51 शक्तिपीठ: नाम, स्थान और कथा

51 शक्तिपीठ वे स्थान हैं जहाँ सती के अंग या आभूषण गिरे थे; हर पीठ पर देवी और भैरव अलग नाम से पूजे जाते हैं। यहाँ तंत्र चूड़ामणि पर आधारित प्रचलित सूची है, विवादित स्थानों के उल्लेख के साथ।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 8 मिनट का पाठ
कोई रेटिंग नहीं
0 व्यूज़

51 शक्तिपीठ वे तीर्थ हैं जहाँ, पुराणों की कथा के अनुसार, देवी सती के शरीर के अंग, आभूषण या वस्त्र गिरे थे। हर पीठ पर देवी एक अलग नाम से पूजी जाती हैं और उनकी रक्षा के लिए शिव भैरव रूप में साथ रहते हैं। इनमें से कई पीठ आज भारत में हैं और कुछ पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, तिब्बत और श्रीलंका में।

एक बात पहले साफ़ कर दें: शक्तिपीठों की गिनती हर ग्रंथ में एक जैसी नहीं है। कहीं 4 आदि पीठों की बात है, कहीं 51, कहीं 52 और देवी भागवत की परंपरा में 108 स्थान तक गिनाए गए हैं। नीचे दी गई सूची वह है जो उत्तर भारत में सबसे ज़्यादा प्रचलित है और मुख्य रूप से तंत्र चूड़ामणि के "पीठ निर्णय" पर आधारित है। जहाँ किसी स्थान को लेकर मतभेद है, वहाँ हमने उसे साफ़ लिखा है।

सती और दक्ष यज्ञ की कथा

प्रजापति दक्ष की बेटी सती ने अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध भगवान शिव से विवाह किया था। दक्ष को शिव का रहन-सहन, श्मशान की भस्म और गणों का साथ कभी नहीं भाया। एक बार दक्ष ने बहुत बड़ा यज्ञ किया और सब देवताओं को बुलाया, पर बेटी-दामाद को न्योता नहीं भेजा।

सती ने सोचा कि पिता के घर जाने के लिए बुलावे की क्या ज़रूरत। शिव ने समझाया, फिर भी वे चली गईं। वहाँ न उन्हें मान मिला, न शिव का यज्ञ-भाग रखा गया था। सबके सामने पति का अपमान सुनकर सती ने योग-अग्नि में अपना शरीर त्याग दिया।

यह समाचार सुनकर शिव के क्रोध से वीरभद्र प्रकट हुए और यज्ञ नष्ट हो गया। फिर शोक में डूबे शिव सती का शरीर कंधे पर उठाकर पूरे ब्रह्मांड में घूमने लगे। सृष्टि का काम रुकने लगा तो भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए। जहाँ-जहाँ अंग गिरे, वहाँ शक्तिपीठ बने। यह कथा देवी भागवत, कालिका पुराण और शिव पुराण में थोड़े-थोड़े अंतर के साथ मिलती है।

शक्तिपीठ और भैरव

हर शक्तिपीठ में दो नाम साथ लिए जाते हैं: देवी का नाम (शक्ति) और वहाँ के भैरव का नाम। मान्यता है कि शिव ने हर पीठ की रक्षा के लिए अपना एक भैरव रूप वहीं स्थापित किया। इसीलिए कई जगह यात्री कहते हैं कि देवी दर्शन के बाद भैरव दर्शन किए बिना यात्रा पूरी नहीं मानी जाती।

  • काशी में विशालाक्षी देवी के भैरव स्वयं कालभैरव हैं, जिन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है।
  • कामाख्या में भैरव उमानंद हैं, जिनका मंदिर ब्रह्मपुत्र के बीच एक टापू पर है।
  • देवघर में देवी जयदुर्गा हैं और भैरव स्वयं बाबा वैद्यनाथ, इसलिए यह स्थान ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ दोनों है।

उत्तर भारत के प्रमुख शक्तिपीठ

हिंदी भाषी परिवारों के लिए सबसे पास और सबसे ज़्यादा जाए जाने वाले पीठ ये हैं:

