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श्री अंबा नवरत्नमालिका स्तोत्रं

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स्तोत्र
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अंबा नवरत्नमालिका स्तोत्रं

श्रीमत्त्रिपुरांबिकायै नमः |
श्रितजनशिशिरापांगी शिववामांगी शिरीषमृदुलांगी |
संगीतसरसभंगी मुदितकुरंगी करोतु मयि करुणां ||1||

बालां सुरुचिरफालां मुकुरकपोलां विचित्रतरचैलां |
लीलाहताघजालां सुललितमालां नमामि शिवलोलां ||2||

अंबा सुगुणकदंबा पुलिननितंबा शिरोजलोलंबा |
बिंबाधरा मृगाक्षी हिमरुचिबिंबानना हि मामवतात् ||3||

कालीमसुरकरालीं करधृतखड्गाशुलूनरिपुमौलिं |
धूलीकृतदितिजालीं दुरितोद्धूलीकृते श्रितोऽस्म्यनिशं ||4||

भद्रां सुजनसुभद्राममृतसमुद्रांतरीपकृतभद्रां |
मुद्रां नताभयकरीं दधतीं रुद्रांगनामहं वंदे ||5||

ललिता श्रितजनफलितामरतरुतुलिता भजत्कृपाकलिता |
वलितापांगनिपातैः कलयतु कल्याणसंततिं मयि तां ||6||

विद्या तटिदिव हृद्या नखरुचिविद्योतितात्मजनवेद्या |
वेद्यागमैश्चिदाद्या सुभृशमविद्यां लुनातु ममसद्यः ||7||

वाणीं किसलयपाणीं पृथुलश्रोणीं नतामरश्रेणीं |
वाणीजितकलवाणीं भुजगसुवेणीं नमामि शुकपाणीं ||8||

मायां सुरुचिरकायां सुगुणनिकायां सुरासुरोद्गेयां |
ध्येयां योगिभिरनिशं जगदभिधेयां नमामि शिवजायां ||9||

नवरत्नमालिकाख्यामेतामार्यामुदारसविशेषां |
गुरुराजसुकृतिरचितां दयया सांगीकरोतु निजहृदये ||10||

इति अंबानवरत्नमालिका संपूर्णा |

अर्थ

श्री अंबा नवरत्नमालिका स्तोत्रं, सृजन की दिव्य जननी और ज्ञान तथा कृपा की साक्षात् प्रतिमूर्ति देवी त्रिपुरा अंबिका को समर्पित नौ रत्नों की माला के समान एक पवित्र स्तोत्र है। यह स्तोत्र देवी के विविध रूपों, गुणों और शक्तियों का भक्तिपूर्ण वर्णन करता है, जो भक्तों को देवी से गहरे आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने में मदद करता है। महाकवि गुरुराज द्वारा रचित यह स्तोत्र, प्रत्येक श्लोक में देवी के एक अनूठे गुण या स्वरूप को चित्रित करता है, जिससे भक्तों के मन में देवी का दिव्य चित्र अंकित हो जाता है।

इस स्तोत्र का आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। अंबा देवी परम शक्ति हैं, जो सृष्टि, स्थिति और संहार का मूल कारण हैं। नवरत्नमालिका स्तोत्र का पाठ करने से भक्त देवी की दिव्य चेतना से जुड़ते हैं। यह अज्ञान को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है, आंतरिक शांति और भक्ति को बढ़ावा देता है। ऐसा माना जाता है कि देवी की कृपा से जीवन की सभी बाधाएँ दूर होती हैं और सुख-समृद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

प्रत्येक श्लोक देवी की अनूठी महिमा का वर्णन करता है: पहला श्लोक उन भक्तों पर दया की याचना करता है जो उनकी शरण में आते हैं, उन्हें शीतलता प्रदान करने वाली, शिव के वाम भाग में निवास करने वाली, शिरीष पुष्प के समान कोमल शरीर वाली, संगीत, लय और मधुरता की प्रतिमूर्ति देवी के रूप में वर्णित करता है। दूसरा श्लोक बाल रूपिणी, सुंदर ललाट वाली, दर्पण के समान कपोलों वाली, विचित्र वस्त्र धारण करने वाली, लीलापूर्वक राक्षसों का संहार करने वाली, सुंदर मालाओं से सुशोभित शिव की प्रिय देवी को नमस्कार करता है। तीसरा श्लोक गुणों की खान, यमुना तट के समान सुंदर कटि वाली, बादलों के समान लहराते केशों वाली, बिम्बाफल के समान लाल अधरों वाली, चंद्र के समान उज्ज्वल मुख वाली मृगनयनी देवी से सदैव रक्षा की प्रार्थना करता है। चौथा श्लोक कालरात्रि स्वरूपिणी, तलवार से राक्षसों का संहार करने वाली, शत्रुओं के सिरों को धूल में मिलाने वाली और पापों को नष्ट करने वाली देवी की निरंतर शरण लेने का आह्वान करता है।

