श्री पार्वती स्तोत्रं
विबुधाधिपतेजिनीशकांते वदनाभाजितयामिनीशकांते |
नवकुंदविराजमानदंते नलिनाभं प्रणमाम्यहं पदं ते || 1||
विकचांबुरुहां विलासचोरैरतिशीतैः प्रवहद्दयांबुपूरैः |
शशिशेखरचित्तनृत्तरंगैस्तरसालोकय देवि मामपांगैः || 2||
अवनीधरनायकस्य कन्ये कृपणं मां परिपालयातिधन्ये |
विधिमाधववासवादिमान्ये द्रुतमुन्मूलितभक्तलोकदैन्ये || 3||
कुचनिंदितशातकुंभशैले मणिकांचीवलयोल्लसद्दुकूले |
परिपालय मां भवानि बाले त्रिजगद्रक्षणजागरूकलीले || 4||
स्वरुचा जिततप्तशातकुंभे कचशोभाजितकालमेघडंभे |
परिपालय मां त्रसन्निशुंभे मकुटोल्लासिसुधामयूखडिंभे || 5||
कुसुमायुधजीवनाक्षिकोणे परितो मामव पद्मरागशोणे |
स्मरवैरिवशीकृतप्रवीणे चरणाब्जानतसत्क्रियाधुरीणे ||6||
गिरिजे गगनोपमावलग्ने गिरितुंगस्तनगौरवेण भुग्ने |
वस मे हृदये तवांगलग्ने तव संदर्शनमोदसिंधुमग्ने || 7||
सकलोपनिषत्सरोजवाटीकलहंस्यास्तव मे कवित्वधाटी |
कृपयाविरभूदियं तु पेटी वहतु त्वद्गुणरम्यरत्नकोटीः || 8 ||इति श्रीपार्वतीस्तोत्रं संपूर्णं||
अर्थ
श्री पार्वती स्तोत्रं, आदि शक्ति जगन्माता पार्वती देवी को समर्पित एक अत्यंत पवित्र और भक्तिपूर्ण प्रार्थना है। यह स्तोत्र भक्त के हृदय से देवी की अनुपम सुंदरता, उनकी करुणा, शक्ति और उनके आश्रय का वर्णन करता है। हिमालय की पुत्री, भगवान शिव की अर्धांगिनी और समस्त जीवों की माता के रूप में पार्वती देवी सृष्टि, स्थिति और संहार की अधिष्ठात्री हैं। इस स्तोत्र का प्रत्येक श्लोक देवी के विभिन्न गुणों, उनके महत्व और भक्तों के प्रति उनकी असीम अनुकंपा को उजागर करता है।
इस स्तोत्र में, भक्त पार्वती देवी को सभी देवताओं से श्रेष्ठ और शिव की प्रियतमा के रूप में वर्णित करता है। देवी के मुख की कांति चंद्रमा के प्रकाश को भी मात देती है, और उनके दाँत खिले हुए कुंद पुष्पों के समान चमकते हैं। भक्त उनके चरण कमलों को नमन करता है, जो शाश्वत शरण के योग्य हैं। देवी की आँखें कमल के समान विशाल और करुणा से परिपूर्ण हैं। उनकी वह करुणामयी दृष्टि शीतल जलधारा के समान प्रवाहित होकर भक्तों को पवित्र करती है। शशिशेखर भगवान शिव के हृदय में नृत्य करने वाली प्रेम तरंगों के समान देवी के कटाक्ष भक्त के जीवन को आलोकित करते हैं।
स्तोत्र में देवी को हिमवान की पुत्री, परम दयामयी और दुखियों की रक्षक कहा गया है। ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र आदि देवताओं द्वारा पूजित होने वाली देवी भक्तों के दुःखों को जड़ से मिटाने वाली माता हैं, और भक्त उनसे अपनी रक्षा की प्रार्थना करता है। देवी के वक्षस्थल सोने के पर्वतों के समान हैं, और उनके वस्त्र मणियों से जगमगाते हैं। भवानी, बाले, तीनों लोकों की रक्षा में जागृत रहने वाली देवी की रक्षा ही भक्त का एकमात्र सहारा है। उनकी कांति तप्त स्वर्ण के समान चमकती है, और उनके केश मेघों के समान काले तथा बिजली की तरह चमकीले हैं। निशुंभासुर का संहार करने वाली देवी के मुकुट से निकलने वाली चंद्रकांति भक्त की रक्षा करे।
कामदेव के बाणों से भी अधिक प्रभावी देवी के कटाक्ष पद्मराग रत्नों के समान लालिमा बिखेरते हैं। स्मरवैरी (भगवान शिव) की प्रियतमा देवी, भक्त को भक्ति और सत्कर्म के मार्ग पर स्थिर रखें। गिरिजे, गगन के समान विशालकाय और पर्वतों के समान उन्नत स्तनों के भार से झुकी हुई देवी, भक्त के हृदय में स्थायी रूप से निवास करें, जो उनके दर्शन के आनंद सागर में डूबा हुआ है। उपनिषदों के वन में विचरण करने वाली हंसिनी के समान माता की कृपा से ही कवि के काव्य हृदय ने यह स्तोत्र रूप धारण किया है। कवि कामना करता है कि उसके वचन देवी के गुणों के हीरों के समान चमकते रत्नों से परिपूर्ण हों। यह स्तोत्र भक्त को पार्वती देवी के सर्वशक्तिमान, करुणामयी, सौंदर्यमयी और मोक्षदायिनी स्वरूप का अनुभव कराता है।
प्रयोजन (Benefits):
- पाप मुक्ति: इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से भक्त अपने पापों से मुक्त होते हैं और शुद्ध मन प्राप्त करते हैं।
- सौभाग्य वृद्धि: विशेष रूप से महिलाओं के लिए, इस स्तोत्र का पाठ सौभाग्य, समृद्धि और परिवार में शांति लाता है।
- भय निवारण: देवी की रक्षात्मक शक्ति सभी प्रकार के भय, चिंताओं और नकारात्मक शक्तियों को दूर करती है।
- ज्ञान और बुद्धि: पार्वती देवी ज्ञान और बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी हैं, अतः स्तोत्र पाठ से ज्ञान में वृद्धि होती है और सही निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
- स्वास्थ्य और धन: देवी के आशीर्वाद से भक्तों को उत्तम स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिरता प्राप्त होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री पार्वती स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री पार्वती स्तोत्र पाठ के प्रमुख लाभ क्या हैं?
श्री पार्वती स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल या इतिहास क्या है?
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