जगन्नाथ रथयात्रा
जगन्नाथ रथयात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को पुरी में निकलने वाली वह यात्रा है जिसमें भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा अपने-अपने रथ पर बैठकर गुंडिचा मंदिर जाते हैं। लाखों भक्त रस्सी खींचकर रथ आगे बढ़ाते हैं। आज यह यात्रा पुरी के साथ अहमदाबाद, कोलकाता, दिल्ली और देश-विदेश के बहुत से शहरों में निकलती है।
क्या है और क्यों मनाते हैं
मान्यता है कि भगवान साल में एक बार गर्भगृह से बाहर आकर अपनी मौसी के घर, गुंडिचा मंदिर, जाते हैं और वहाँ लगभग एक सप्ताह रहते हैं। रथयात्रा से पहले ज्येष्ठ पूर्णिमा को स्नान यात्रा होती है, जिसके बाद भगवान "बीमार" माने जाते हैं और पंद्रह दिन दर्शन बंद रहते हैं। इसे अनवसर काल कहते हैं। फिर नए रूप में दर्शन देकर वे रथ पर निकलते हैं।
किस तिथि को
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया, सूर्योदय के समय की तिथि के अनुसार। शुक्ल पक्ष होने से उत्तर और दक्षिण के पंचांगों में महीने का नाम एक ही है। यह दिन आषाढ़ गुप्त नवरात्रि के बीच पड़ता है। लौटने की यात्रा, बाहुड़ा, लगभग नौ दिन बाद होती है, और उसके कुछ ही दिन बाद देवशयनी एकादशी आती है।
कैसे मनाते हैं
- तीन रथ बनते हैं: जगन्नाथ जी का नंदीघोष, बलभद्र जी का तालध्वज और सुभद्रा जी का दर्पदलन। आगे बलभद्र, बीच में सुभद्रा और पीछे जगन्नाथ जी का रथ चलता है।
- पुरी के गजपति राजा सोने की झाड़ू से रथ का रास्ता बुहारते हैं। इस रस्म को छेरा पहँरा कहते हैं और यह बताती है कि भगवान के सामने राजा भी सेवक है।
- उत्तर भारत में मंदिरों और कृष्ण भक्त संस्थाओं की रथयात्राओं में कीर्तन, प्रसाद और खिचड़ी भोग का बड़ा चलन है।
- घर पर लोग जगन्नाथ जी की छवि के आगे दीपक जलाकर ओम जय जगदीश हरे गाते हैं।
अपने शहर का पंचांग आज का पंचांग पृष्ठ पर देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
जगन्नाथ रथयात्रा किस तिथि को निकलती है?
तीनों रथों के नाम क्या हैं?
भगवान रथयात्रा में कहाँ जाते हैं?
अनवसर काल क्या है?
घर पर रथयात्रा के दिन क्या करें?
टिप्पणियाँ
टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...
