गौरी स्तुतिः
श्रीः
लीलालब्धस्थापितलुप्ताखिललोकां
लोकातीतैर्योगिभिरंतश्चिरमृग्यां|
बालादित्यश्रेणिसमानद्युतिपुंजां
गौरीममंबामंबुरुहाक्षीमहमीडे ||1||
प्रत्याहारध्यानसमाधिस्थितिभाजां
नित्यं चित्ते निर्वृतिकाष्ठां कलयंतीं|
सत्यज्ञानानंदमयीं तां तनुरूपां
गौरीमंबामंबुरुहाक्षीमहमीडे ||2||
चंद्रापीडानंदितमंदस्मितवक्त्रां
चंद्रापीडालंकृतनीलालकभारां|
इंद्रोपेंद्राद्यर्चितपादांबुजयुग्मां
गौरीमंबामंबुरुहाक्षीमहमीडे ||3||
आदिक्षांतामक्षरमूर्त्या विलसंतीं
भूते भूते भूतकदंबप्रसवित्रीं|
शब्दब्रह्मानंदमयीं तां तटिदाभां
गौरीमंबामंबुरुहाक्षीमहमीडे ||4||
मूलाधारादुत्थितवीथ्या विधिरंध्रं
सौरं चांद्रं व्याप्य विहारज्वलितांगीं|
येयं सूक्ष्मात्सूक्ष्मतनुस्तां सुखरूपां
गौरीमंबामंबुरुहाक्षीमहमीडे ||5||
नित्यः शुद्धो निष्कल एको जगदीशः
साक्षी यस्याः सर्गविधौ संहरणे च|
विश्वत्राणक्रीडनलोलां शिवपत्नीं
गौरीमंबामंबुरुहाक्षीमहमीडे ||6||
यस्याः कुक्षौ लीनमखंडं जगदंडं
भूयो भूयः प्रादुरभूदुत्थितमेव|
पत्या सार्धं तां रजताद्रौ विहरंतीं
गौरीमंबामंबुरुहाक्षीमहमीडे ||7||
यस्यामोतं प्रोतमशेषं मणिमाला-
सूत्रे यद्वत्क्कापि चरं चाप्यचरं च|
तामध्यात्मज्ञानपदव्या गमनीयां
गौरीमंबामंबुरुहाक्षीमहमीडे ||8||
नानाकारैः शक्तिकदंबैर्भुवनानि
व्याप्य स्वैरं क्रीडति येयं स्वयमेका|
कल्याणीं तां कल्पलतामानतिभाजां
गौरीमंबामंबुरुहाक्षीमहमीडे ||9||
आशापाशक्लेशविनाशं विदधानां
पादांभोजध्यानपराणां पुरुषाणां|
ईशामीशार्धांगहरां तामभिरामां
गौरीमंबामंबुरुहाक्षीमहमीडे ||10||
प्रातःकाले भावविशुद्धः प्रणिधाना-
द्भक्त्या नित्यं जल्पति गौरिदशकं यः|
वाचां सिद्धिं संपदमग्र्यां शिवभक्तिं (संपदं उच्चैः)
तस्यावश्यं पर्वतपुत्री विदधाति ||11||
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीगोविंदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य
श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ
गौरीदशकं संपूर्णं ||
अर्थ
श्री गौरी स्तुति आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक दिव्य स्तोत्र है, जो जगन्माता श्री गौरी देवी की महिमा, शक्ति और करुणा का विस्तृत वर्णन करता है। यह स्तुति देवी को परम सत्य, ज्ञान और आनंद के स्वरूप के रूप में, तथा सृष्टि, स्थिति और लय की मूल कारण, आदि शक्ति के रूप में पूजती है। इसका प्रत्येक श्लोक देवी के विभिन्न दिव्य गुणों और भक्तों पर उनके अनुग्रह को उजागर करता है।
गौरी देवी ब्रह्मांड की मूलभूत शक्ति हैं, जिन्हें केवल योगी ही अपनी गहन ध्यान अवस्था में देख पाते हैं। वे एक दिव्य ज्योतिर्मय स्वरूपिणी हैं, जो नष्ट हुए लोकों को पुनः स्थापित करती हैं और उगते हुए सूर्य की सहस्रों किरणों के समान तेजोमय हैं। जो साधक प्रत्याहार, ध्यान और समाधि जैसी योग अवस्थाओं को प्राप्त करते हैं, उन्हें वे हृदय में शाश्वत आनंद प्रदान करती हैं। सत्य, ज्ञान और आनंद के साकार रूप में, वे हमारे अंतर्मन में निरंतर निवास करती हैं।
