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श्री कूर्म स्तोत्रं (कूर्मपुराणे)

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स्तोत्र
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श्री कूर्म स्तोत्रं (कूर्मपुराणे)

मुनयः ऊचुः |
नमस्ते कूर्मरूपाय विष्णवे परमात्मने |
नारायणाय विश्वाय वासुदेवाय ते नमः || 1 ||

नमो नमस्ते कृष्णाय गोविंदाय नमो नमः |
माधवाय नमस्तुभ्यं नमो यज्ञेश्वराय च || 2 ||

सहस्रशिरसे तुभ्यं सहस्राक्षाय ते नमः |
नमः सहस्रहस्ताय सहस्रचरणाय च || 3 ||

ॐ नमो ज्ञानरूपाय परमात्मस्वरूपिणे |
आनंदाय नमस्तुभ्यं मायातीताय ते नमः || 4 ||

नमो गूढशरीराय निर्गुणाय नमोऽस्तु ते |
पुरुषाय पुराणाय सत्तामात्रस्वरूपिणे || 5 ||

नमः सांख्याय योगाय केवलाय नमोऽस्तु ते |
धर्मज्ञानाधिगम्याय निष्कलाय नमोऽस्तु ते || 6 ||

नमस्ते व्योमरूपाय महायोगेश्वराय च |
परावराणां प्रभवे वेदवेद्याय ते नमः || 7 ||

नमो बुद्धाय शुद्धाय नमो युक्ताय हेतवे |
नमो नमो नमस्तुभ्यं मायिने वेधसे नमः || 8 ||

नमोऽस्तु ते वराहाय नारसिंहाय ते नमः |
वामनाय नमस्तुभ्यं हृषीकेशाय ते नमः || 9 ||

स्वर्गापवर्गदात्रे च नमोऽप्रतिहतात्मने |
नमो योगाधिगम्याय योगिने योगदायिने || 10 ||

देवानां पतये तुभ्यं देवार्तिशमनाय ते |
भगवंस्त्वत्प्रसादेन सर्वसंसारनाशनं || 11 ||

अस्माभिर्विदितं ज्ञानं यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते |
श्रुतास्तु विविधा धर्मा वंशा मन्वंतराणि च || 12 ||

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च ब्रह्मांडस्यास्य विस्तरः |
त्वं हि सर्वजगत्साक्षी विश्वो नारायणः परः |
त्रातुमर्हस्यनंतात्मा त्वामेव शरणं गताः || 13 ||

इति कूर्मपुराणे उत्तरभागे षट्चत्वारिंशोऽध्याये मुनिभिः कृतं श्री कूर्म स्तोत्रं |

अर्थ

श्री कूर्म स्तोत्र कूर्म पुराण से लिया गया एक अत्यंत शक्तिशाली और भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। यह श्रीमहाविष्णु के दशावतारों में से एक, कूर्म (कछुआ) स्वरूप की महिमा का गुणगान करता है। समुद्र मंथन के दौरान मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण कर देवताओं को अमृत प्राप्त करने में सहायता करने वाले भगवान विष्णु के इस अवतार का वर्णन, उनके लोक कल्याणकारी स्वरूप को दर्शाता है। यह स्तोत्र केवल भगवान के रूप की स्तुति नहीं करता, बल्कि उनके सर्वव्यापकत्व, ज्ञान स्वरूप और परमात्मा तत्व को भी गहराई से समझाता है।

इस स्तोत्र में ऋषिगण भगवान विष्णु से कूर्म रूप में प्रार्थना करते हैं। सर्वप्रथम, वे भगवान को परमात्मा, नारायण, वासुदेव कहकर संबोधित करते हैं और उन्हें समस्त जगत का मूलाधार मानकर नमस्कार करते हैं। इसके पश्चात्, कृष्ण, गोविंद, माधव और यज्ञेश्वर जैसे नामों से स्तुति करते हुए घोषणा करते हैं कि उनके नामस्मरण मात्र से ही लोक पवित्र हो जाते हैं। भगवान के विश्वव्यापी विराट रूप को सहस्र सिर, नेत्र, हाथ और पैरों वाले के रूप में वर्णित किया गया है, जो उनकी अनंतता को दर्शाता है। भगवान को ज्ञानमूर्ति, आनंदस्वरूप, मायातीत और अज्ञान को दूर करने वाला परमात्मा बताया गया है। उन्हें गूढ़शरीर, निर्गुण, पुरातन पुरुष और सत्तामात्र स्वरूप कहा गया है।

