श्री गौरीगिरीश कल्याण स्तवः
(श्रीशृंगगिरौ - श्रीभवानीमलहानिकरेश्वरकल्याणोत्सवे)
चंद्रार्धप्रविभासिमस्तकतटौ तंद्राविहीनौ सदा
भक्तौघप्रतिपालने निजतनुच्छायाजितार्कायुतौ |
शृंगाद्रिस्थविवाहमंडपगतौ कारुण्यवारान्निधी
कल्याणं तनुतां समस्तजगतां गौरीगिरीशौ मुदा ||1||
अन्योन्यार्चनतत्परौ मधुरवाक्सतोषितान्योन्यकौ
चंद्रार्धांचितशेखरौ प्रणमतामिष्टार्थदौ सत्वरं |
शृंगाहिस्थविवाहमंडपगतौ शृंगारजन्मावनी
कल्पाणं तनुतां समस्तजगतां गौरीगिरीशौ मुदा ||2||
कामापत्तिविभूतिकारणदृशौ सोमार्धभूषोज्ज्वलौ
सामाम्नायसुगीयमानचरितौ रामार्चितांघ्रिद्वयौ |
शृंगाद्रिस्थविवाहमंडपगतौ माणिक्यभूषान्वितौ
कल्याणं तनुतां समस्तजगतां गौरीगिरीशौ मुदा ||3||
सौंदर्येण परस्परं प्रमुदितावन्योन्यचित्तस्थितौ
राकाचंद्रसमानवक्त्रकमलौ पाकाब्जकालंकृतौ |
शृंगाद्रिस्थविवाहमंडपगतौ तुंगातटावासिनौ
कल्याणं तनुतां समस्तजगतां गौरीगिरीशौ मुदा ||4||
सिंहोक्षाग्र्यगती महोन्नतपदं संप्रापयंतौ नता-
नंहोराशिनिवारणैकनिपुणौ ब्रह्मेंद्रविष्ण्वर्चितौ |
शृंगाद्रिस्थविवाहमंडपगतौ गांगेयभूषोज्ज्वलौ
कल्याणं तनुतां समस्तजगतां गौरीगिरीशौ मुदा ||5||
कस्तूरीघनसारचर्चिततनू प्रस्तूयमानौ सुरै-
रस्तूक्त्या प्रणतेष्टपूरणकरौ वस्तूपलब्धिप्रदौ |
शृंगाद्रिस्थविवाहमंडपगतावंगावधूतेंदुभौ
कल्याणं तनुतां समस्तजगतां गौरीगिरीशौ मुदा ||6||
वाणीनिर्जितहंसकोकिलरवौ पाणीकृतांभोरुहौ
वेणीकेशविनिर्जिताहिचपलौ क्षोणीसमानक्षमौ |
शृंगाद्रिस्थविवाहमंडपगतौ तुंगेष्टजालप्रदौ
कल्याणं तनुतां समस्तजगतां गौरीगिरीशौ मुदा ||7||
दंभाहंकृतिदोषशून्यपुरुषैः संभावनीयौ सदा
जंभारातिमुखामरेंद्रविनुतौ कुंभात्मजाद्यर्चितौ |
शृंगाद्रिस्थविवाहमंडपगतौ वाग्दानदीक्षाधरौ
कल्याणं तनुतां समस्तजगतां गौरीगिरीशौ मुदा ||8||
शापानुग्रहशक्तिदाननिपुणौ तापापनोदक्षमौ
सोपानक्रमतोऽधिकारिभिरनुप्राप्यौ क्षमासागरौ |
शृंगाद्रिस्थविवाहमंडपगतौ लावण्यपाथोनिधी
कल्याणं तनुतां समस्तजगतां गौरीगिरीशौ मुदा ||9||
शोणांभोरुहतुल्यपादयुगलौ बाणार्चनातोषितौ
वीणाधृन्मुनिगीयमानविभवौ बालारुणाभांबरौ |
शृंगाद्रिस्थविवाहमंडपगतौ तुल्याधिकैर्वर्जितौ
कल्याणं तनुतां समस्तजगतां गौरागिरीशौ मुदा ||10||
इति शृंगेरि श्रीजगद्गुरु श्रीसच्चिदानंदशिवाभिनवनृसिंह-
भारतीस्वामिभिः विरचितः श्रीगौरीगिरीशकल्याणस्तवः संपूर्णः |
अर्थ
श्री गौरीगिरीश कल्याण स्तव भगवान शिव और देवी पार्वती के दिव्य विवाह का वर्णन करने वाला एक अत्यंत पवित्र स्तोत्र है। यह आदि शंकराचार्य की परम्परा में शृंगेरी क्षेत्र में श्री भवानीमलहानिकरेश्वर के कल्याणोत्सव के अवसर पर रचित एक सुंदर कृति है। यह स्तोत्र केवल एक घटना का वर्णन नहीं है, बल्कि शिव और शक्ति के अनादि संबंध, उनके परस्पर प्रेम और उनके द्वारा जगत को प्रदान की जाने वाली करुणा तथा मंगल का उद्घोष करता है।
यह स्तोत्र शिव (चेतना) और पार्वती (शक्ति) के दिव्य मिलन को दर्शाता है। सृष्टि, स्थिति और लय के कारणभूत यह दिव्य युगल अपने विवाह के माध्यम से समस्त जगत को सामंजस्य, शांति और समृद्धि का संदेश देता है। उनका दांपत्य आदर्श है, जो परस्पर प्रेम, सम्मान, त्याग और करुणा का प्रतीक है। शृंगेरी क्षेत्र इस दिव्य कल्याण का साक्षी रहा एक पवित्र स्थान है, जहाँ से ये दैवीय शक्तियाँ लोक में मंगल का प्रसार करती हैं।
