- ॐ मत्स्याय नमः
- ॐ महालयांबोधि संचारिणे नमः
- ॐ मनुपालकाय नमः
- ॐ महीनौकापृष्ठदेशाय नमः
- ॐ महासुरविनाशनाय नमः
- ॐ महाम्नायगणाहर्त्रे नमः
- ॐ महनीयगुणाद्भुताय नमः
- ॐ मरालवाहव्यसनच्छेत्रे नमः
- ॐ मथितसागराय नमः
- ॐ महासत्वाय नमः
- ॐ महायादोगणभुजे नमः
- ॐ मधुराकृतये नमः
- ॐ मंदोल्लुंठनसंक्षुब्धसिंधु भंगहतोर्ध्वखाय नमः
- ॐ महाशयाय नमः
- ॐ महाधीराय नमः
- ॐ महौषधिसमुद्धराय नमः
- ॐ महायशसे नमः
- ॐ महानंदाय नमः
- ॐ महातेजसे नमः
- ॐ महावपुषे नमः
- ॐ महीपंकपृषत्पृष्ठाय नमः
- ॐ महाकल्पार्णवह्रदाय नमः
- ॐ मित्रशुभ्रांशुवलय नेत्राय नमः
- ॐ मुखमहानभसे नमः
- ॐ महालक्ष्मीनेत्ररूप गर्व सर्वंकषाकृतये नमः
- ॐ महामायाय नमः
- ॐ महाभूतपालकाय नमः
- ॐ मृत्युमारकाय नमः
- ॐ महाजवाय नमः
- ॐ महापृच्छच्छिन्न मीनादि राशिकाय नमः
- ॐ महातलतलाय नमः
- ॐ मर्त्यलोकगर्भाय नमः
- ॐ मरुत्पतये नमः
- ॐ मरुत्पतिस्थानपृष्ठाय नमः
- ॐ महादेवसभाजिताय नमः
- ॐ महेंद्राद्यखिल प्राणि मारणाय नमः
- ॐ मृदिताखिलाय नमः
- ॐ मनोमयाय नमः
- ॐ माननीयाय नमः
- ॐ मनस्स्विने नमः
- ॐ मानवर्धनाय नमः
- ॐ मनीषिमानसांभोधि शायिने नमः
- ॐ मनुविभीषणाय नमः
- ॐ मृदुगर्भाय नमः
- ॐ मृगांकाभाय नमः
- ॐ मृग्यपादाय नमः
- ॐ महोदराय नमः
- ॐ महाकर्तरिकापुच्छाय नमः
- ॐ मनोदुर्गमवैभवाय नमः
- ॐ मनीषिणे नमः
- ॐ मध्यरहिताय नमः
- ॐ मृषाजन्मने नमः
- ॐ मृतव्ययाय नमः
- ॐ मोघेतरोरु संकल्पाय नमः
- ॐ मोक्षदायिने नमः
- ॐ महागुरवे नमः
- ॐ मोहासंगसमुज्जृंभत्सच्चिदानंद विग्रहाय नमः
- ॐ मोहकाय नमः
- ॐ मोहसंहर्त्रे नमः
- ॐ मोहदूराय नमः
- ॐ महोदयाय नमः
- ॐ मोहितोत्तोरितमनवे नमः
- ॐ मोचिताश्रितकश्मलाय नमः
- ॐ महर्षिनिकरस्तुत्याय नमः
- ॐ मनुज्ञानोपदेशिकाय नमः
- ॐ महीनौबंधनाहींद्ररज्जु बद्धैकशृंगकाय नमः
- ॐ महावातहतोर्वीनौस्तंभनाय नमः
- ॐ महिमाकराय नमः
- ॐ महांबुधितरंगाप्तसैकती भूत विग्रहाय नमः
- ॐ मरालवाहनिद्रांत साक्षिणे नमः
- ॐ मधुनिषूदनाय नमः
- ॐ महाब्धिवसनाय नमः
- ॐ मत्ताय नमः
- ॐ महामारुतवीजिताय नमः
- ॐ महाकाशालयाय नमः
- ॐ मूर्छत्तमोंबुधिकृताप्लवाय नमः
- ॐ मृदिताब्दारिविभवाय नमः
- ॐ मुषितप्राणिचेतनाय नमः
- ॐ मृदुचित्ताय नमः
- ॐ मधुरवाचे नमः
- ॐ मृष्टकामाय नमः
- ॐ महेश्वराय नमः
- ॐ मरालवाहस्वापांत दत्तवेदाय नमः
- ॐ महाकृतये नमः
- ॐ महीश्लिष्टाय नमः
- ॐ महीनाधाय नमः
- ॐ मरुन्मालामहामणये नमः
- ॐ महीभारपरीहर्त्रे नमः
- ॐ महाशक्तये नमः
- ॐ महोदयाय नमः
- ॐ महन्महते नमः
- ॐ मग्नलोकाय नमः
- ॐ महाशांतये नमः
- ॐ महन्महसे नमः
- ॐ महावेदाब्धिसंचारिणे नमः
- ॐ महात्मने नमः
- ॐ मोहितात्मभुवे नमः
- ॐ मंत्रस्मृतिभ्रंशहेतवे नमः
- ॐ मंत्रकृते नमः
- ॐ मंत्रशेवधये नमः
- ॐ मंत्रमंत्रार्थ तत्त्वज्ञाय नमः
- ॐ मंत्रार्थाय नमः
- ॐ मंत्रदैवताय नमः
- ॐ मंत्रोक्तकारिप्रणयिने नमः
- ॐ मंत्रराशिफलप्रदाय नमः
- ॐ मंत्रतात्पर्यविषयाय नमः
- ॐ मनोमंत्राद्यगोचराय नमः
- ॐ मंत्रार्थवित्कृतक्षेमाय नमः
|| इति श्री मत्स्य अष्टोत्तर शतनामावळि संपूर्णं ||
अर्थ
श्री मत्स्य अष्टोत्तर शतनामावलि भगवान विष्णु के दशावतारों में से प्रथम मत्स्य अवतार को समर्पित 108 पवित्र नामों का स्तोत्र है। सृष्टि के प्रलयकाल में, जब हयग्रीव नामक असुर ने ज्ञान के स्रोत वेदों का हरण कर लिया था, तब भगवान ने मत्स्य रूप धारण कर उनका उद्धार किया। उसी समय, उन्होंने महाप्रलय से मनु (मानवता के प्रथम राजा), सप्तऋषियों और समस्त वनस्पतियों से युक्त एक नौका को अपनी पीठ पर धारण करके बचाया, जिससे नई सृष्टि का आरंभ हो सका। यह नामावलि भगवान के इन महान कार्यों, उनकी अनंत शक्ति, करुणा और सृष्टि के संरक्षण में उनकी भूमिका का विस्तार से वर्णन करती है।
