51 शक्तिपीठ वे तीर्थ हैं जहाँ, पुराणों की कथा के अनुसार, देवी सती के शरीर के अंग, आभूषण या वस्त्र गिरे थे। हर पीठ पर देवी एक अलग नाम से पूजी जाती हैं और उनकी रक्षा के लिए शिव भैरव रूप में साथ रहते हैं। इनमें से कई पीठ आज भारत में हैं और कुछ पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, तिब्बत और श्रीलंका में।
एक बात पहले साफ़ कर दें: शक्तिपीठों की गिनती हर ग्रंथ में एक जैसी नहीं है। कहीं 4 आदि पीठों की बात है, कहीं 51, कहीं 52 और देवी भागवत की परंपरा में 108 स्थान तक गिनाए गए हैं। नीचे दी गई सूची वह है जो उत्तर भारत में सबसे ज़्यादा प्रचलित है और मुख्य रूप से तंत्र चूड़ामणि के "पीठ निर्णय" पर आधारित है। जहाँ किसी स्थान को लेकर मतभेद है, वहाँ हमने उसे साफ़ लिखा है।
सती और दक्ष यज्ञ की कथा
प्रजापति दक्ष की बेटी सती ने अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध भगवान शिव से विवाह किया था। दक्ष को शिव का रहन-सहन, श्मशान की भस्म और गणों का साथ कभी नहीं भाया। एक बार दक्ष ने बहुत बड़ा यज्ञ किया और सब देवताओं को बुलाया, पर बेटी-दामाद को न्योता नहीं भेजा।
सती ने सोचा कि पिता के घर जाने के लिए बुलावे की क्या ज़रूरत। शिव ने समझाया, फिर भी वे चली गईं। वहाँ न उन्हें मान मिला, न शिव का यज्ञ-भाग रखा गया था। सबके सामने पति का अपमान सुनकर सती ने योग-अग्नि में अपना शरीर त्याग दिया।
यह समाचार सुनकर शिव के क्रोध से वीरभद्र प्रकट हुए और यज्ञ नष्ट हो गया। फिर शोक में डूबे शिव सती का शरीर कंधे पर उठाकर पूरे ब्रह्मांड में घूमने लगे। सृष्टि का काम रुकने लगा तो भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए। जहाँ-जहाँ अंग गिरे, वहाँ शक्तिपीठ बने। यह कथा देवी भागवत, कालिका पुराण और शिव पुराण में थोड़े-थोड़े अंतर के साथ मिलती है।
शक्तिपीठ और भैरव
हर शक्तिपीठ में दो नाम साथ लिए जाते हैं: देवी का नाम (शक्ति) और वहाँ के भैरव का नाम। मान्यता है कि शिव ने हर पीठ की रक्षा के लिए अपना एक भैरव रूप वहीं स्थापित किया। इसीलिए कई जगह यात्री कहते हैं कि देवी दर्शन के बाद भैरव दर्शन किए बिना यात्रा पूरी नहीं मानी जाती।
- काशी में विशालाक्षी देवी के भैरव स्वयं कालभैरव हैं, जिन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है।
- कामाख्या में भैरव उमानंद हैं, जिनका मंदिर ब्रह्मपुत्र के बीच एक टापू पर है।
- देवघर में देवी जयदुर्गा हैं और भैरव स्वयं बाबा वैद्यनाथ, इसलिए यह स्थान ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ दोनों है।
उत्तर भारत के प्रमुख शक्तिपीठ
हिंदी भाषी परिवारों के लिए सबसे पास और सबसे ज़्यादा जाए जाने वाले पीठ ये हैं:
- ज्वालामुखी (कांगड़ा, हिमाचल): यहाँ कोई मूर्ति नहीं, चट्टानों से निकलती ज्योतियों की पूजा होती है। नवरात्रि में पंजाब-हरियाणा से भारी भीड़ आती है।
