देवशयनी एकादशी
देवशयनी एकादशी क्या है
देवशयनी एकादशी आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जिस दिन माना जाता है कि भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसी दिन से चार महीने का चातुर्मास शुरू होता है, जो कार्तिक शुक्ल की देवउठनी एकादशी पर पूरा होता है। इसे हरिशयनी और पद्मा एकादशी भी कहते हैं।
किस तिथि को
आषाढ़ शुक्ल एकादशी — जगन्नाथ रथयात्रा के नौ दिन बाद। शुक्ल पक्ष होने से दोनों पंचांगों में महीना एक ही है।
राजा मान्धाता की कथा
पद्म पुराण में श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को बताते हैं कि सूर्यवंशी राजा मान्धाता के राज्य में तीन साल तक बारिश नहीं हुई। समाधान खोजते हुए राजा अंगिरा ऋषि के पास पहुँचे, जिन्होंने आषाढ़ शुक्ल एकादशी का व्रत करने को कहा। राजा और प्रजा ने व्रत किया और राज्य में मूसलाधार वर्षा हुई। पूरी कथा देवशयनी एकादशी व्रत कथा में पढ़ें।
कैसे मनाते हैं
- शाम को विष्णु जी की प्रतिमा को पीले वस्त्र और सफ़ेद चादर वाले छोटे पलंग पर लिटाकर "सुप्ते त्वयि जगन्नाथ" मंत्र से शयन कराया जाता है।
- बहुत से लोग इस दिन चातुर्मास का संकल्प लेते हैं — किसी एक चीज़ (जैसे दही, बैंगन, पत्तेदार साग) को चार महीने छोड़ना।
- चातुर्मास में विवाह, गृह प्रवेश और मुंडन जैसे संस्कार नहीं किए जाते।
क्षेत्रीय परंपराएँ
महाराष्ट्र में यही आषाढ़ी एकादशी है, जब वारकरी पैदल पंढरपुर पहुँचते हैं। ब्रज और राजस्थान के मंदिरों में इस दिन ठाकुर जी का विशेष शयन श्रृंगार होता है। फलाहार के नियम एकादशी में क्या खाएं, क्या नहीं में देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
देवशयनी एकादशी कब आती है?
देवशयनी एकादशी से क्या शुरू होता है?
चातुर्मास में क्या नहीं करते?
देवशयनी एकादशी की कथा क्या है?
इसे और किस नाम से जानते हैं?
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