2026

कालरात्रि पूजा 2026

शनिवार, अक्टूबर 17, 2026

मुख्य विवरण

दिल्ली के लिए

कालरात्रि पूजा

माँ कालरात्रि कौन हैं

नवरात्रि के सातवें दिन, आश्विन शुक्ल सप्तमी को, माँ कालरात्रि की पूजा होती है। यह नवदुर्गा का सबसे उग्र रूप है — रंग घने अँधेरे जैसा काला, बाल बिखरे हुए, तीन गोल नेत्र और साँस से निकलती आग की लपटें। वाहन गधा है। दाहिने दो हाथ अभय और वरद मुद्रा में हैं, बाएँ हाथों में लोहे का काँटा और खड्ग।

रूप भयानक है, पर भक्तों के लिए माँ सदा शुभ फल देती हैं, इसलिए इन्हें "शुभंकरी" भी कहते हैं। मान्यता है कि रक्तबीज जैसे असुरों का नाश इसी शक्ति ने किया, और इनके स्मरण से भय, बुरे सपने और ग्रह-बाधा का डर दूर होता है।

ध्यान मंत्र

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥

पूजा और भोग

सातवें दिन गुड़ का भोग लगता है, या गुड़ से बनी कोई चीज़। कई घरों में रात को विशेष पूजा होती है, जिसमें सरसों के तेल का दीपक जलाया जाता है और दुर्गा चालीसा या सप्तशती का सातवाँ अध्याय पढ़ा जाता है। तंत्र परंपरा के साधक इस रात को सिद्धि की रात मानते हैं।

बिहार, बंगाल और उत्तर भारत में सप्तमी

बिहार और बंगाल में महासप्तमी की सुबह नवपत्रिका (केले के पौधे सहित नौ पौधों) का स्नान होता है और पंडालों में प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा होती है — बिहार में इसे माँ का "पट खुलना" कहते हैं, और इसी दिन से पंडालों में सबसे ज़्यादा भीड़ उमड़ती है। उत्तर प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा में सप्तमी की रात जगह-जगह माता का जागरण होता है। अगले दिन महागौरी पूजा और कन्या पूजन की तैयारी भी आज ही शुरू हो जाती है। सभी रूपों के लिए नवदुर्गा के नौ रूप देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नवरात्रि के सातवें दिन किसकी पूजा होती है?
आश्विन शुक्ल सप्तमी को माँ कालरात्रि की, जो नवदुर्गा का सबसे उग्र रूप हैं।
माँ कालरात्रि को क्या भोग लगाएं?
गुड़ या गुड़ से बनी चीज़ों का भोग लगाया जाता है।
कालरात्रि को शुभंकरी क्यों कहते हैं?
उनका रूप भयानक है, पर वे भक्तों को हमेशा शुभ फल देती हैं और भय दूर करती हैं, इसलिए शुभंकरी कहलाती हैं।
माँ कालरात्रि का वाहन क्या है?
माँ का वाहन गधा है। उनके हाथों में लोहे का काँटा और खड्ग होते हैं।
बिहार में सप्तमी को क्या होता है?
महासप्तमी की सुबह नवपत्रिका स्नान और प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा होती है, जिसे पट खुलना कहते हैं। इसी दिन से पंडालों में दर्शन के लिए भीड़ उमड़ती है।

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