भीष्म द्वादशी
भीष्म द्वादशी माघ शुक्ल द्वादशी को आती है। यह पितामह भीष्म की स्मृति और भगवान विष्णु की पूजा का दिन है। भीष्म अष्टमी पर उनके देह त्याग के बाद इस द्वादशी को उनके नाम से तर्पण, तिल का दान और विष्णु पूजन करने की परंपरा है।
क्या है और क्यों मनाते हैं
महाभारत के युद्ध में बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म ने इच्छामृत्यु के वरदान के कारण सूर्य के उत्तरायण होने तक प्राण नहीं छोड़े। इसी बीच उन्होंने युधिष्ठिर को राजधर्म और मोक्षधर्म का उपदेश दिया, और विष्णु सहस्रनाम भी उन्हीं के मुख से प्रसिद्ध हुआ। माघ शुक्ल अष्टमी को उन्होंने देह छोड़ी। भीष्म आजीवन ब्रह्मचारी रहे, उनकी कोई संतान नहीं थी, इसलिए मान्यता है कि हर कोई उनके लिए तर्पण कर सकता है, और इससे पितरों को भी संतोष मिलता है।
किस तिथि को
माघ शुक्ल द्वादशी, यानी जया एकादशी के अगले दिन और माघ पूर्णिमा से तीन दिन पहले। जिस दिन सूर्योदय पर द्वादशी हो, वह दिन लिया जाता है। एकादशी का व्रत रखने वाले इसी दिन पारण भी करते हैं। ओडिशा और दक्षिण भारत में इससे एक दिन पहले की एकादशी को भीष्म एकादशी भी कहा जाता है।
कैसे मनाते हैं
- सुबह स्नान के बाद जल में काले तिल और कुश डालकर भीष्म पितामह और अपने पितरों के लिए तर्पण।
- भगवान विष्णु की पूजा, तुलसी, पीले फूल और तिल-गुड़ का भोग; विष्णु सहस्रनाम का पाठ।
- तिल, गुड़, कंबल, अन्न और घी का दान।
- माघ स्नान करने वाले इस दिन गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान करते हैं।
पूजा के बाद ॐ जय जगदीश हरे गाकर दिन पूरा करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भीष्म द्वादशी कब होती है?
भीष्म द्वादशी पर क्या करें?
भीष्म अष्टमी और भीष्म द्वादशी में क्या अंतर है?
भीष्म पितामह का तर्पण कोई भी कर सकता है?
क्या इस दिन एकादशी का पारण होता है?
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