भीष्म अष्टमी
भीष्म अष्टमी माघ शुक्ल अष्टमी को मनाई जाती है। महाभारत के अनुसार गंगापुत्र भीष्म ने बाणों की शय्या पर रहकर सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की और इसी तिथि को देह त्यागी। इस दिन उनके नाम से तर्पण किया जाता है।
क्या है और क्यों मनाते हैं
भीष्म को पिता शांतनु से इच्छा-मृत्यु का वर मिला था। कुरुक्षेत्र के युद्ध में घायल होने के बाद भी उन्होंने प्राण नहीं छोड़े, क्योंकि दक्षिणायन में देह त्यागना वे उचित नहीं मानते थे। इसी बीच उन्होंने युधिष्ठिर को राजधर्म का उपदेश दिया और विष्णु सहस्रनाम भी इसी प्रसंग से जुड़ा है। भीष्म ने आजीवन ब्रह्मचर्य रखा और उनकी कोई संतान नहीं थी, इसलिए मान्यता है कि हर हिंदू उन्हें जल अर्पित करे।
किस तिथि को
माघ मास, शुक्ल पक्ष, अष्टमी। सूर्योदय-व्यापिनी अष्टमी वाला दिन लिया जाता है और तर्पण मध्याह्न में करना उचित माना जाता है। यह रथ सप्तमी के अगले दिन आती है, और चार दिन बाद भीष्म द्वादशी होती है।
कैसे मनाते हैं
- गंगा या किसी नदी में स्नान, संभव न हो तो घर पर गंगाजल मिलाकर।
- हाथ में जल, तिल और कुश लेकर भीष्म के नाम से तर्पण।
- कई लोग एकोद्दिष्ट श्राद्ध की तरह ब्राह्मण भोजन या अन्न दान करते हैं।
- विष्णु सहस्रनाम का पाठ और गाय को हरा चारा या गुड़ खिलाना।
कई परिवार इस दिन संतान के सुख और परिवार में संस्कार बने रहने की प्रार्थना के साथ भीष्म को याद करते हैं, क्योंकि उनका जीवन वचन निभाने और कर्तव्य पर टिके रहने का उदाहरण माना जाता है।
प्रयागराज के माघ मेले में कल्पवासी इस दिन विशेष स्नान करते हैं। उत्तरायण का अर्थ संक्रांति और उत्तरायण लेख में समझाया गया है। तर्पण की सामान्य विधि श्राद्ध और तर्पण विधि में देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भीष्म अष्टमी कब होती है?
भीष्म अष्टमी पर तर्पण कौन कर सकता है?
भीष्म ने उत्तरायण की प्रतीक्षा क्यों की?
भीष्म अष्टमी और भीष्म द्वादशी में क्या अंतर है?
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