श्री उमाष्टकं
ॐ
ॐ नम उमा भगवत्यै |
चामरं दक्षिणे हस्ते कमलं चोत्तरे तथा |
रक्तांबरा दयामूर्तिः प्रसन्नोमास्तु सर्वदा ||1||
सुवर्णसदृशीं गौरीं भुजद्वय-समन्वितां |
नीलपद्मं हि वामेन पाणिना बिभ्रतीं सदा ||2||
दिवाकर-शतद्युतिं जननीं भुक्तिमुक्तिदाम |
सुमुखीं वरदां देवी सिंहस्थां परिपूजयेत् ||3||
भक्ताय शिवरामाय स्नुषा ब्राहस्य सन्निधौ |
स्वप्ने स्वं दर्शयामास रूपं वैराग्यदं शुभं ||4||
काकरूपा ततो देवी भक्तानुग्रहकाम्यया
ओंकाररूपसंभूता पंचधाऽभयदायिनी ||5||
प्रादुर्भूता नदीरूपा भक्तानां फलदायिनी |
ओंकाररूपसदृशी पंचधा दिव्य-कुंडजा ||6||
भक्तः प्रभावयुक्तायाः स्वयमानंदनामकः |
देव्या भवनं निर्मातुं शिलान्यासं चकार सः ||7||
ओंकाररूपेण विराजमाना सा पूजकानां वरदायिनी च |
रक्तांबरा दिव्यवपुः उमाख्या सा ब्रह्मरूपा विजयस्य दात्री ||8||
इति उमाष्टकं संपूर्णं |
अर्थ
श्री उमाष्टकं जगज्जननी श्री उमादेवी को समर्पित आठ श्लोकों का एक दिव्य स्तोत्र है। यह स्तोत्र भक्तों को माँ उमा की करुणा, शक्ति और आध्यात्मिक सार से परिचित कराता है। उमादेवी, जो माँ पार्वती का एक रूप हैं, भगवान शिव की शक्ति स्वरूपिणी हैं और सृष्टि, स्थिति तथा संहार की मूल शक्ति हैं। यह अष्टक देवी के दिव्य रूप, उनकी कृपालु शक्ति और भक्तों पर उनके अनुग्रह का मनोहारी वर्णन करता है। इसका पाठ करने से भक्तों को मानसिक शांति, निर्भयता और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
पहले तीन श्लोक माँ उमा के दिव्य स्वरूप और उनके महत्व का विस्तार से वर्णन करते हैं। प्रथम श्लोक में देवी को लाल वस्त्र धारण किए हुए, दया की मूर्ति बताया गया है, जिनके दाहिने हाथ में चामर और बाएं हाथ में कमल सुशोभित है। उनका प्रसन्न मुख सदा भक्तों पर कृपा दृष्टि बनाए रखता है। द्वितीय श्लोक उन्हें स्वर्ण के समान कांति वाली गौरी के रूप में चित्रित करता है, जो अपने बाएं हाथ में नीलकमल धारण किए हुए दिव्य सौंदर्य से प्रकाशित होती हैं। तीसरा श्लोक बताता है कि देवी सौ सूर्यों के समान तेजस्वी हैं, जो भोग (सांसारिक सुख) और मोक्ष दोनों प्रदान करने वाली वरदायिनी हैं। सिंह पर विराजमान उनके इस रूप की भक्तों को पूजा करनी चाहिए। ये वर्णन देवी की भव्यता और सार्वभौमिक शक्ति को दर्शाते हैं।
चौथा श्लोक देवी की कृपा का एक उदाहरण प्रस्तुत करता है। भक्त शिवराम ने देवी की सानिध्य में अपने स्वप्न में देवी के रूप का दर्शन किया था। यह रूप वैराग्य प्रदान करने वाला और शुभ फलदायी दिव्य दर्शन था, जो दर्शाता है कि देवी अपने भक्तों का कैसे मार्गदर्शन करती हैं। पाँचवें और छठे श्लोक में कहा गया है कि देवी भक्तों पर अनुग्रह करने की इच्छा से ॐकार स्वरूप से प्रकट हुईं और पाँच प्रकार के भय को दूर करने वाले रूपों में नदियों के रूप में प्रकट हुईं। ये नदी रूप भक्तों को फल प्रदान करते हैं और ॐकार की दिव्य शक्ति को प्रतिबिंबित करते हैं। यह देवी की सृजन शक्ति और रक्षात्मक गुणों पर जोर देता है।
सातवाँ श्लोक बताता है कि देवी के प्रभाव से प्रेरित होकर आनंदन नामक भक्त ने देवी के दिव्य निवास के निर्माण के लिए शिलान्यास किया। यह भक्ति की शक्ति और देवी की प्रेरणा से किए गए महान कार्यों को दर्शाता है। आठवाँ और अंतिम श्लोक उमादेवी को ॐकार स्वरूपिणी, भक्तों को वरदान देने वाली, लाल वस्त्र धारण करने वाली, ब्रह्म स्वरूपिणी और विजय प्रदान करने वाली के रूप में वर्णित करता है। यह स्तोत्र माँ उमा की सर्वोच्च शक्ति, दया और विजयदायिनी गुणों का सार प्रस्तुत करता है।
लाभ (Benefits):
- मानसिक शांति: स्तोत्र के पाठ से मन शांत होता है, चिंताएँ दूर होती हैं और आंतरिक शांति प्राप्त होती है।
- भय निवारण: देवी के पंचधा अभयदायिनी स्वरूप के स्मरण से सभी प्रकार के भय दूर होते हैं और साहस में वृद्धि होती है।
- ऐश्वर्य और मोक्ष: माँ उमा भोग (सांसारिक सुख) और मोक्ष (आध्यात्मिक मुक्ति) दोनों प्रदान करने वाली हैं, जिससे भक्तों को समृद्धि और आध्यात्मिक उत्थान प्राप्त होता है।
- कष्ट निवारण और विजय: देवी विजय की दात्री हैं, इसलिए जीवन की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति मिलती है और सभी कार्यों में सफलता प्राप्त करने में सहायता मिलती है।
- आध्यात्मिक जागृति: उमा देवी के वैराग्यप्रद रूप के स्मरण से भक्तों में आध्यात्मिक जागृति और वैराग्य की भावना उत्पन्न होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या है श्री उमाष्टकं?
श्री उमाष्टकं का पाठ कब करना चाहिए?
श्री उमाष्टकं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
कौन श्री उमाष्टकं का पाठ कर सकता है?
श्री उमाष्टकं का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री उमाष्टकं का मूल या रचयिता कौन हैं?
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