कुमार विरचितं गौरीस्तवः
सा गौरी सुखराशिरेव सुकृतश्रेणीसुधासागरः
सौंदर्यद्रववाहिनी च सततं सा वाहिनी संपदां |
आपद्राशिविनाशिनी खलु महापापाशनैः सा शनैः
एतन्मे शयनं समेत्य शमुमा मह्यं प्रदास्यत्यपि ||1||
गौरी शारदपूर्णचंद्रवदना दृष्टाऽप्यटैर्मुहुः
कष्टं दुष्टमपाकरिष्यति मुहुः स्पृष्टा मुखांभोनिधिं | (दुःखं)
सृष्ट्वा सृष्टिविचक्षणा खलु मुहुर्दृष्टिप्रवृष्टिं परां
स्रष्टुर्दृष्टिविशेष योषित तनुं कुर्याददृष्टान्वितं ||2||(पोषित)
भाग्यैर्भूरितपःप्रभावभवनैः संभावनीयान् मुहुः
भक्ताभीष्टफलप्रदाननिपुणा साऽतिप्रवीणा क्षणं |
ध्याताऽपि क्षणदा प्रतिक्षणमतिश्लक्ष्णं भवानी कदा
द्रष्टव्या नयनश्रमापहरणं कर्तव्यमत्यादरैः ||3||
धन्यानां भवनेषु सा गिरिसुता विन्यस्य पादांबुजं
स्थित्वा सा क्षणमात्रमादरयुता तद्द्वारपालांगणे |
इच्छंती कमलाविलासमसकृत् तद्द्वारपालांगणे-
प्यालस्थेन विना रमाविहरणं सा कर्तुमन्विच्छति ||4||
देवानामपि वंद्य एव सततं यत्पादुकाराधकः
तत्पादांबुरुहं स्मरंति सुकृतैः कांतैरनंतैरपि |
तन्मात्रस्मरणेन सुंदरतरे सापींदिरामंदिरे
तत्सेवानिरता कदापि विरता श्रांता न संजायते ||5||
जातश्चेज्जननीमनोज्ञजठरे गौरीपदांभोरुहं
स्मृत्वा भूपतितामुपेत्य बहुधा भुक्त्वाऽपि भोगान् बहून् |
कुर्वन् शांभवपालनं बहुधनैः कुर्वन् शिवाराधनं
काशीं प्राप्य विमुच्यते मुनिवराराध्यामसाध्यामपि ||6||
दृष्टा चेद्गिरिराजराजतनया नेत्रोत्सवो जायते
सर्वांगं पुलकांचितं च न मनः किं तत् प्रसन्नं मम |
नित्यानंदसुधाप्रसारलहरीकल्लोलमालाकुलः
कालं किं न नयामि कालकलना सा कालकालस्य मे ||7 ||इति शिवरहस्यांतर्गते कुमारविरचितं गौरीस्तवः संपूर्णः||
अर्थ
कुमार विरचितं गौरी स्तव भगवान कुमार स्वामी (कार्तिकेय) द्वारा रचित एक महान स्तोत्र है, जिसका उल्लेख शिव रहस्य में मिलता है। यह स्तोत्र आदिशक्ति भगवती गौरी की अपरिमित महिमा, उनकी करुणा, सौंदर्य और शिव के साथ उनके शाश्वत सहचर्य का भक्तिपूर्ण वर्णन करता है। यह भक्तों को दुख, पापों से मुक्ति, शांति, समृद्धि, वाक् सिद्धि और अंततः मोक्ष प्रदान करने वाली एक दिव्य स्तुति है।
गौरी देवी सुख का सागर हैं, सत्कर्मों की अमृतनिधि हैं, सौंदर्य की धारा हैं और संपदाओं का मूल हैं। उनकी दृष्टि आपदाओं को दूर करती है और महापापों का धीरे-धीरे नाश करती है। असीम करुणा से वे भक्त के मन में शांति स्थापित करती हैं। पूर्णिमा के चंद्रमा जैसी मुख कांति वाली गौरी माता को देखते ही दुख दूर हो जाते हैं। वे सृष्टि में सृजन शक्ति के रूप में स्वयं उपस्थित होकर शिव की दृष्टि के समान खड़ी होती हैं। वे अपने पति शिव की दिव्य शक्ति हैं – सृष्टि, स्थिति और लय की मूल कारण।
अपार पुण्य फलों से भक्तों की सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली माता, भक्तों के हृदयों में सदैव करुणा के साथ निवास करती हैं। गौरी देवी का स्मरण करने वालों को आत्म-शांति, वाक्-सिद्धि और दिव्य-दृष्टि प्राप्त होती है। धन्य लोगों के घरों में उनके चरण कमलों का स्पर्श होते ही वह घर पुण्य क्षेत्र बन जाता है। गौरी देवी कमल निवासिनी लक्ष्मी का प्रेमपूर्वक आवाहन करती हैं; परंतु रमा के साथ भी रमण करने वाली स्वयं शिवपत्नी ही हैं।
उनके चरण रज का स्पर्श करने वालों को देवता भी वंदन करते हैं। उनका स्मरण करने वालों को सुंदरता, कांति और ऐश्वर्य प्राप्त होता है। गौरी की सेवा में लीन भक्त कभी थकता नहीं। जिसने जन्म मात्र में गौरी देवी के चरणों का स्मरण किया है – वह चाहे कितने भी भोगों का अनुभव करे, अंततः शिव आराधना के माध्यम से मुक्ति प्राप्त करता है। काशी क्षेत्र में मोक्ष प्राप्त करता है और देवताओं को भी दुर्लभ स्थिति को प्राप्त होता है। गौरी देवी का दर्शन भक्त के लिए नेत्रों का उत्सव है – आनंद से रोमांच, हृदय में तेज का प्रवाह। वे कालकाली को भी पार करने वाली शक्ति हैं; उनके स्मरण से भक्त का समय शाश्वत आनंदमय हो जाता है।
लाभ (Benefits):
- पाप और दुख का नाश: गौरी देवी के स्मरण से सभी पाप और दुख नष्ट हो जाते हैं, मन को शांति मिलती है।
- धन और समृद्धि: उनके आशीर्वाद से ऐश्वर्य, सौंदर्य और समृद्धि प्राप्त होती है।
- वाक् सिद्धि और दिव्य दृष्टि: भक्तों को स्पष्ट वाणी और आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि प्राप्त होती है।
- मोक्ष और मुक्ति: गौरी देवी की आराधना अंततः शिव की कृपा से मोक्ष और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्रदान करती है।
- गृह शांति और पवित्रता: उनके चरण रज के स्मरण से घर पवित्र होता है और शांति आती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कुमार विरचितं गौरी स्तव क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
कुमार विरचितं गौरी स्तव के पाठ से क्या प्रमुख लाभ हैं?
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल या उद्गम क्या है?
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