ब्रह्मचारिणी पूजा
माँ ब्रह्मचारिणी कौन हैं
नवरात्रि के दूसरे दिन, आश्विन शुक्ल द्वितीया को, माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है। यह पार्वती का वह रूप है जिसने शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया। "ब्रह्मचारिणी" का अर्थ है तप का आचरण करने वाली।
कथा है कि नारद जी की सलाह पर पार्वती ने वर्षों तक केवल फल-फूल खाकर, फिर सूखे बेलपत्र खाकर तप किया, और आख़िर में पत्ते भी छोड़ दिए। इसी से उनका एक नाम "अपर्णा" पड़ा। माँ सफ़ेद वस्त्र में, नंगे पाँव, दाहिने हाथ में जप की माला और बाएँ में कमंडल लिए दिखाई जाती हैं। इस दिन को स्वाधिष्ठान चक्र से जोड़ा जाता है।
ध्यान मंत्र
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
पूजा और भोग
माँ को शक्कर या मिश्री का भोग लगाने की परंपरा है; मान्यता है कि इससे घर के लोगों को लंबी आयु मिलती है। सफ़ेद फूल, खासकर चमेली या कमल, चढ़ाए जाते हैं। पूजा कलश के सामने ही होती है — रोली-अक्षत, धूप-दीप, फिर मंत्र-जाप, सप्तशती या दुर्गा चालीसा का पाठ।
इस दिन का भाव
ब्रह्मचारिणी धैर्य और संयम की देवी हैं, इसलिए विद्यार्थी और कोई कठिन संकल्प निभा रहे लोग उन्हें विशेष रूप से याद करते हैं। दूसरे दिन तक व्रत की थकान महसूस होने लगती है — यही दिन याद दिलाता है कि माँ ने बिना अन्न के तप किया था। हल्का फलाहार और पर्याप्त पानी लें; क्या खाना ठीक है, यह नवरात्रि व्रत में क्या खाएं में देखें। पहले दिन की पूजा के लिए शैलपुत्री पूजा और अगले दिन के लिए चंद्रघंटा पूजा देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नवरात्रि के दूसरे दिन किसकी पूजा होती है?
माँ ब्रह्मचारिणी को क्या भोग लगाएं?
माँ ब्रह्मचारिणी के हाथों में क्या है?
पार्वती को अपर्णा क्यों कहते हैं?
ब्रह्मचारिणी की पूजा किसके लिए विशेष मानी जाती है?
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