  • ज्वालामुखी (कांगड़ा, हिमाचल): यहाँ कोई मूर्ति नहीं, चट्टानों से निकलती ज्योतियों की पूजा होती है। नवरात्रि में पंजाब-हरियाणा से भारी भीड़ आती है।
  • विशालाक्षी (वाराणसी): काशी विश्वनाथ के दर्शन के साथ ज़्यादातर लोग यहाँ भी जाते हैं।
  • ललिता देवी / अलोपी देवी (प्रयागराज): दोनों मंदिर अपने को शक्तिपीठ मानते हैं। अलोपी देवी में मूर्ति की जगह एक पालना (झूला) पूजा जाता है।
  • कात्यायनी / उमा (वृंदावन): वृंदावन की यह पीठ केश गिरने का स्थान मानी जाती है।
  • भद्रकाली (कुरुक्षेत्र): मान्यता है कि महाभारत युद्ध से पहले पांडवों ने यहाँ पूजा की थी।
  • मणिबंध (पुष्कर) और विराट (बैराठ, जयपुर) राजस्थान के दो पीठ हैं।
  • जालंधर (देवी तालाब), वैद्यनाथ (देवघर) और उज्जैन भी उत्तर और मध्य भारत से आसानी से पहुँचे जाते हैं।

इसके अलावा नैना देवी, चिंतपूर्णी, मनसा देवी, देवी पाटन (बलरामपुर), हरसिद्धि (उज्जैन) और मैहर की शारदा माँ जैसे कई मंदिरों को स्थानीय परंपरा में शक्तिपीठ कहा जाता है, भले ही वे ऊपर बताई तंत्र चूड़ामणि की सूची में अलग नाम से हों या न हों। वैष्णो देवी यात्रा इस सूची का हिस्सा नहीं है, पर उत्तर भारत में श्रद्धा के हिसाब से यह सबसे बड़ा देवी धाम है।

पूरी सूची (तालिका)

यह तालिका तंत्र चूड़ामणि पर आधारित प्रचलित 51 पीठों की है। "स्थान" में आज का पता दिया है; जहाँ एक से ज़्यादा जगह दावा करती हैं, वहाँ कोष्ठक में लिखा है।

