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श्री पार्वती श्रीकंठ स्तुतिः

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स्तोत्र
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श्री पार्वती श्रीकंठ स्तुतिः

(श्रीगरलपुरप्रवेशकाले)
आसन्बहवो घस्रा मातस्त्वच्चरणदर्शनं हित्वा
पार्वति कृतार्थतां खलु गमितस्त्वत्पाददर्शनादद्य ||1||

सच्चित्सुखस्वरूपां ब्रह्मैतत्पश्यतेंदुशीर्षाख्यं |
इति वदति शैलतनया साक्षान्नूनं प्रसारितांगुल्या ||2||

भक्तानां पापवृक्षौघच्छेदनायेंदुशेखर |
बिभर्षि पट्टसं रत्नत्सरुं किं लोकशंकर ||3||

स्पृष्टस्य चैकेन पदासुरस्य महत्पदं मुक्तिरभूत्किलास्य |
स्पर्शेऽन्यपादस्य फलं हि दातुं नास्तीत्यतो व्योम्नि दधासि चान्यं ||4||

इति शृंगेरि श्रीजगद्गुरु श्रीसच्चिदानंदशिवाभिनवनृसिंह-
भारतीस्वामिभिः विरचिता श्रीपार्वतीश्रीकंठस्तुतिः संपूर्णा |

अर्थ

श्री पार्वती श्रीकंठ स्तुति श्री श्रृंगेरी जगद्गुरु श्री सच्चिदानंद शिवाभिनव नृसिंह भारती स्वामीजी द्वारा श्रीशैल के गरलपुर में प्रवेश करते समय रचित एक अत्यंत भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान शिव और देवी पार्वती के एकात्म स्वरूप, उनकी असीम दयालुता और आत्म-साक्षात्कार के महत्व को दर्शाता है। भक्त की कृतज्ञता, परम सत्य का दर्शन और दिव्य अनुग्रह की भावनाएँ इस स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक में मोतियों की तरह चमकती हैं। यह गुरुदेव की गहरी भक्ति और आध्यात्मिक अनुभव की अभिव्यक्ति है।

यह स्तुति केवल देवताओं के गुणों का गान नहीं है, बल्कि परम सत्य की अनुभूति और भक्त के आंतरिक अनुभव की अभिव्यक्ति है। यह शिव-शक्ति के अविनाशी संबंध पर जोर देती है और बताती है कि दोनों एक ही परब्रह्म तत्व के दो रूप हैं। गुरु श्री सच्चिदानंद शिवाभिनव नृसिंह भारती स्वामीजी की आंतरिक भक्ति, ज्ञान और वैराग्य इस स्तोत्र में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। प्रत्येक श्लोक में दिव्य प्रेम और आध्यात्मिक जागरण का गहरा संदेश निहित है, जो साधक को आत्मोन्नति की ओर अग्रसर करता है।

पहले श्लोक में, भक्त (गुरु) कहते हैं, “हे माता पार्वती! मैंने अनेक जन्मों में तुम्हारे दिव्य चरणों के दर्शन के लिए अनगिनत प्रयास किए, परंतु वे सब निष्फल रहे। अब, तुम्हारे चरणों के दर्शन के इस क्षण में ही मेरा जीवन वास्तव में कृतार्थ हो गया है।” यह श्लोक भक्त की दीर्घकालिक साधना और अंततः देवी के दर्शन से प्राप्त परमानंद और कृतज्ञता को व्यक्त करता है। दूसरे श्लोक में, पार्वती को साक्षात् सच्चिदानंद स्वरूपिणी और परब्रह्म की प्रतीक के रूप में वर्णित किया गया है: “यह सच्चिदानंद ही परब्रह्म है,” ऐसा कहा गया तुम्हारा स्वरूप ही है, हे शैलतनये! चंद्रमा को धारण करने वाले शिव के मस्तक पर तुमने जो अपनी अंगुली मुद्रा प्रदर्शित की है, वही ब्रह्म-तत्व का प्रबोधन देती है।” यह दर्शाता है कि वे ज्ञान और विवेक की प्रधान देवी के रूप में परम सत्य का उपदेश देती हैं।

