मिथुन संक्रांति
मिथुन संक्रांति पर सूर्य वृषभ से मिथुन राशि में प्रवेश करते हैं। सौर कैलेंडर में यहीं से आषाढ़ (पंजाबी में हाड़) महीना शुरू होता है। यह वह समय है जब भीषण गर्मी ढलने लगती है और मानसून की पहली बौछारें आती हैं।
पुण्य काल और पूजा
मिथुन, कन्या, धनु और मीन को षडशीति संक्रांति कहा जाता है; इनमें संक्रमण के बाद का समय पुण्य काल होता है, जो इस पृष्ठ पर दिया गया है। स्नान करके सूर्य को अर्घ्य दें और विष्णु की पूजा करें। बरसात से पहले की इस संक्रांति पर छाता, वस्त्र और अनाज का दान व्यावहारिक भी है और पुण्य भी। संक्रांतियों के प्रकार संक्रांति क्या है में समझाए गए हैं।
क्षेत्रीय परंपराएँ
उत्तर भारत में यह संक्रांति ज़्यादातर चुपचाप स्नान-दान के साथ बीतती है, पर पूर्व में इसका रंग अलग है:
- ओडिशा का रज पर्व: मिथुन संक्रांति के आसपास तीन दिन धरती माता के विश्राम का उत्सव मनाया जाता है। इन दिनों खेत में हल नहीं चलता, लड़कियाँ झूला झूलती हैं, नए कपड़े पहनती हैं और पोड़ पीठा बनता है।
- असम: लगभग इसी समय कामाख्या में अंबुबाची मेला लगता है, जब कुछ दिनों के लिए मंदिर के कपाट बंद रहते हैं।
- तमिलनाडु में आनि और केरल में मिथुनम महीना शुरू होता है।
आषाढ़ के साथ ही चातुर्मास की तैयारी शुरू होती है, जो देवशयनी एकादशी से आरंभ होता है। महीनों के नाम हिंदू महीनों के नाम में और हर महीने की संक्रांति अलग पृष्ठ पर देखें। तिथि-नक्षत्र के लिए आज का पंचांग देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
मिथुन संक्रांति से कौन सा सौर महीना शुरू होता है?
मिथुन संक्रांति का पुण्य काल कब होता है?
रज पर्व क्या है?
मिथुन संक्रांति पर क्या दान करें?
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