क्रमपीठआज का स्थानगिरा अंग / आभूषणदेवीभैरव
1हिंगलाजबलूचिस्तान, पाकिस्तानब्रह्मरंध्र (सिर का ऊपरी भाग)कोट्टरीभीमलोचन
2शर्कररे (करवीपुर)कराची के पास, पाकिस्तान (स्थान पर मतभेद)नेत्रमहिषमर्दिनीक्रोधीश
3सुगंधाशिकारपुर, बरिसाल, बांग्लादेशनासिकासुनंदात्र्यंबक
4कश्मीरअमरनाथ गुफा क्षेत्र, जम्मू-कश्मीरकंठमहामायात्रिसंध्येश्वर
5ज्वालामुखीकांगड़ा, हिमाचल प्रदेशजीभसिद्धिदा (अंबिका)उन्मत्त
6जालंधरदेवी तालाब मंदिर, जालंधर, पंजाबबायाँ स्तनत्रिपुरमालिनीभीषण
7वैद्यनाथदेवघर, झारखंडहृदयजयदुर्गावैद्यनाथ
8नेपालगुह्येश्वरी, काठमांडूदोनों घुटनेमहामायाकपाली
9मानसमानसरोवर, तिब्बतदायाँ हाथदाक्षायणीअमर
10उत्कल (विरजा)जाजपुर, ओडिशानाभिविमलाजगन्नाथ
11गंडकीमुक्तिनाथ, नेपालगंडस्थल (कनपटी)गंडकी चंडीचक्रपाणि
12बहुलाकेतुग्राम, बर्धमान, पश्चिम बंगालबायाँ हाथबहुलाभीरुक
13उज्जयिनीगुस्करा के पास, बर्धमान, पश्चिम बंगाल (कुछ लोग उज्जैन की हरसिद्धि मानते हैं)दाहिनी कलाईमंगलचंडिकाकपिलांबर
14त्रिपुराउदयपुर (माताबाड़ी), त्रिपुरादायाँ पैरत्रिपुरसुंदरीत्रिपुरेश
15चट्टलचंद्रनाथ पहाड़ी, चटगाँव, बांग्लादेशदाहिनी भुजाभवानीचंद्रशेखर
16त्रिस्रोताशालबाड़ी, जलपाईगुड़ी, पश्चिम बंगालबायाँ पैरभ्रामरीअंबर
17कामगिरिकामाख्या, नीलाचल पर्वत, गुवाहाटी, असमयोनिकामाख्याउमानंद
18प्रयागप्रयागराज, उत्तर प्रदेश (ललिता देवी और अलोपी देवी, दोनों पर मान्यता)हाथ की अँगुलियाँललिताभव
19युगाद्याक्षीरग्राम, बर्धमान, पश्चिम बंगालदाहिने पैर का अँगूठाभूतधात्रीक्षीरकंटक
20जयंतीजैंतिया, सिलहट, बांग्लादेशबायीं जंघाजयंतीक्रमदीश्वर
21कालीपीठकालीघाट, कोलकातादाहिने पैर की अँगुलियाँकालिकानकुलीश
22किरीटकिरीटकोणा, मुर्शिदाबाद, पश्चिम बंगालमुकुटविमलासंवर्त
23वाराणसीमणिकर्णिका घाट के पास विशालाक्षी मंदिर, काशीकान का कुंडलविशालाक्षीकालभैरव
24कन्याश्रमकन्याकुमारी, तमिलनाडु (स्थान पर मतभेद)पीठसर्वाणीनिमिष
25कुरुक्षेत्रभद्रकाली मंदिर, कुरुक्षेत्र, हरियाणाएड़ीसावित्रीस्थाणु
26मणिबंधपुष्कर के पास, अजमेर, राजस्थानदोनों कलाइयाँगायत्रीसर्वानंद
27श्रीशैलसिलहट के पास, बांग्लादेश (कुछ लोग श्रीशैलम, आंध्र मानते हैं)गलामहालक्ष्मीशंबरानंद
28कांचीबोलपुर के पास, बीरभूम, पश्चिम बंगाल (कुछ कांचीपुरम मानते हैं)अस्थिदेवगर्भारुरु
29कालमाधवअमरकंटक क्षेत्र, मध्य प्रदेश (स्थान अनिश्चित)बायाँ नितंबकालीअसितांग
30शोणअमरकंटक, मध्य प्रदेश (कुछ लोग बिहार में सोन तट मानते हैं)दायाँ नितंबनर्मदाभद्रसेन
31रामगिरिचित्रकूट (कुछ लोग मैहर मानते हैं)दायाँ स्तनशिवानीचंड
32वृंदावनभूतेश्वर महादेव क्षेत्र, वृंदावन, उत्तर प्रदेशकेशउमाभूतेश
33शुचिशुचीन्द्रम, कन्याकुमारी, तमिलनाडुऊपर के दाँतनारायणीसंहार
34पंचसागरवाराणसी के आसपास माना जाता है (स्थान अनिश्चित)नीचे के दाँतवाराहीमहारुद्र
35करतोयातटभवानीपुर, बोगरा, बांग्लादेशबायाँ तलवाअपर्णावामन
36श्रीपर्वतलद्दाख माना जाता है; कुछ श्रीशैलम कहते हैं (विवादित)दाहिना तलवाश्रीसुंदरीसुंदरानंद
37विभाषतमलुक, पूर्व मेदिनीपुर, पश्चिम बंगालबायाँ टखनाकपालिनीशर्वानंद
38प्रभाससोमनाथ के पास, गुजरातउदरचंद्रभागावक्रतुंड
39भैरव पर्वतउज्जैन, मध्य प्रदेश (कुछ गिरनार मानते हैं)ऊपर का होंठअवंतीलंबकर्ण
40जनस्थानपंचवटी, नासिक, महाराष्ट्रठुड्डीभ्रामरीविकृताक्ष
41सर्वशैल (गोदावरी तीर)राजमहेंद्रवरम के पास, आंध्र प्रदेशबायाँ गालराकिणीवत्सनाभ
42विराटबैराठ, जयपुर, राजस्थानबाएँ पैर की अँगुलियाँअंबिकाअमृत
43रत्नावलीहुगली क्षेत्र, पश्चिम बंगाल (स्थान अनिश्चित)दायाँ कंधाकुमारीशिव
44मिथिलाजनकपुर, नेपाल (सीमा के दोनों ओर दावे)बायाँ कंधाउमामहोदर
45नलहाटीबीरभूम, पश्चिम बंगालपैर की नली (हड्डी)कालिकायोगीश
46कर्णाटकर्नाटक क्षेत्र (स्थान अज्ञात)दोनों कानजयदुर्गाअभीरु
47वक्रेश्वरबीरभूम, पश्चिम बंगालभौंहों के बीच का भागमहिषमर्दिनीवक्रनाथ
48यशोरईश्वरीपुर, सतखीरा, बांग्लादेशहथेलीयशोरेश्वरीचंड
49अट्टहासलाभपुर, बीरभूम, पश्चिम बंगालहोंठफुल्लराविश्वेश
50नंदीपुरसैंथिया, बीरभूम, पश्चिम बंगालगले का हारनंदिनीनंदिकेश्वर
51लंकाश्रीलंका (त्रिंकोमाली का दावा; स्थान अनिश्चित)पायल (नूपुर)इंद्राक्षीराक्षसेश्वर

