शैलपुत्री पूजा
माँ शैलपुत्री कौन हैं
शारदीय नवरात्रि के पहले दिन, आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को, नवदुर्गा के पहले रूप माँ शैलपुत्री की पूजा होती है। पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लेने के कारण वे "शैल की पुत्री" कहलाईं। पिछले जन्म में यही दक्ष की बेटी सती थीं, जिन्होंने पिता के यज्ञ में शिव का अपमान सहन न कर पाने पर देह त्याग दी थी, और इस जन्म में फिर शिव को ही पति रूप में पाया।
माँ बैल पर सवार हैं, दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ में कमल है, माथे पर अर्धचंद्र। योग की परंपरा में पहला दिन मूलाधार चक्र से जुड़ा माना जाता है — यानी नौ दिन की साधना की नींव।
ध्यान मंत्र
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
जो लंबा पाठ न कर सकें, वे "ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः" की एक माला कर लें।
पूजा और भोग
सुबह घटस्थापना के बाद कलश के पास माँ की तस्वीर रखकर रोली, अक्षत, लाल चुनरी और फूल चढ़ाए जाते हैं। पहले दिन गाय के शुद्ध घी का भोग लगाने की परंपरा है — घी का दीपक, घी से बना हलवा या सीधे घी अर्पित किया जाता है। इसके बाद दुर्गा चालीसा या सप्तशती का पाठ और शाम को जय अम्बे गौरी आरती होती है।
इस दिन घरों में
व्रत रखने वाले आज से फलाहार शुरू करते हैं — कुट्टू, सिंघाड़ा, साबूदाना, आलू और सेंधा नमक; पूरी सूची नवरात्रि व्रत में क्या खाएं में है। दिल्ली, पंजाब और पश्चिमी यूपी में बहुत से लोग "पहला और आख़िरी नवरात्र" रखते हैं, यानी केवल प्रतिपदा और अष्टमी का व्रत। उत्तराखंड और हिमाचल में शैलपुत्री को पहाड़ की बेटी मानकर विशेष स्नेह से पूजा जाता है। नौ रूपों का पूरा परिचय नवदुर्गा के नौ रूप में पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नवरात्रि के पहले दिन किस देवी की पूजा होती है?
माँ शैलपुत्री को क्या भोग लगाएं?
शैलपुत्री का वाहन क्या है?
शैलपुत्री पूजा का मंत्र कौन सा है?
क्या घटस्थापना और शैलपुत्री पूजा एक ही दिन होती है?
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