चैत्र नवरात्रि: शैलपुत्री पूजा
शैलपुत्री पूजा क्या है
चैत्र नवरात्रि के पहले दिन, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को, कलश स्थापना के बाद माँ शैलपुत्री की पूजा होती है। वे नवदुर्गा का पहला रूप हैं, और इसी दिन से हिंदू नववर्ष भी शुरू होता है, इसलिए घरों में आज पूजा के साथ नए साल का उत्साह भी रहता है।
कथा और स्वरूप
पिछले जन्म में माँ दक्ष प्रजापति की पुत्री सती थीं। पिता के यज्ञ में शिव का अपमान सहन न कर सकने पर उन्होंने योगाग्नि में देह त्याग दी। अगले जन्म में वे पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री बनकर आईं, इसलिए शैलपुत्री कहलाईं और फिर से शिव को पति रूप में पाया। माँ बैल (वृषभ) पर सवार हैं, दाएँ हाथ में त्रिशूल और बाएँ में कमल है, और माथे पर अर्धचंद्र।
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
नववर्ष के दिन की रीतें
नवसंवत्सर के दिन उत्तर भारत, खासकर राजस्थान और मध्य प्रदेश में, नीम की कोंपलें मिश्री या काली मिर्च के साथ खाने की परंपरा है, जो गर्मी के मौसम की शुरुआत का संकेत भी है। घर पर नया पंचांग आता है और पंडित जी से साल के राजा-मंत्री और संवत का फल सुना जाता है। संवत की पूरी बात विक्रम संवत क्या है में पढ़ें। इसी दिन से वैष्णो देवी यात्रा पर भीड़ बढ़ जाती है और कटरा से भवन तक नवरात्रि भर चहल-पहल रहती है।
आज क्या करें
- कलश स्थापना के बाद माँ शैलपुत्री का ध्यान करें और सफ़ेद या लाल फूल चढ़ाएँ।
- भोग में गाय का शुद्ध घी चढ़ाने की परंपरा है; इसी घी से अखंड ज्योति भी जलाई जा सकती है।
- व्रत रखने वाले आज से फलाहार शुरू करते हैं; क्या खाएँ यह नवरात्रि व्रत में क्या खाएं में है।
- शाम को जय अम्बे गौरी आरती से दिन पूरा करें।
नौ दिनों का यह क्रम नवमी को राम नवमी पर पूरा होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
चैत्र नवरात्रि में शैलपुत्री पूजा कब होती है?
माँ शैलपुत्री को क्या भोग लगाएं?
माँ शैलपुत्री कौन हैं?
नववर्ष पर नीम क्यों खाते हैं?
क्या पहले दिन वैष्णो देवी जाना ठीक है?
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