पांचवां श्लोक भद्रकाली के शुभ स्वरूप, अमृत सागर के समान गहरे हृदय और अभय मुद्रा धारण कर भक्तों को रक्षा प्रदान करने वाले हाथों का वर्णन करता है। छठा श्लोक ललिता त्रिपुरासुंदरी को भक्तों के लिए कल्पवृक्ष के समान फल देने वाली, दया से परिपूर्ण बताता है और प्रार्थना करता है कि उनके कटाक्षों की वर्षा से निरंतर कल्याण प्राप्त हो। सातवां श्लोक देवी के नखों की चमक को बिजली के समान ज्ञान प्रकाशित करने वाली बताता है, जिसे वेद और आगम सत्य स्वरूप में वर्णित करते हैं, और प्रार्थना करता है कि वह अविद्या को नष्ट कर ज्ञान का प्रकाश भक्तों में फैलाएँ। आठवां श्लोक वाणी देवी को कोमल पत्तों जैसे हाथों वाली, विशाल कटि वाली, हंस और कोकिला को जीतने वाली वाणी वाली, तोते को धारण करने वाली ज्ञानप्रसूनांबिका के रूप में नमस्कार करता है। नौवां श्लोक माया स्वरूपिणी, दिव्य कांति युक्त रूप वाली, सद्गुणों से समृद्ध, देवताओं और असुरों द्वारा स्तुत महाशक्ति, योगियों द्वारा ध्यान में स्मृत जगदंबा, शिव की पत्नी को प्रणाम करता है।

यह "अंबा नवरत्नमालिका" नामक दिव्य स्तोत्र महाकवि गुरुराज द्वारा भक्तिपूर्वक रचा गया है। यह नौ मणियों के समान चमकता हुआ देवी स्तोत्र रत्न है। अंतिम श्लोक फलश्रुति बताता है कि जो भक्त इस स्तोत्र को हृदय से और भक्तिभाव से ग्रहण करते हैं, उन पर माँ अंबा दया करती हैं और उन्हें सभी प्रकार का मंगल प्राप्त होता है। यह स्तोत्र भक्तों को देवी के साथ गहरा आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने और उनकी कृपा प्राप्त करने का एक उत्कृष्ट माध्यम है।

प्रयोजन (Benefits):

  • मानसिक शांति और भक्ति: स्तोत्र का नियमित पाठ मन को शांति प्रदान करता है, भक्ति बढ़ाता है और आध्यात्मिक विकास में सहायक होता है।
  • भय और दुःख का निवारण: अंबा देवी के शक्तिशाली स्वरूप की स्तुति करने से सभी प्रकार के भय, दुःख और नकारात्मक शक्तियाँ दूर होती हैं।
  • ज्ञान और बुद्धि की वृद्धि: देवी ज्ञान का स्रोत हैं, इसलिए यह स्तोत्र अज्ञान को दूर कर ज्ञान और बुद्धि को बढ़ाता है।
  • सभी कार्यों में सिद्धि और समृद्धि: देवी की कृपा से जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता, समृद्धि और कल्याण प्राप्त होता है, और सभी बाधाएँ दूर होती हैं।
  • दिव्य शक्ति का जागरण: इस स्तोत्र का भक्तिपूर्ण पाठ भक्तों के भीतर दिव्य शक्ति को जागृत करता है, जिससे उन्हें आंतरिक बल और साहस मिलता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री अंबा नवरत्नमालिका स्तोत्रं क्या है?
यह देवी श्री त्रिपुरांबिका को समर्पित नौ रत्नों की माला के समान एक पवित्र स्तोत्र है। यह महाकवि गुरुराज द्वारा रचित है और देवी के विभिन्न रूपों तथा महिमा का वर्णन करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन, विशेषकर शुक्रवार को या नवरात्रि जैसे पवित्र दिनों में किया जा सकता है। स्नान के बाद शुद्ध मन और भक्तिभाव से पाठ करना उत्तम होता है।
इस स्तोत्र के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ करने से मानसिक शांति, भय और दुःख का निवारण, ज्ञान की वृद्धि, सभी कार्यों में सिद्धि तथा दिव्य शक्ति का जागरण होता है। देवी की कृपा से जीवन में समृद्धि आती है।
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
देवी के उपासक, आध्यात्मिक उन्नति चाहने वाले, और जीवन में कठिनाइयों का सामना कर रहे कोई भी व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। लिंग या आयु का कोई बंधन नहीं है।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
प्रतिदिन कम से कम एक बार या 3, 5, 9, 11 बार अपनी सुविधा अनुसार दोहरा सकते हैं। निरंतर पाठ से सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त होते हैं।
इस स्तोत्र की उत्पत्ति या रचयिता कौन हैं?
इस "अंबा नवरत्नमालिका" स्तोत्र की रचना महाकवि गुरुराज ने की है। यह देवी की महिमा का गुणगान करने वाले प्रसिद्ध स्तोत्रों में से एक है।

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