2026

आश्विन अमावस्या 2026

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मुख्य विवरण

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आश्विन अमावस्या

आश्विन अमावस्या क्या है

आश्विन अमावस्या पितृ पक्ष का आख़िरी दिन है। सोलह दिन तक चले श्राद्ध पक्ष के बाद इसी दिन पितरों को विदा किया जाता है, और अगली सुबह से शारदीय नवरात्रि शुरू होती है। इसलिए यह अमावस्या एक तरफ़ पूर्वजों की स्मृति और दूसरी तरफ़ देवी के आगमन की तैयारी, दोनों का दिन है।

किस तिथि को

पूर्णिमांत पंचांग में यह आश्विन कृष्ण अमावस्या है; अमांत पंचांग में इसे भाद्रपद अमावस्या कहा जाता है, क्योंकि वहाँ पितृ पक्ष भाद्रपद के कृष्ण पक्ष में गिना जाता है। यह पृष्ठ अमावस्या तिथि का सूर्योदय वाला दिन दिखाता है, जो स्नान, दान और दीपदान के लिए लिया जाता है। श्राद्ध का दिन अपराह्न काल से तय होता है, इसलिए कभी-कभी दोनों में एक दिन का अंतर आ सकता है; श्राद्ध की विधि और समय सर्वपितृ अमावस्या पृष्ठ पर देखें।

इस दिन क्या करते हैं

  • सुबह नदी या घर पर स्नान और सूर्य को अर्घ्य।
  • पितरों के नाम से अन्न, वस्त्र और दक्षिणा का दान; गाय, कुत्ते, कौए और चींटियों के लिए भोजन निकालना।
  • शाम को घर के द्वार पर दक्षिण दिशा में दीपक जलाकर पितरों को विदा करना। उत्तर भारत के बहुत से घरों में यह पितृ विसर्जन का दीपक कहलाता है।
  • घर की सफ़ाई और अगले दिन की कलश स्थापना की तैयारी।

क्षेत्रीय परंपराएँ

बंगाल में इस दिन को महालया कहा जाता है। भोर में घर-घर महिषासुरमर्दिनी का पाठ सुना जाता है और इसी दिन से देवी पक्ष शुरू माना जाता है; दुर्गा प्रतिमाओं में आँखें बनाने (चक्षुदान) की परंपरा भी इसी दिन से जुड़ी है। गया (बिहार) में पितृ पक्ष का मेला इसी अमावस्या पर पूरा होता है।

अगले दिन से नवरात्रि घटस्थापना है। पितृ पक्ष के पूरे नियम पितृ पक्ष श्राद्ध विधि में पढ़ें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आश्विन अमावस्या और सर्वपितृ अमावस्या एक ही हैं?
हाँ, आमतौर पर एक ही दिन होते हैं। पर श्राद्ध अपराह्न में अमावस्या देखकर किया जाता है, इसलिए कभी-कभी श्राद्ध का दिन सूर्योदय वाली अमावस्या से एक दिन पहले पड़ सकता है।
अमांत पंचांग में इसे क्या कहते हैं?
अमांत पंचांग में यही दिन भाद्रपद अमावस्या कहलाता है।
पितृ विसर्जन का दीपक कब जलाएं?
शाम को सूर्यास्त के बाद घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके दीपक जलाया जाता है।
इस अमावस्या के बाद कौन सा पर्व आता है?
अगले दिन आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शारदीय नवरात्रि और घटस्थापना होती है।
बंगाल में महालया क्यों मनाते हैं?
बंगाल में यह दिन पितृ पक्ष के अंत और देवी पक्ष के आरंभ का प्रतीक है, जब माँ दुर्गा के धरती पर आने का आह्वान किया जाता है।

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