- विशालाक्षी (वाराणसी): काशी विश्वनाथ के दर्शन के साथ ज़्यादातर लोग यहाँ भी जाते हैं।
- ललिता देवी / अलोपी देवी (प्रयागराज): दोनों मंदिर अपने को शक्तिपीठ मानते हैं। अलोपी देवी में मूर्ति की जगह एक पालना (झूला) पूजा जाता है।
- कात्यायनी / उमा (वृंदावन): वृंदावन की यह पीठ केश गिरने का स्थान मानी जाती है।
- भद्रकाली (कुरुक्षेत्र): मान्यता है कि महाभारत युद्ध से पहले पांडवों ने यहाँ पूजा की थी।
- मणिबंध (पुष्कर) और विराट (बैराठ, जयपुर) राजस्थान के दो पीठ हैं।
- जालंधर (देवी तालाब), वैद्यनाथ (देवघर) और उज्जैन भी उत्तर और मध्य भारत से आसानी से पहुँचे जाते हैं।
इसके अलावा नैना देवी, चिंतपूर्णी, मनसा देवी, देवी पाटन (बलरामपुर), हरसिद्धि (उज्जैन) और मैहर की शारदा माँ जैसे कई मंदिरों को स्थानीय परंपरा में शक्तिपीठ कहा जाता है, भले ही वे ऊपर बताई तंत्र चूड़ामणि की सूची में अलग नाम से हों या न हों। वैष्णो देवी यात्रा इस सूची का हिस्सा नहीं है, पर उत्तर भारत में श्रद्धा के हिसाब से यह सबसे बड़ा देवी धाम है।
पूरी सूची (तालिका)
यह तालिका तंत्र चूड़ामणि पर आधारित प्रचलित 51 पीठों की है। "स्थान" में आज का पता दिया है; जहाँ एक से ज़्यादा जगह दावा करती हैं, वहाँ कोष्ठक में लिखा है।
| क्रम | पीठ | आज का स्थान | गिरा अंग / आभूषण | देवी | भैरव |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | हिंगलाज | बलूचिस्तान, पाकिस्तान | ब्रह्मरंध्र (सिर का ऊपरी भाग) | कोट्टरी | भीमलोचन |
| 2 | शर्कररे (करवीपुर) | कराची के पास, पाकिस्तान (स्थान पर मतभेद) | नेत्र | महिषमर्दिनी | क्रोधीश |
| 3 | सुगंधा | शिकारपुर, बरिसाल, बांग्लादेश | नासिका | सुनंदा | त्र्यंबक |
| 4 | कश्मीर | अमरनाथ गुफा क्षेत्र, जम्मू-कश्मीर | कंठ | महामाया | त्रिसंध्येश्वर |
| 5 | ज्वालामुखी | कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश | जीभ | सिद्धिदा (अंबिका) | उन्मत्त |
| 6 | जालंधर | देवी तालाब मंदिर, जालंधर, पंजाब | बायाँ स्तन | त्रिपुरमालिनी | भीषण |
| 7 | वैद्यनाथ | देवघर, झारखंड | हृदय | जयदुर्गा | वैद्यनाथ |
| 8 | नेपाल | गुह्येश्वरी, काठमांडू | दोनों घुटने | महामाया | कपाली |
| 9 | मानस | मानसरोवर, तिब्बत | दायाँ हाथ | दाक्षायणी | अमर |
| 10 | उत्कल (विरजा) | जाजपुर, ओडिशा | नाभि | विमला | जगन्नाथ |
| 11 | गंडकी | मुक्तिनाथ, नेपाल | गंडस्थल (कनपटी) | गंडकी चंडी | चक्रपाणि |
| 12 | बहुला | केतुग्राम, बर्धमान, पश्चिम बंगाल | बायाँ हाथ | बहुला | भीरुक |
| 13 | उज्जयिनी | गुस्करा के पास, बर्धमान, पश्चिम बंगाल (कुछ लोग उज्जैन की हरसिद्धि मानते हैं) | दाहिनी कलाई | मंगलचंडिका | कपिलांबर |