भारत के बाहर के शक्तिपीठ

इस सूची के कई पीठ आज दूसरे देशों में हैं। पाकिस्तान में हिंगलाज माता का मंदिर बलूचिस्तान की पहाड़ियों में है, जहाँ वहाँ का हिंदू समाज आज भी हर साल यात्रा करता है। बांग्लादेश में सुगंधा, चट्टल (चंद्रनाथ), जयंती, श्रीशैल, करतोयातट और यशोरेश्वरी जैसे कई पीठ हैं। नेपाल में गुह्येश्वरी (पशुपतिनाथ के पास), गंडकी (मुक्तिनाथ) और मिथिला, तिब्बत में मानसरोवर और श्रीलंका में लंका पीठ माना जाता है। इन यात्राओं के लिए वीज़ा, अनुमति और सुरक्षा नियम समय-समय पर बदलते हैं, इसलिए जाने से पहले संबंधित दूतावास और आयोजक संस्था से ताज़ा जानकारी लें।

नवरात्रि में दर्शन

चैत्र और शारदीय दोनों नवरात्रि में शक्तिपीठों पर सबसे ज़्यादा भीड़ होती है। अगर आप उसी समय जाना चाहते हैं तो कुछ बातें काम की हैं:

  1. पहले और आठवें दिन सबसे ज़्यादा भीड़ रहती है, बीच के दिन थोड़े आसान होते हैं।
  2. दर्शन का समय, लाइन व्यवस्था और विशेष पूजा के नियम हर मंदिर ट्रस्ट हर साल तय करता है। यात्रा से पहले मंदिर की आधिकारिक जानकारी ज़रूर देख लें।
  3. घर से निकलने से पहले कलश स्थापना हो चुकी हो तो किसी परिवार-जन को रोज़ की ज्योत और पूजा की ज़िम्मेदारी सौंप दें।
  4. हर दिन देवी के जिस रूप की पूजा होती है, उसकी जानकारी नवदुर्गा के नौ रूप में देखें, ताकि उस दिन का भोग साथ ले जा सकें।

पीठ पर पहुँचकर लंबी पूजा न भी हो सके तो देवी के नाम का स्मरण और जय अम्बे गौरी आरती काफ़ी है। घर लौटकर दुर्गा चालीसा का पाठ करके यात्रा का संकल्प पूरा करने की परंपरा भी कई परिवारों में है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शक्तिपीठ कितने हैं, 51 या 52?

ग्रंथों में संख्या अलग है। तंत्र चूड़ामणि की प्रचलित सूची 51 पीठ गिनाती है, कुछ परंपराएँ 52 मानती हैं और देवी भागवत की परंपरा में 108 पवित्र स्थान बताए गए हैं।

सबसे प्रमुख शक्तिपीठ कौन सा माना जाता है?

असम का कामाख्या पीठ सबसे प्रमुख माना जाता है, जहाँ देवी की योनि गिरी थी। उत्तर भारत में ज्वालामुखी, विशालाक्षी (काशी) और देवघर भी बहुत मान्य हैं।

क्या वैष्णो देवी शक्तिपीठ है?

तंत्र चूड़ामणि की 51 पीठों की सूची में वैष्णो देवी का नाम नहीं है, पर कुछ लोक परंपराएँ इसे शक्तिपीठ मानती हैं। श्रद्धा के हिसाब से यह उत्तर भारत का सबसे बड़ा देवी धाम है।

शक्तिपीठ के साथ भैरव का दर्शन क्यों ज़रूरी माना जाता है?

मान्यता है कि शिव ने हर पीठ की रक्षा के लिए वहाँ एक भैरव रूप स्थापित किया। इसलिए देवी दर्शन के बाद भैरव दर्शन से यात्रा पूरी मानी जाती है।

भारत के बाहर कौन से शक्तिपीठ हैं?

पाकिस्तान में हिंगलाज, बांग्लादेश में सुगंधा, चट्टल, जयंती, यशोरेश्वरी जैसे कई पीठ, नेपाल में गुह्येश्वरी और मुक्तिनाथ, तिब्बत में मानसरोवर और श्रीलंका में लंका पीठ माने जाते हैं।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

लेखक पेज →

टिप्पणियाँ

टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...