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श्री परशुराम अष्टोत्तरशतनामावळिः

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अष्टोत्तर108 नाम
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  1. ॐ रामाय नमः
  2. ॐ राजाटवीवह्नये नमः
  3. ॐ रामचंद्रप्रसादकाय नमः
  4. ॐ राजरक्तारुणस्नाताय नमः
  5. ॐ राजीवायतलोचनाय नमः
  6. ॐ रैणुकेयाय नमः
  7. ॐ रुद्रशिष्याय नमः
  8. ॐ रेणुकाच्छेदनाय नमः
  9. ॐ रयिणे नमः
  10. ॐ रणधूतमहासेनाय नमः 10
  11. ॐ रुद्राणीधर्मपुत्रकाय नमः
  12. ॐ राजत्परशुविच्छिन्नकार्तवीर्यार्जुनद्रुमाय नमः
  13. ॐ राताखिलरसाय नमः
  14. ॐ रक्तकृतपैतृक तर्पणाय नमः
  15. ॐ रत्नाकरकृतावासाय नमः
  16. ॐ रतीशकृतविस्मयाय नमः
  17. ॐ रागहीनाय नमः
  18. ॐ रागदूराय नमः
  19. ॐ रक्षितब्रह्मचर्यकाय नमः
  20. ॐ राज्यमत्तक्षत्त्रबीज भर्जनाग्निप्रतापवते नमः 20
  21. ॐ राजद्भृगुकुलांबोधिचंद्रमसे नमः
  22. ॐ रंजितद्विजाय नमः
  23. ॐ रक्तोपवीताय नमः
  24. ॐ रक्ताक्षाय नमः
  25. ॐ रक्तलिप्ताय नमः
  26. ॐ रणोद्धताय नमः
  27. ॐ रणत्कुठाराय नमः
  28. ॐ रविभूदंडायित महाभुजाय नमः
  29. ॐ रमानाधधनुर्धारिणे नमः
  30. ॐ रमापतिकलामयाय नमः 30
  31. ॐ रमालयमहावक्षसे नमः
  32. ॐ रमानुजलसन्मुखाय नमः
  33. ॐ रणैकमल्लाय नमः
  34. ॐ रसनाऽविषयोद्दंड पौरुषाय नमः
  35. ॐ रामनामश्रुतिस्रस्तक्षत्रियागर्भसंचयाय नमः
  36. ॐ रोषानलमयाकाराय नमः
  37. ॐ रेणुकापुनराननाय नमः
  38. ॐ रधेयचातकांभोदाय नमः
  39. ॐ रुद्धचापकलापगाय नमः
  40. ॐ राजीवचरणद्वंद्वचिह्नपूतमहेंद्रकाय नमः 40
  41. ॐ रामचंद्रन्यस्ततेजसे नमः
  42. ॐ राजशब्दार्धनाशनाय नमः
  43. ॐ राद्धदेवद्विजव्राताय नमः
  44. ॐ रोहिताश्वाननार्चिताय नमः
  45. ॐ रोहिताश्वदुराधर्षाय नमः
  46. ॐ रोहिताश्वप्रपावनाय नमः
  47. ॐ रामनामप्रधानार्धाय नमः
  48. ॐ रत्नाकरगभीरधिये नमः
  49. ॐ राजन्मौंजीसमाबद्ध सिंहमध्याय नमः
  50. ॐ रविद्युतये नमः 50
  51. ॐ रजताद्रिगुरुस्थानाय नमः
  52. ॐ रुद्राणीप्रेमभाजनाय नमः
  53. ॐ रुद्रभक्ताय नमः
  54. ॐ रौद्रमूर्तये नमः
  55. ॐ रुद्राधिकपराक्रमाय नमः
  56. ॐ रविताराचिरस्थायिने नमः
  57. ॐ रक्तदेवर्षिभावनाय नमः
  58. ॐ रम्याय नमः
  59. ॐ रम्यगुणाय नमः
  60. ॐ रक्ताय नमः 60
  61. ॐ रातभक्ताखिलेप्सिताय नमः
  62. ॐ रचितस्वर्गगोपाय नमः
  63. ॐ रंधिताशयवासनाय नमः
  64. ॐ रुद्धप्राणादिसंचाराय नमः
  65. ॐ राजद्ब्रह्मपदस्थिताय नमः
  66. ॐ रत्नसानुमहाधीराय नमः
  67. ॐ रसासुरशिखामणये नमः
  68. ॐ रक्तसिद्धये नमः
  69. ॐ रम्यतपसे नमः
  70. ॐ राततीर्थाटनाय नमः 70
  71. ॐ रसिने नमः
  72. ॐ रचितभ्रातृहननाय नमः
  73. ॐ रक्षितभातृकाय नमः
  74. ॐ राणिने नमः
  75. ॐ राजापहृततातेष्टिधेन्वाहर्त्रे नमः
  76. ॐ रसाप्रभवे नमः
  77. ॐ रक्षितब्राह्म्यसाम्राज्याय नमः
  78. ॐ रौद्राणेयजयध्वजाय नमः
  79. ॐ राजकीर्तिमयच्छत्राय नमः
  80. ॐ रोमहर्षणविक्रमाय नमः 80
  81. ॐ राजसौर्यरसांभोधिकुंभसंभूतिसायकाय नमः
  82. ॐ रात्रिंदिवसमाजाग्रत्प्रतापग्रीष्मभास्कराय नमः
  83. ॐ राजबीजोदरक्षोणीपरित्यागिने नमः
  84. ॐ रसात्पतये नमः
  85. ॐ रसाभारहराय नमः
  86. ॐ रस्याय नमः
  87. ॐ राजीवजकृतक्षमाय नमः
  88. ॐ रुद्रमेरुधनुर्भंग कृद्धात्मने नमः
  89. ॐ रौद्रभूषणाय नमः
  90. ॐ रामचंद्रमुखज्योत्स्नामृतक्षालितहृन्मलाय नमः 90
  91. ॐ रामाभिन्नाय नमः
  92. ॐ रुद्रमयाय नमः
  93. ॐ रामरुद्रो भयात्मकाय नमः
  94. ॐ रामपूजितपादाब्जाय नमः
  95. ॐ रामविद्वेषिकैतवाय नमः
  96. ॐ रामानंदाय नमः
  97. ॐ रामनामाय नमः
  98. ॐ रामाय नमः
  99. ॐ रामात्मनिर्भिदाय नमः
  100. ॐ रामप्रियाय नमः 100
  101. ॐ रामतृप्ताय नमः
  102. ॐ रामगाय नमः
  103. ॐ रामविश्रमाय नमः
  104. ॐ रामज्ञानकुठारात्तराजलोकमहातमसे नमः
  105. ॐ रामात्ममुक्तिदाय नमः
  106. ॐ रामाय नमः
  107. ॐ रामदाय नमः
  108. ॐ राममंगलाय नमः 108

