वरूथिनी एकादशी
वरूथिनी एकादशी क्या है
वरूथिनी एकादशी वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी है। "वरूथ" का अर्थ है कवच — मान्यता है कि यह व्रत भक्त की हर तरह के संकट से रक्षा करता है। इस दिन भगवान विष्णु के वराह अवतार की पूजा का विधान है, और पुष्टिमार्ग के संस्थापक वल्लभाचार्य जी की जयंती भी इसी तिथि को मनाई जाती है।
किस तिथि को
पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार यह वैशाख कृष्ण एकादशी है; अमांत पंचांग में यही दिन चैत्र कृष्ण एकादशी कहलाता है। यह हनुमान जयंती (चैत्र पूर्णिमा) के लगभग ग्यारह दिन बाद आती है। व्रत सूर्योदय के समय की एकादशी से तय होता है।
वरूथिनी एकादशी की कथा
पद्म पुराण में श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को बताते हैं कि नर्मदा किनारे राजा मान्धाता तप कर रहे थे, तभी एक भालू उनका पैर चबाते हुए उन्हें जंगल में घसीट ले गया। राजा ने क्रोध नहीं किया, बस विष्णु को पुकारा। भगवान ने चक्र से भालू को मारा और कहा कि मथुरा जाकर वरूथिनी एकादशी का व्रत करो और वराह रूप की पूजा करो। व्रत के प्रभाव से राजा का अंग फिर पूरा हो गया।
फल और नियम
कथा में इस व्रत का फल कन्यादान और वर्षों की तपस्या के बराबर बताया गया है। परंपरा में दशमी और एकादशी को कांसे के बर्तन, मसूर, चना, शहद, पान और दूसरे के घर का अन्न छोड़ने और दिन में न सोने का नियम है। वैशाख की गर्मी में प्यासे को जल और राहगीरों को शरबत पिलाना भी पुण्य माना जाता है।
फलाहार के लिए एकादशी में क्या खाएं, क्या नहीं और पारण के समय के लिए एकादशी पारण के नियम देखें। एकादशी की मूल कथा एकादशी व्रत कथा में है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
वरूथिनी एकादशी कब आती है?
वरूथिनी एकादशी पर किसकी पूजा होती है?
वरूथिनी एकादशी की कथा क्या है?
इस व्रत में क्या नहीं करना चाहिए?
एकादशी व्रत में क्या खाएं?
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