कूर्म जयंती
कूर्म जयंती वैशाख पूर्णिमा को भगवान विष्णु के दूसरे अवतार, कूर्म यानी कछुए के रूप की स्मृति में मनाई जाती है। इसी रूप में भगवान ने समुद्र मंथन के समय मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण किया था। यह बुद्ध पूर्णिमा वाले दिन ही आती है।
क्या है और क्यों मनाते हैं
देवताओं और असुरों ने अमृत के लिए क्षीरसागर का मंथन शुरू किया। मंदराचल पर्वत मथानी बना और वासुकि नाग रस्सी, पर भारी पर्वत समुद्र में धँसने लगा। तब विष्णु ने विशाल कछुए का रूप लेकर पर्वत को अपनी पीठ पर टिका लिया। इसी मंथन से लक्ष्मी, अमृत, कामधेनु और हलाहल विष निकले। दसों अवतारों के बारे में विष्णु के 10 अवतार लेख पढ़ें।
किस तिथि को
वैशाख मास, शुक्ल पक्ष, पूर्णिमा। कूर्म अवतार की पूजा संध्या के समय करने की परंपरा है, इसलिए वह दिन लिया जाता है जिसके प्रदोष काल में पूर्णिमा हो।
कैसे मनाते हैं
- सुबह नदी स्नान या घर पर गंगाजल मिलाकर स्नान, और वैशाख पूर्णिमा का दान।
- शाम को विष्णु जी या कूर्म रूप की पूजा, पीले फूल, तुलसी, चंदन और पंचामृत से।
- विष्णु सहस्रनाम या "ॐ कूर्माय नमः" का जप।
- घर में चाँदी या धातु का कछुआ रखने वाले इस दिन उसकी भी पूजा करते हैं।
कूर्म रूप को धैर्य और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है, इसलिए नया घर बनाने या नींव रखने से पहले कई लोग इस दिन पूजा करते हैं। आंध्र प्रदेश के श्रीकूर्मम मंदिर में इस दिन बड़ा उत्सव होता है, जो कूर्म अवतार का प्रमुख मंदिर है। पूर्णिमा व्रत की तिथियाँ पूर्णिमा कैलेंडर पर देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कूर्म जयंती कब होती है?
कूर्म अवतार क्या है?
कूर्म जयंती पर क्या करें?
कूर्म अवतार का प्रमुख मंदिर कहाँ है?
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