|| इति श्री  परशुराम अष्टोत्तर शतनामावळि समाप्तं ||

अर्थ

श्री परशुराम अष्टोत्तरशतनामावळिः भगवान विष्णु के छठे अवतार, श्री परशुराम जी के 108 पवित्र नामों का एक दिव्य स्तोत्र है। यह नामावली परशुराम जी के गुणों, उनके शौर्य, उनकी धर्मनिष्ठा और उनके अलौकिक कार्यों का स्मरण कराती है। प्रत्येक नाम का गहरा आध्यात्मिक अर्थ है, जो भक्तों को परशुराम जी की शक्ति और आशीर्वाद प्राप्त करने में सहायता करता है। महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र परशुराम जी ने अहंकारी क्षत्रिय राजाओं के अत्याचारों को समाप्त करने के लिए पृथ्वी पर अवतार लिया था। इस नामावली का पाठ भक्तों को साहस, शक्ति और न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

इस अष्टोत्तरशतनामावळिः का प्रत्येक नाम एक मंत्र के समान है। 'ॐ रामाय नमः' जैसे सरल किंतु शक्तिशाली नाम से शुरू होकर, ये नाम परशुराम जी के विभिन्न स्वरूपों, उनके गुरु भगवान शिव के साथ उनके संबंध और उनके दिव्य अस्त्र, परशु के महत्व का वर्णन करते हैं। 'राजराजेश्वर रक्त स्नाताय नमः' नाम अधर्मी राजाओं के रक्त में स्नान करने वाले उनके तीव्र स्वभाव को दर्शाता है, जबकि 'रैणुकेयाय नमः' उनकी माता के पुत्र के रूप में उनकी पहचान को उजागर करता है। 'रुद्रशिष्याय नमः' हमें याद दिलाता है कि उन्होंने शिव से परशु विद्या सीखी थी। 'राज्यमत्तक्षत्रबीज भर्जनाग्निप्रतापवते नमः' नाम उन अहंकारी क्षत्रियों को नष्ट करने की उनकी अपार शक्ति का वर्णन करता है जो सत्ता के मद में अंधे हो गए थे। भृगु कुल के चंद्रमा के समान प्रकाशित परशुराम जी ने सत्य और धर्म की स्थापना के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।

