2026

कात्यायनी पूजा 2026

शुक्रवार, अक्टूबर 16, 2026

मुख्य विवरण

दिल्ली के लिए

कात्यायनी पूजा

माँ कात्यायनी कौन हैं

नवरात्रि के छठे दिन, आश्विन शुक्ल षष्ठी को, माँ कात्यायनी की पूजा होती है। कथा है कि महर्षि कात्यायन ने वर्षों तप करके यह वर माँगा कि देवी उनके घर पुत्री बनकर आएँ। जब महिषासुर का अत्याचार बढ़ा, तब देवताओं के तेज से प्रकट हुई देवी ने पहले कात्यायन ऋषि के आश्रम में उनकी पूजा स्वीकार की, इसलिए कात्यायनी कहलाईं, और फिर महिषासुर का वध किया।

माँ का रंग सोने जैसा है, चार भुजाओं में तलवार और कमल हैं, बाकी दो अभय और वरद मुद्रा में; वाहन सिंह है। इस दिन को आज्ञा चक्र से जोड़ा जाता है।

मंत्र

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥

भागवत पुराण में बताया गया है कि ब्रज की गोपियों ने श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने के लिए यमुना किनारे कात्यायनी व्रत किया था और यह मंत्र जपा था:

कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः॥

पूजा और भोग

छठे दिन शहद का भोग लगता है। इसी कथा के कारण अविवाहित लड़कियाँ अच्छे वर की कामना से इस दिन माँ कात्यायनी की पूजा करती हैं, और जिनके विवाह में अड़चन हो, वे भी यह मंत्र जपते हैं। वृंदावन में कात्यायनी शक्तिपीठ है, जहाँ नवरात्रि में भारी भीड़ रहती है — शक्तिपीठों की सूची 51 शक्तिपीठ में देखें।

बिहार और बंगाल में षष्ठी

बिहार, झारखंड और बंगाल में दुर्गा पूजा का असली उत्सव षष्ठी से शुरू होता है। शाम को बेल के पेड़ के नीचे देवी का बोधन और आमंत्रण (बेल नेवता) होता है, और पंडालों के पट खुलने लगते हैं। उत्तर प्रदेश में इन दिनों रामलीला अपने चरम की ओर बढ़ती है। आरती के लिए जय अम्बे गौरी देखें। पिछला दिन स्कंदमाता पूजा और अगला कालरात्रि पूजा है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नवरात्रि के छठे दिन किसकी पूजा होती है?
आश्विन शुक्ल षष्ठी को माँ कात्यायनी की, जिन्होंने महिषासुर का वध किया।
माँ कात्यायनी को क्या भोग लगाएं?
छठे दिन शहद का भोग लगाया जाता है। साथ में लाल फूल और पीले वस्त्र भी चढ़ाते हैं।
अविवाहित लड़कियाँ कात्यायनी की पूजा क्यों करती हैं?
भागवत पुराण के अनुसार ब्रज की गोपियों ने कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए कात्यायनी व्रत किया था। इसलिए अच्छे वर की कामना से यह पूजा की जाती है।
माँ कात्यायनी का नाम कैसे पड़ा?
महर्षि कात्यायन के तप से प्रसन्न होकर देवी ने उनके आश्रम में पूजा स्वीकार की, इसलिए वे कात्यायनी कहलाईं।
बिहार में षष्ठी का क्या महत्व है?
बिहार और बंगाल में षष्ठी की शाम बेल के पेड़ के नीचे देवी का बोधन और आमंत्रण होता है, और यहीं से दुर्गा पूजा पंडालों का उत्सव शुरू होता है।

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