गणेशकृता गौरीस्तुतिः
जयांब जय शर्वाणि जय गौरि शिवप्रिये |
जयान्नपूर्णे विमले कालकालप्रियेऽनघे ||39||
जय शैलसुते देवि कमलामललोचने |
जयामरांगनाराध्ये जय कल्याणि शांभवि ||40||
जय मंगलसर्वांगे मंगले सर्वमंगले |
जय मृत्युंजयार्धांगि तुंगसिंहासनाश्रये ||41||
जय भक्तजनानंदप्रदाननियतव्रते |
जय दुर्गे विशालाक्षि जय त्रिपुरभैरवि ||42||
जय वागीश्वरि प्राज्ञे मंगले गौरि चंडिके |
चित्रघंटे जयानंगविजयध्वजमालिके ||43||
जय श्रीविकटागौरि सिद्धेश्वरि नमो नमः | (श्रीविलसद्गौरि)
नमस्ते संकटागौरि शीतलागौरि ते नमः ||44||
वंदिदेवि नमस्तुभ्यं ललिते विश्वबाहुके |
चंदलांब नमस्तुभ्यं नमस्ते भ्रमरांबिके ||45||
ज्ञानप्रसूनांब नमो नमस्ते नमो नमस्ते शिवकामसुंदरि |
नमो नमस्तेऽस्त्वरुणाचलेश्वरि नमो महागौरि नमो नमस्ते ||46||
नमो नमः कल्पलताप्रसूनमालासमाक्रांतपदा रविंदे |
वंदे स्वभक्तेप्सितदानलोले विलासशैले गिरिजे नमस्ते ||47||
नमो नमस्त्वच्चरणारविंदमरंदधाराप्रसरोऽस्तु मूर्ध्नि |
अस्माकमीशानदया यथा स्यात्तथा विधेयं गमनोत्तरं वा ||48||
न स्वापराधेन कृतो विलंबः तमंब संवेदय शंकराय |
कृतापराधानपि बालपुत्रान् अंबा न सा कुप्यति सर्वथांब ||49||
अस्माकमन्यच्छरणं किमस्ति विहाय तावच्छरणं तवांब |
शिवस्य वा तावदुमे ततोऽस्मान् अवावनं भक्तजनस्य कार्यं ||50||
अस्माकमप्यंतकवेरिधीरद्वाराश्रयाणां न भयं कुतोऽपि |
दया विधेया खलु तावदेव त्वत्पादपद्मार्चकतत्पराणां ||51||
विहारकालेषु कदाचिदंब सांबाय तावद्विनिवेदनीयाः |
वयं यथा साधु सुखं प्रपन्नाः शिवप्रसादेन भवत्प्रसादात् ||52||
सा त्वं शिवार्धांगमुमे दया चेदस्मासु तावत्तव तावतापि |
न दुःखलेशोऽपि ततः प्रसन्ने प्रसन्नचित्तान्कुरु सर्वदा नः ||53||
विज्ञापनेयं हृदि सावधानमानंददानप्रवणे तवास्तु |
एतावताऽस्माकमुमासहायसहायतामेति न संशयोऽत्र ||54 ||इति शिवरहस्यांतर्गते गणेशकृता गौरीस्तुतिः संपूर्णा||
अर्थ
गणेशकृता गौरी स्तुति भगवान गणेश द्वारा अपनी प्रिय माता, आदिशक्ति माँ गौरी (पार्वती) के प्रति समर्पित एक अत्यंत भावपूर्ण और विस्तृत स्तोत्र है। शिव रहस्य ग्रंथ में वर्णित यह स्तोत्र, एक पुत्र का अपनी माँ के प्रति अगाध प्रेम, भक्ति और पूर्ण समर्पण को दर्शाता है। इसमें गणेश जी केवल अपनी माता की महिमा का गुणगान ही नहीं करते, बल्कि समस्त भक्तों की ओर से उनकी कृपा, रक्षा और मोक्ष की याचना भी करते हैं। यह स्तोत्र माँ गौरी के विभिन्न दिव्य स्वरूपों और उनकी अनंत करुणा का एक अद्भुत चित्रण प्रस्तुत करता है।
इस स्तोत्र में गणेश जी माँ गौरी को अनेक रूपों में संबोधित करते हैं - शरवाणी, अन्नपूर्णा, विमले, कालकालप्रिये, शैलसुते, कमलामालोचने, अमरांगना आराध्धे, कल्याणी, शाम्भवी। वे उन्हें समस्त मंगलों की अधिष्ठात्री, नित्य पवित्र स्वरूपा, भगवान शिव की प्रियतमा, पर्वतराज हिमालय की पुत्री और कमल के समान निर्मल नेत्रों वाली देवी के रूप में पूजते हैं। माँ गौरी को मृत्युंजय भगवान शिव की अर्धांगिनी और भक्तों को सुख प्रदान करने के व्रत वाली दयामयी के रूप में भी महिमामंडित किया गया है। उनकी मंगलमय उपस्थिति सभी प्रकार की बुराइयों और नकारात्मक शक्तियों को शांत करती है।