| 14 | त्रिपुरा | उदयपुर (माताबाड़ी), त्रिपुरा | दायाँ पैर | त्रिपुरसुंदरी | त्रिपुरेश |
| 15 | चट्टल | चंद्रनाथ पहाड़ी, चटगाँव, बांग्लादेश | दाहिनी भुजा | भवानी | चंद्रशेखर |
| 16 | त्रिस्रोता | शालबाड़ी, जलपाईगुड़ी, पश्चिम बंगाल | बायाँ पैर | भ्रामरी | अंबर |
| 17 | कामगिरि | कामाख्या, नीलाचल पर्वत, गुवाहाटी, असम | योनि | कामाख्या | उमानंद |
| 18 | प्रयाग | प्रयागराज, उत्तर प्रदेश (ललिता देवी और अलोपी देवी, दोनों पर मान्यता) | हाथ की अँगुलियाँ | ललिता | भव |
| 19 | युगाद्या | क्षीरग्राम, बर्धमान, पश्चिम बंगाल | दाहिने पैर का अँगूठा | भूतधात्री | क्षीरकंटक |
| 20 | जयंती | जैंतिया, सिलहट, बांग्लादेश | बायीं जंघा | जयंती | क्रमदीश्वर |
| 21 | कालीपीठ | कालीघाट, कोलकाता | दाहिने पैर की अँगुलियाँ | कालिका | नकुलीश |
| 22 | किरीट | किरीटकोणा, मुर्शिदाबाद, पश्चिम बंगाल | मुकुट | विमला | संवर्त |
| 23 | वाराणसी | मणिकर्णिका घाट के पास विशालाक्षी मंदिर, काशी | कान का कुंडल | विशालाक्षी | कालभैरव |
| 24 | कन्याश्रम | कन्याकुमारी, तमिलनाडु (स्थान पर मतभेद) | पीठ | सर्वाणी | निमिष |
| 25 | कुरुक्षेत्र | भद्रकाली मंदिर, कुरुक्षेत्र, हरियाणा | एड़ी | सावित्री | स्थाणु |
| 26 | मणिबंध | पुष्कर के पास, अजमेर, राजस्थान | दोनों कलाइयाँ | गायत्री | सर्वानंद |
| 27 | श्रीशैल | सिलहट के पास, बांग्लादेश (कुछ लोग श्रीशैलम, आंध्र मानते हैं) | गला | महालक्ष्मी | शंबरानंद |
| 28 | कांची | बोलपुर के पास, बीरभूम, पश्चिम बंगाल (कुछ कांचीपुरम मानते हैं) | अस्थि | देवगर्भा | रुरु |
| 29 | कालमाधव | अमरकंटक क्षेत्र, मध्य प्रदेश (स्थान अनिश्चित) | बायाँ नितंब | काली | असितांग |
| 30 | शोण | अमरकंटक, मध्य प्रदेश (कुछ लोग बिहार में सोन तट मानते हैं) | दायाँ नितंब | नर्मदा | भद्रसेन |
| 31 | रामगिरि | चित्रकूट (कुछ लोग मैहर मानते हैं) | दायाँ स्तन | शिवानी | चंड |
| 32 | वृंदावन | भूतेश्वर महादेव क्षेत्र, वृंदावन, उत्तर प्रदेश | केश | उमा | भूतेश |
| 33 | शुचि | शुचीन्द्रम, कन्याकुमारी, तमिलनाडु | ऊपर के दाँत | नारायणी | संहार |
| 34 | पंचसागर | वाराणसी के आसपास माना जाता है (स्थान अनिश्चित) | नीचे के दाँत | वाराही | महारुद्र |
| 35 | करतोयातट | भवानीपुर, बोगरा, बांग्लादेश | बायाँ तलवा | अपर्णा | वामन |
| 36 | श्रीपर्वत | लद्दाख माना जाता है; कुछ श्रीशैलम कहते हैं (विवादित) | दाहिना तलवा | श्रीसुंदरी | सुंदरानंद |
| 37 | विभाष | तमलुक, पूर्व मेदिनीपुर, पश्चिम बंगाल | बायाँ टखना | कपालिनी | शर्वानंद |
| 38 | प्रभास | सोमनाथ के पास, गुजरात | उदर | चंद्रभागा | वक्रतुंड |
| 39 | भैरव पर्वत | उज्जैन, मध्य प्रदेश (कुछ गिरनार मानते हैं) | ऊपर का होंठ | अवंती | लंबकर्ण |