प्रत्येक श्लोक गौरी-गिरीश के दिव्य गुणों, सौंदर्य और लोक कल्याणकारी स्वरूप का वर्णन करता है। पहला श्लोक कहता है कि चंद्रकला से सुशोभित मस्तक वाले, सदा निद्रारहित रहकर भक्तों की रक्षा करने वाले, करुणा के सागर वे गौरी-गिरीश शृंगेरी विवाह मंडप में विराजमान होकर समस्त जगत का कल्याण करें। दूसरा श्लोक उनके परस्पर सेवा में लीन रहने, मधुर वचनों से एक-दूसरे को प्रसन्न करने और भक्तों की इच्छाओं को शीघ्र पूर्ण करने की करुणा को उजागर करता है। तीसरा श्लोक कामदेव की शोभा के कारणभूत, सोमकला से प्रकाशित, सामवेद गीतों में स्तुति किए जाने वाले और भगवान राम द्वारा पूजित उनके चरण कमलों की महिमा का वर्णन करता है।
चौथा श्लोक कहता है कि सौंदर्य से परस्पर आनंदित रहने वाले, एक-दूसरे के हृदय में स्थित, पूर्णिमा के चंद्रमा के समान मुखकमल वाले, तुंगा नदी के तट पर शृंगेरी विवाह मंडप में विराजमान वे गौरी-गिरीश समस्त जगत का कल्याण करें। पाँचवाँ श्लोक सिंहवाहिनी गौरी और नंदीवाहन शिव का गुणगान करता है, जिन्हें ब्रह्मा, इंद्र और विष्णु द्वारा पूजा जाता है, जो पापों का नाश करने वाले परम दयालु हैं, वे जगत का मंगल करें। छठा श्लोक कस्तूरी और अगरु के सुगंध से युक्त शरीर वाले, देवताओं द्वारा स्तुति किए जाने वाले और भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाले उनके दयालु स्वरूप को स्मरण करता है।
सातवाँ श्लोक वाणी और हंसकोकिला के स्वर से भी मधुर कंठ वाले, पृथ्वी के समान स्थिर मन वाले, परस्पर नित्य प्रेम रखने वाले उस दिव्य युगल से भक्तों के जीवन में ऐश्वर्य वृद्धि की कामना करता है। आठवाँ श्लोक अहंकार रहित, जंभासुर आदि राक्षसों को जीतने वाले, सरस्वती, गणपति, अग्नि आदि देवताओं द्वारा निरंतर पूजित, वाग्दान में निष्ठा रखने वाले उन गौरी-गिरीश से समस्त कल्याण प्रदान करने की प्रार्थना करता है। नौवाँ श्लोक शाप और अनुग्रह दोनों के अधिपति, तपस्या का फल देने वाले, क्षमा के सागर, शृंगेरी विवाह मंडप में दिव्य रूप से प्रकाशित उस युगल से जगत को शांति और सौभाग्य प्रदान करने की प्रार्थना करता है। अंत में, दसवाँ श्लोक कमल के समान चरणों वाले, बाणासुर की आराधना से प्रसन्न, वीणाधारी मुनियों द्वारा गीतों में स्तुति किए जाने वाले उन गौरी-गिरीश से भक्तों के जीवन को समस्त कल्याण प्रदान करने का मंगल करता है।
यह स्तोत्र केवल शिव-पार्वती की महिमा का गान ही नहीं करता, बल्कि इसे भक्तिपूर्वक पाठ करने वालों को अनेक लाभ भी प्रदान करता है।
लाभ (Benefits):
- वैवाहिक सुख और सामंजस्य: इस स्तोत्र का नियमित पाठ पति-पत्नी के बीच प्रेम, समझ और सामंजस्य बढ़ाता है। आदर्श दांपत्य के प्रतीक गौरी-गिरीश का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
- शांति और मन की स्थिरता: मन की चिंताओं को दूर कर आंतरिक शांति और सुख प्रदान करता है। पारिवारिक कलह कम होते हैं और घर में सुखद वातावरण बनता है।
- मनोकामना पूर्ति और समृद्धि: भक्तों की सद्भावनापूर्ण इच्छाओं को पूर्ण करता है। आर्थिक समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त करता है।
- शुभ कार्यों की सिद्धि: विवाह, गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्यों में आने वाली बाधाओं को दूर करता है और उन्हें सुचारू रूप से संपन्न करने में सहायता करता है। विशेषकर विवाह संबंधी बाधाओं को दूर करता है।
- आध्यात्मिक उन्नति: शिव और शक्ति के दिव्य स्वरूपों का ध्यान करने से आध्यात्मिक ज्ञान में वृद्धि होती है और मोक्ष मार्ग पर प्रगति करने में सहायता मिलती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री गौरीगिरीश कल्याण स्तव क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री गौरीगिरीश कल्याण स्तव के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
यह स्तोत्र किसे पढ़ना चाहिए?
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
इस स्toत्र का उद्गम या इतिहास क्या है?
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