इस नामावली का पाठ केवल स्तुति ही नहीं, बल्कि भक्तों के मन में व्याप्त अज्ञान और नकारात्मक शक्तियों को नष्ट करने की एक आध्यात्मिक प्रक्रिया भी है। परशुराम जी का परशु (कुल्हाड़ी) केवल एक भौतिक हथियार नहीं है, यह अधर्म, अहंकार और अज्ञान को भेदने वाले ज्ञान का प्रतीक है। उनके 108 नामों का स्मरण करने से, भक्त अपने जीवन में परशुराम जी के दिव्य गुणों को आत्मसात करने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं। यह आंतरिक शुद्धि, आत्मविश्वास में वृद्धि और चुनौतियों का सामना करने की क्षमता प्रदान करता है। कलियुग में धर्मरक्षक के रूप में पूजे जाने वाले परशुराम जी की यह नामावली भक्तों को सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्ति दिलाकर शांति और समृद्धि प्रदान करती है।

लाभ (Benefits):

  • शत्रुनाश और सुरक्षा: जिस प्रकार परशुराम जी ने अधर्म का नाश किया, उसी प्रकार इस नामावली का पाठ भक्तों को बाहरी और आंतरिक शत्रुओं (जैसे क्रोध, अहंकार) से रक्षा करता है और सभी बाधाओं को दूर करता है।
  • साहस और आत्मविश्वास में वृद्धि: परशुराम जी के अद्वितीय शौर्य और साहस का स्मरण करने से भक्तों में आत्मविश्वास और किसी भी चुनौती का सामना करने का साहस बढ़ता है।
  • न्याय और धर्मनिष्ठा: परशुराम जी धर्म के रक्षक हैं। उनकी नामावली का पाठ करने से भक्तों में न्याय की भावना और धर्मनिष्ठा बढ़ती है, जिससे वे हमेशा सत्य के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित होते हैं।
  • आध्यात्मिक शक्ति और शांति: इन पवित्र नामों का निरंतर पाठ मन को शांति प्रदान करता है, आध्यात्मिक शक्ति को बढ़ाता है और आंतरिक शुद्धि में सहायता करता है।
  • मनोकामना पूर्ति: भक्तिभाव से इस नामावली का पाठ करने से भक्तों की सच्ची इच्छाएं और मनोकामनाएं पूरी होती हैं, ऐसी मान्यता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री परशुराम अष्टोत्तरशतनामावळिः क्या है?
यह भगवान विष्णु के छठे अवतार, श्री परशुराम जी के 108 पवित्र नामों का एक भक्ति स्तोत्र है। ये नाम परशुराम जी के शौर्य, धर्मनिष्ठा और दिव्य गुणों की स्तुति करते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ किसी भी शुभ दिन, विशेषकर शुक्रवार या परशुराम जयंती पर किया जा सकता है। स्नान करके शुद्ध होकर, शांत वातावरण में भगवान के सामने बैठकर भक्तिपूर्वक पाठ करना उत्तम है।
इस स्तोत्र का पाठ करने से क्या लाभ मिलते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ करने से साहस, शक्ति, आत्मविश्वास बढ़ता है, शत्रुओं से रक्षा मिलती है, बाधाएं दूर होती हैं और आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है। यह धर्मनिष्ठा को भी बढ़ाता है।
कौन इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है?
परशुराम जी की कृपा प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले, साहस और शक्ति प्राप्त करने वाले, या अपने जीवन में न्याय और धर्म स्थापित करने वाले कोई भी व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
आमतौर पर, अच्छे परिणामों के लिए प्रतिदिन कम से कम एक बार या 11, 21, 108 बार पाठ करना श्रेष्ठ माना जाता है। भक्ति और एकाग्रता के साथ पाठ करना महत्वपूर्ण है।
इस स्तोत्र का मूल या उद्गम क्या है?
श्री परशुराम अष्टोत्तरशतनामावळिः प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों में उल्लिखित एक स्तोत्र है, जिसे भगवान परशुराम की महिमा का गुणगान करने के लिए रचा गया है। इसका विशिष्ट प्राचीन स्रोत विभिन्न पुराणों में निहित है।

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