| 40 | जनस्थान | पंचवटी, नासिक, महाराष्ट्र | ठुड्डी | भ्रामरी | विकृताक्ष |
| 41 | सर्वशैल (गोदावरी तीर) | राजमहेंद्रवरम के पास, आंध्र प्रदेश | बायाँ गाल | राकिणी | वत्सनाभ |
| 42 | विराट | बैराठ, जयपुर, राजस्थान | बाएँ पैर की अँगुलियाँ | अंबिका | अमृत |
| 43 | रत्नावली | हुगली क्षेत्र, पश्चिम बंगाल (स्थान अनिश्चित) | दायाँ कंधा | कुमारी | शिव |
| 44 | मिथिला | जनकपुर, नेपाल (सीमा के दोनों ओर दावे) | बायाँ कंधा | उमा | महोदर |
| 45 | नलहाटी | बीरभूम, पश्चिम बंगाल | पैर की नली (हड्डी) | कालिका | योगीश |
| 46 | कर्णाट | कर्नाटक क्षेत्र (स्थान अज्ञात) | दोनों कान | जयदुर्गा | अभीरु |
| 47 | वक्रेश्वर | बीरभूम, पश्चिम बंगाल | भौंहों के बीच का भाग | महिषमर्दिनी | वक्रनाथ |
| 48 | यशोर | ईश्वरीपुर, सतखीरा, बांग्लादेश | हथेली | यशोरेश्वरी | चंड |
| 49 | अट्टहास | लाभपुर, बीरभूम, पश्चिम बंगाल | होंठ | फुल्लरा | विश्वेश |
| 50 | नंदीपुर | सैंथिया, बीरभूम, पश्चिम बंगाल | गले का हार | नंदिनी | नंदिकेश्वर |
| 51 | लंका | श्रीलंका (त्रिंकोमाली का दावा; स्थान अनिश्चित) | पायल (नूपुर) | इंद्राक्षी | राक्षसेश्वर |
भारत के बाहर के शक्तिपीठ
इस सूची के कई पीठ आज दूसरे देशों में हैं। पाकिस्तान में हिंगलाज माता का मंदिर बलूचिस्तान की पहाड़ियों में है, जहाँ वहाँ का हिंदू समाज आज भी हर साल यात्रा करता है। बांग्लादेश में सुगंधा, चट्टल (चंद्रनाथ), जयंती, श्रीशैल, करतोयातट और यशोरेश्वरी जैसे कई पीठ हैं। नेपाल में गुह्येश्वरी (पशुपतिनाथ के पास), गंडकी (मुक्तिनाथ) और मिथिला, तिब्बत में मानसरोवर और श्रीलंका में लंका पीठ माना जाता है। इन यात्राओं के लिए वीज़ा, अनुमति और सुरक्षा नियम समय-समय पर बदलते हैं, इसलिए जाने से पहले संबंधित दूतावास और आयोजक संस्था से ताज़ा जानकारी लें।
नवरात्रि में दर्शन
चैत्र और शारदीय दोनों नवरात्रि में शक्तिपीठों पर सबसे ज़्यादा भीड़ होती है। अगर आप उसी समय जाना चाहते हैं तो कुछ बातें काम की हैं:
- पहले और आठवें दिन सबसे ज़्यादा भीड़ रहती है, बीच के दिन थोड़े आसान होते हैं।
- दर्शन का समय, लाइन व्यवस्था और विशेष पूजा के नियम हर मंदिर ट्रस्ट हर साल तय करता है। यात्रा से पहले मंदिर की आधिकारिक जानकारी ज़रूर देख लें।
- घर से निकलने से पहले कलश स्थापना हो चुकी हो तो किसी परिवार-जन को रोज़ की ज्योत और पूजा की ज़िम्मेदारी सौंप दें।
- हर दिन देवी के जिस रूप की पूजा होती है, उसकी जानकारी नवदुर्गा के नौ रूप में देखें, ताकि उस दिन का भोग साथ ले जा सकें।
पीठ पर पहुँचकर लंबी पूजा न भी हो सके तो देवी के नाम का स्मरण और जय अम्बे गौरी आरती काफ़ी है। घर लौटकर दुर्गा चालीसा का पाठ करके यात्रा का संकल्प पूरा करने की परंपरा भी कई परिवारों में है।