देवी अपने नीले केशों में चंद्रकला धारण किए हुए हैं और चंद्रमा के स्पर्श से खिले हुए मंद मुस्कान वाले मुख से सुशोभित हैं। उनके चरण कमल इंद्र, विष्णु, ब्रह्मा सहित सभी देवताओं द्वारा पूजे जाते हैं। वे 'अ' से 'क्ष' तक अक्षरों में व्याप्त अक्षर मूर्ति हैं, जो प्रत्येक प्राणी में स्थित हैं और समस्त जीव समूह को जन्म देती हैं। वे शब्द ब्रह्मानंद स्वरूपिणी हैं, बिजली की आभा के समान चमकने वाली ज्ञान स्वरूपिणी हैं।
मूलाधार चक्र से उठकर, सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम से सूर्य और चंद्रमा के मार्गों में व्याप्त होकर, सूक्ष्म रूप में प्रकाशित होने वाली परम सुख की स्वरूपिणी ही गौरी देवी हैं। वे नित्य शुद्ध, निष्कलंक हैं और जगन्नाथ शिव की साक्षात् पत्नी हैं। सृष्टि, स्थिति और लय की प्रमुख शक्ति के रूप में, वे भक्तों को शांति और करुणा प्रदान करती हैं। समस्त जगत उनके गर्भ में लीन होकर, फिर से उनकी शक्ति से ही उत्पन्न होता है। चांदी के पर्वत (हिमालय) पर भगवान शिव के साथ विहार करने वाली उस देवी की भक्त स्तुति करते हैं। यह सारा जगत उनके ज्ञान रूपी सूत्र में मोतियों की माला के समान पिरोया हुआ है। आध्यात्मिक ज्ञान के मार्ग पर हमें अग्रसर करने वाली वे ही हैं। एक ही शक्ति के रूप में अनेक रूपों में सृष्टि में विहार करने वाली, कल्पलता के समान भक्तों की इच्छाओं को पूर्ण करने वाली शुभप्रदात्री हैं। अपने भक्तों के हृदय से आशा, दुःख और क्लेशों को दूर करने वाली, भगवान शिव की अर्धांगिनी, वह मंगलमयी और सुंदर गौरी देवी की हम सदा स्तुति करें।
लाभ (Benefits):
- वाक्पटुता: इस स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करने से वाणी में मधुरता, स्पष्टता और वाक्पटुता आती है।
- ऐश्वर्य और समृद्धि: गौरी देवी धन और समृद्धि की अधिष्ठात्री हैं, अतः इस स्तोत्र का पाठ आर्थिक स्थिति में सुधार लाता है और ऐश्वर्य प्रदान करता है।
- शिवभक्ति: देवी की उपासना से भगवान शिव के प्रति भक्ति बढ़ती है और शिव-शक्ति सिद्धांत की गहरी समझ प्राप्त होती है।
- शांति और संतोष: मानसिक शांति, आंतरिक संतोष और जीवन में आनंद प्राप्त करने में यह स्तोत्र सहायक है।
- ज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति: चूंकि देवी ज्ञान की स्वरूपिणी हैं, यह स्तोत्र आध्यात्मिक ज्ञान को बढ़ाता है और आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर अग्रसर करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री गौरी स्तुति क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री गौरी स्तुति के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
कौन इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है?
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
श्री गौरी स्तुति का मूल स्रोत क्या है?
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