आगे, भगवान को सांख्य और योग तत्व के रूप, एकमूर्ति, धर्मज्ञान से प्राप्त होने वाला परमात्मा और निष्कल रूप में सराहा गया है। वे व्योम स्वरूप, महायोगेश्वर, सृष्टि और लय के कारण तथा वेदों द्वारा जानने योग्य हैं। उन्हें शुद्ध बुद्ध रूप, समन्वित, माया के स्वामी और सृष्टिकर्ता के रूप में बार-बार नमस्कार किया जाता है। भगवान के विभिन्न अवतारों जैसे वराह, नरसिंह, वामन और हृषीकेश का स्मरण कर उन्हें वंदन किया जाता है।

अंत में, भगवान को स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने वाला, योग के मूल स्वरूप, योगियों को प्राप्त होने वाला और योग प्रदान करने वाला कहा गया है। वे देवताओं के अधिपति और उनके दुःखों को दूर करने वाले हैं। यह बताया गया है कि उनकी कृपा से समस्त संसार के बंधन नष्ट हो जाते हैं। जो उन्हें जान लेते हैं, वे अमरत्व प्राप्त करते हैं, और धर्म, वंश, मन्वंतर तथा सृष्टि-लय सभी उन्हीं में स्थित हैं। भगवान को समस्त जगत का साक्षी, विश्वनारायण और अनंतात्मा कहकर, शरण आए भक्तों की रक्षा करने की प्रार्थना की जाती है। इस स्तोत्र का पाठ भगवान की अनंत महिमा का अनुभव करने और उनके आशीर्वाद को प्राप्त करने का एक पवित्र मार्ग है।

प्रयोजन (Benefits):

  • संकटों से मुक्ति: इस स्तोत्र का नियमित पाठ जीवन में आने वाली बाधाओं, कठिनाइयों और सांसारिक बंधनों को दूर करने में सहायक होता है।
  • ज्ञान और आध्यात्मिक विकास: भगवान विष्णु के ज्ञान स्वरूप की स्तुति करने से बुद्धि में वृद्धि होती है और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करने में मदद मिलती है।
  • शांति और मानसिक स्थिरता: भगवान की सर्वव्यापकता और रक्षक शक्ति का स्मरण करने से मन को शांति, स्थिरता और साहस प्राप्त होता है।
  • मोक्ष की प्राप्ति: भगवान को स्वर्ग और मोक्ष का दाता बताया गया है, अतः इस स्तोत्र का पाठ अंतिम मोक्ष की प्राप्ति के मार्ग को सुगम बनाता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा: भगवान विष्णु की दिव्य शक्तियों का आह्वान करने से आसपास के वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है, जिससे सभी कार्यों में सफलता मिलती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री कूर्म स्तोत्रं क्या है?
श्री कूर्म स्तोत्र कूर्म पुराण में वर्णित एक भक्तिमय स्तोत्र है, जो भगवान विष्णु के कूर्म (कछुआ) अवतार की स्तुति करता है। यह भगवान के सर्वव्यापी, ज्ञानवान और शक्तिशाली स्वरूप का वर्णन करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ किसी भी समय, विशेषकर शुभ अवसरों पर या प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद शुद्ध मन से किया जा सकता है। शांत स्थान पर बैठकर, भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए पाठ करना उत्तम माना जाता है।
श्री कूर्म स्तोत्र के पाठ के मुख्य लाभ क्या हैं?
इस स्तोत्र का पाठ करने से संकट दूर होते हैं, आध्यात्मिक ज्ञान बढ़ता है, मन को शांति मिलती है और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। यह सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
भगवान विष्णु के भक्त, आध्यात्मिक उन्नति चाहने वाले, जीवन में कठिनाइयों का सामना कर रहे व्यक्ति और शांति व समृद्धि की कामना करने वाला कोई भी व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है।
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन 1, 3, 5, 11 या 108 बार किया जा सकता है। पाठ की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण भक्ति और एकाग्रता के साथ किया गया पाठ होता है।
श्री कूर्म स्तोत्र का मूल स्रोत क्या है?
श्री कूर्म स्तोत्र हिंदू धर्म के अठारह महापुराणों में से एक 'कूर्म पुराण' से लिया गया है। यह कूर्म अवतार के प्रसंग में ऋषियों द्वारा भगवान की स्तुति का एक अंश है।

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