवान विष्णु के पहले अवतार, मत्स्य रूप की स्मृति में मनाई जाती है। यह मोक्षदा एकादशी और गीता जयंती के अगले दिन आती है, इसलिए इस दिन एकादशी का पारण और विष्णु पूजन दोनों साथ होते हैं।
क्या है और क्यों मनाते हैं
मत्स्य पुराण और भागवत में कथा है कि प्रलय से पहले राजा सत्यव्रत (मनु) को एक छोटी मछली मिली जो बढ़ती ही गई। वही भगवान विष्णु थे। उन्होंने मनु से एक नाव में सप्तऋषियों, बीजों और जीवों को रखने को कहा और प्रलय के जल में अपने सींग से बंधी नाव को पार लगाया। एक प्रसंग में वे हयग्रीव असुर से वेदों को वापस लाते हैं। दसों अवतारों का क्रम विष्णु के 10 अवतार लेख में है।
किस तिथि को
मार्गशीर्ष (अगहन) मास, शुक्ल पक्ष, द्वादशी, जिस दिन सूर्योदय पर द्वादशी हो। ध्यान रहे, उत्तर भारत में मत्स्य जयंती आम तौर पर चैत्र शुक्ल तृतीया को मानी जाती है; मार्गशीर्ष की मत्स्य द्वादशी अलग पर्व है, जो दक्षिण भारत में ज़्यादा प्रचलित है।
कैसे मनाते हैं
- मोक्षदा एकादशी का व्रत रखने वाले इसी दिन विधि से पारण करते हैं।
- जल से भरे कलश पर विष्णु जी की मूर्ति या चित्र रखकर पूजा, तुलसी और पीले फूल के साथ।
- कई लोग नदी या तालाब में मछलियों को आटे की गोलियाँ खिलाते हैं।
- विष्णु सहस्रनाम या गीता का पाठ, क्योंकि एक दिन पहले ही गीता जयंती होती है।
अगहन मास का महत्व मार्गशीर्ष मास लेख में पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
मत्स्य द्वादशी कब होती है?
मत्स्य द्वादशी पर किसकी पूजा होती है?
क्या मत्स्य द्वादशी और मत्स्य जयंती एक ही हैं?
मत्स्य द्वादशी पर क्या करें?
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