गणेश जी माँ को वागीश्वरी (वाणी की देवी), ज्ञान स्वरूपा, चंडिका, चित्रघंटा और विजय ध्वज से अलंकृत देवी के रूप में वर्णित करते हैं। वे श्रीविलसद्गौरी, संकटागौरी और शीतलागौरी जैसे नामों से उनका स्तवन करते हैं, जो उनके विभिन्न कल्याणकारी स्वरूपों को दर्शाते हैं। वे ललिता, भ्रामराम्बिका, ज्ञानप्रसूनाम्बा, शिवकामसुंदरी, अरुणाचलेश्वरी और महागाौरी जैसे अन्य दिव्य रूपों का आह्वान करते हुए कहते हैं कि उनके चरण कमल कल्पलता के फूलों की माला के समान हमारे मस्तक पर सदा सुशोभित रहें। गणेश जी प्रार्थना करते हैं कि हमारा संपूर्ण जीवन माँ की करुणा की धारा में प्रवाहित हो और उनकी दिव्य दृष्टि सदैव हम पर बनी रहे।
यह स्तोत्र इस बात पर बल देता है कि माँ कभी अपने बच्चों पर क्रोधित नहीं होती। यदि हम अज्ञानवश कोई त्रुटि कर भी दें, तो माँ ही भगवान शिव से हमारी क्षमा याचना करती हैं। गणेश जी कहते हैं कि माँ के अतिरिक्त हमारा कोई अन्य आश्रय नहीं है। जो भक्त उनके चरण कमलों की सेवा करते हैं, उन्हें यमराज का भय भी नहीं सताता, क्योंकि माँ की कृपा ही उनकी परम रक्षक है। हे शिवप्रिया गौरी, अपनी दया हम पर बरसाओ। यदि आप भगवान शिव के प्रसाद के साथ प्रसन्न हो जाती हैं, तो हमारे जीवन में दुःख का एक कण भी नहीं रहेगा। गणेश जी अपनी इस विनम्र प्रार्थना को स्वीकार करने का आग्रह करते हुए कहते हैं कि माँ की सहायता ही भगवान शिव की सहायता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।
लाभ (Benefits):
- संकट निवारण और सुरक्षा: इस स्तोत्र के पाठ से सभी प्रकार के संकट दूर होते हैं और भक्त को सभी प्रकार के भय तथा नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा प्राप्त होती है। यह गणेश जी द्वारा अपनी माता से की गई प्रार्थना का फल है।
- समृद्धि और ऐश्वर्य की प्राप्ति: अन्नपूर्णा स्वरूप में माँ गौरी की स्तुति करने से घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है, दरिद्रता का नाश होता है और आर्थिक संपन्नता आती है।
- पारिवारिक सुख और सामंजस्य: शिवप्रिया गौरी की आराधना से परिवार में शांति, प्रेम और सौहार्द बढ़ता है। यह स्तोत्र पारिवारिक एकता और संबंधों को मजबूत करने में सहायक है।
- आध्यात्मिक उन्नति और ज्ञान लाभ: वागीश्वरी और ज्ञान स्वरूपा देवी की पूजा से ज्ञान, बुद्धि और आध्यात्मिक चेतना का विकास होता है, जिससे मोक्ष मार्ग प्रशस्त होता है।
- अकाल मृत्यु भय से मुक्ति: मृत्युंजय भगवान शिव की अर्धांगिनी माँ गौरी की स्तुति अकाल मृत्यु के भय को दूर करती है और भक्तों को दीर्घायु तथा उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गणेशकृता गौरी स्तुति क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
गणेशकृता गौरी स्तुति के पाठ से क्या प्रमुख लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल स्रोत क्या है?
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