तीसरे श्लोक में, “हे चंद्रशेखर! भक्तों के पाप रूपी वृक्षों के समूह को काटने के लिए तुमने तलवार धारण की है। परंतु, हे लोकशंकर! क्या तुम्हें उस रत्नजड़ित तलवार की वास्तव में आवश्यकता है? तुम्हारी उपस्थिति ही पर्याप्त है (पापों को नष्ट करने के लिए)” कहकर शिव की अपार दयालुता को दर्शाया गया है। यह बताता है कि पापों का नाश करने के लिए उन्हें किसी अस्त्र की आवश्यकता नहीं है; उनकी करुणापूर्ण दृष्टि या मात्र उपस्थिति ही सभी पापों को भस्म करने में सक्षम है। चौथे श्लोक में शिव की सर्वोच्च दयालुता का चित्रण है: “एक पैर से असुर का स्पर्श करने पर उसे मुक्ति रूपी महान पद प्राप्त हुआ। यह जानकर कि दूसरे पैर के स्पर्श से कोई अतिरिक्त फल नहीं मिलेगा, तुमने उस दूसरे पैर को आकाश में धारण किया हुआ है। यह तुम्हारे दयालु स्वभाव का प्रतीक है – पापी को भी मुक्ति देना तुम्हारा सहज स्वभाव है।” यह श्लोक शिव की अनंत करुणा और सभी को मुक्ति प्रदान करने के उनके स्वभाव को उजागर करता है, भले ही वे पापी क्यों न हों।

प्रयोजन (Benefits):

  • आध्यात्मिक शांति और संतोष: इस स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करने से मन को असीम शांति और संतोष प्राप्त होता है, आंतरिक अशांति दूर होती है। यह मानसिक तनाव को कम कर आंतरिक आनंद बढ़ाता है।
  • मन की शुद्धि और भक्ति में स्थिरता: शिव-पार्वती के प्रति भक्ति बढ़ती है, मन शुद्ध होता है और आध्यात्मिक जीवन में स्थिरता आती है। यह साधक को ईश्वर के अधिक निकट लाता है।
  • ज्ञान और विवेक की प्राप्ति: सच्चिदानंद स्वरूपिणी पार्वती की स्तुति करने से ज्ञान, विवेक और आत्म-साक्षात्कार की समझ विकसित होती है। यह अज्ञानता के अंधकार को दूर कर स्पष्टता प्रदान करता है।
  • पाप निवारण और मोक्ष मार्ग: शिव की दया का स्मरण करने से पापों का नाश होता है, कष्ट दूर होते हैं और मोक्ष का मार्ग सुगम होता है। यह जीवन के अवरोधों को हटाकर मुक्ति की राह प्रशस्त करता है।
  • शिव-शक्ति का अनुग्रह: शिव और पार्वती के एकात्म रूप की स्तुति करने से दोनों देव-दंपति का संपूर्ण अनुग्रह प्राप्त होता है, जिससे जीवन में समृद्धि और आनंद आता है। यह सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों तरह की खुशियों को आकर्षित करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री पार्वती श्रीकंठ स्तुति क्या है?
यह श्री श्रृंगेरी जगद्गुरु श्री सच्चिदानंद शिवाभिनव नृसिंह भारती स्वामीजी द्वारा रचित एक पवित्र स्तोत्र है। इसमें भगवान शिव और देवी पार्वती के दिव्य स्वरूप, उनकी दयालुता और एकात्मता की स्तुति की गई है।
श्री पार्वती श्रीकंठ स्तुति का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तुति का पाठ किसी भी शुभ समय पर, विशेषकर शिव-पार्वती से संबंधित दिनों (जैसे सोमवार, प्रदोष काल) पर किया जा सकता है। इसे शुद्ध मन और एकाग्रता के साथ करना चाहिए।
इस स्तुति का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
इस स्तोत्र के पाठ से आध्यात्मिक शांति, मन की शुद्धि, ज्ञान की वृद्धि, पापों का नाश और शिव-पार्वती का पूर्ण अनुग्रह प्राप्त होता है। यह मोक्ष के मार्ग को सुगम बनाता है।
श्री पार्वती श्रीकंठ स्तुति का पाठ किसे करना चाहिए?
शिव और पार्वती के भक्त, आध्यात्मिक शांति और ज्ञान की इच्छा रखने वाले, तथा कष्टों से मुक्ति चाहने वाले कोई भी व्यक्ति इस स्तुति का पाठ कर सकते हैं। श्रद्धा और भक्ति महत्वपूर्ण हैं।
इस स्तुति का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इसकी कोई निश्चित संख्या नहीं है। प्रतिदिन कम से कम एक बार या 11, 21, 108 बार पाठ किया जा सकता है। निरंतरता और भक्ति से पाठ करना अधिक फलदायी होता है।
श्री पार्वती श्रीकंठ स्तुति का उद्गम क्या है?
इस स्तुति की रचना श्री श्रृंगेरी जगद्गुरु श्री सच्चिदानंद शिवाभिनव नृसिंह भारती स्वामीजी ने श्रीशैल के गरलपुर में प्रवेश करते समय की थी। यह उनकी दिव्य अनुभूति और भक्ति का प्रतीक है।

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