इस अष्टोत्तर शतनामावलि का प्रत्येक नाम भगवान मत्स्य के दिव्य गुणों, लीलाओं और लोक कल्याण हेतु उनके द्वारा किए गए महान कार्यों को उजागर करता है। 'ॐ मत्स्याय नमः' से प्रारंभ होकर, 'ॐ महालयाम्बोधि संचारिणे नमः' (प्रलयकाल के महासागर में विचरण करने वाले), 'ॐ मनुपालकाय नमः' (मनु महाराज की रक्षा करने वाले), 'ॐ महीनौकापृष्ठदेशाय नमः' (पृथ्वी को अपनी पीठ पर नौका के समान धारण करने वाले) जैसे नाम भगवान की सर्वव्यापकता, रक्षा करने की क्षमता और जीव-जंतुओं के संरक्षक के रूप में उनकी भूमिका को दर्शाते हैं। 'ॐ महाम्नायगणा हर्त्रे नमः' नाम वेदों को वापस लाकर ज्ञान को पुनः स्थापित करने में उनकी भूमिका का स्मरण कराता है।
'ॐ महाशयाय नमः' (महान आश्रयदाता), 'ॐ महाधीराय नमः' (महा धैर्यवान), 'ॐ महायशसे नमः' (महान कीर्तिवान), 'ॐ महानंदाय नमः' (महान आनंदमय), 'ॐ महातेजसे नमः' (महान तेजस्वी) जैसे नाम भगवान के दिव्य व्यक्तित्व और उनके अनुग्रह पर आश्रित रहने वालों को मिलने वाली शांति, धैर्य, सफलता और आनंद को इंगित करते हैं। प्रलय जैसी भीषण आपदा में भी धैर्य न खोते हुए जगत की रक्षा करने वाले मत्स्य भगवान, अपने भक्तों को भी जीवन की कठिनाइयों से पार लगाते हैं, यह विश्वास इस नामावलि के पाठ से और भी दृढ़ होता है।
यह स्तोत्र केवल नामों का संग्रह नहीं, बल्कि भगवान की दिव्य लीलाओं और गुणों का स्मरण है। इसका पाठ करने से मन शांत होता है, भक्ति बढ़ती है और जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है। मत्स्य भगवान दुष्ट शक्तियों का नाश करने वाले और धर्म की रक्षा करने वाले हैं, यह नामावलि बार-बार दोहराती है, और उनके चरणों में शरणागत होने वालों को मोक्ष का मार्ग दिखाती है। यह हमें सिखाता है कि जब भी धर्म और मानवता संकट में हो, परमात्मा किसी न किसी रूप में हमारी रक्षा के लिए अवश्य आते हैं।
लाभ (Benefits):
- संकटों से मुक्ति: प्रलय जैसे महासंकट से जगत की रक्षा करने वाले मत्स्य भगवान इस स्तोत्र का पाठ करने वालों को सभी कठिनाइयों, भय और बाधाओं से बचाते हैं। यह कठिन समय में साहस और आशा प्रदान करता है।
- ज्ञान में वृद्धि: वेदों को दुष्टों से बचाकर मानवता को लौटाने वाले भगवान के नामों का पाठ करने से ज्ञान, बुद्धि और विवेक में वृद्धि होती है। यह छात्रों के लिए बेहतर परिणामों और ज्ञान प्राप्ति में सहायक है।
- सुरक्षा और आश्रय: जैसे महाप्रलय में मनु और सप्तऋषियों को आश्रय दिया, वैसे ही यह नामावलि कलियुग के संकटों में भक्तों को दैवीय सुरक्षा और आश्रय प्रदान करती है। यह किसी भी खतरे से बचने में मदद करती है।
- मानसिक शांति: मत्स्य भगवान के नामों का स्मरण करने से मन को शांति, सुकून और धैर्य मिलता है। यह नकारात्मक विचारों और तनाव से मुक्ति पाने में सहायक है।
- इच्छाओं की पूर्ति: भक्ति और श्रद्धा से इस नामावलि का पाठ करने से भक्तों की सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में समृद्धि, सुख तथा सफलता प्राप्त होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री मत्स्य अष्टोत्तर शतनामावलि क्या है?
श्री मत्स्य अष्टोत्तर शतनामावलि का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस नामावलि का पाठ करने से क्या लाभ मिलते हैं?
श्री मत्स्य अष्टोत्तर शतनामावलि का पाठ कौन कर सकता है?
इस नामावलि का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री मत्स्य अष्टोत्तर शतनामावलि का उद्गम क्या है?
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